*जोकर:मुखौटे के पीछे*
बड़ी-सी लाल नाक, गालों पर सफेद चूना,
और होंठों पर स्थायी खिंची एक मुस्कान,
तालियों की गड़गड़ाहट का वह भूखा सौदागर—
आज फिर बाज़ार में अपनी 'बेइज्जती' बेचने निकला है।
कितना मज़ाकिया है न यह दृश्य?
कि वह गिरता है ताकि तुम खड़े होकर हँस सको,
वह पिटता है ताकि तुम्हारे ठहाकों की तिजोरी भर सके,
व्यंग्य तो देखिए—
दुनिया उसे 'बेवकूफ' समझती है,
और वह पूरी दुनिया को 'उल्लू' बना रहा होता है।
बाकी कलाकारों के बीच जब भीड़ बढ़ती है,
तो 'आशीष' ने भी गौर से देखा उस फनकार को,
जो खुद एक लतीफा बन गया है
सिर्फ चंद सिक्कों की खनक के वास्ते।
पर खेल खत्म होने के बाद—
जब लाइटें बुझ जाती हैं और सर्कस का तंबू खाली होता है,
तब वह उतारता है अपना 'मखमल का कोट'
और पोंछता है चेहरे का वह जिद्दी गाढ़ा रंग।
तौलिये पर रंग नहीं,
उसकी बरसों की दबी हुई आहें उतर आती हैं।
वहाँ कोई दर्शक नहीं होता,
पर हवाओं में एक गूँज सुनाई देती है—
यह ठहाका नहीं, यह तो 'क्रंदन' है।
वह जोकर...
अब आइने के सामने बैठकर अपनी ही आँखों से पूछता है:
"अगली सुबह फिर हँसाना है उन्हें,
बता... आज रात कितना रोने की इजाजत है?"
Adv. आशीष जैन
7055301422
फिरोजाबाद