Yaado ki Sahelgaah - 21 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (21)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (21)

     

                 : : प्रकरण - 21 : :

          ' कीसी ' की विदाय से मैं काफ़ी प्रताड़ित हुआ था.. मैं उसे किसी भी तरह भूला नहीं पा रहा था.. हम लोग कुछ भी काम होता था, तब साथ हीं होते थे.

           उस दिन ' कीसी' ओफिस नहीं आई थी. परमेश्वर को पीलिया हो गया था. वह डोक्टर की दवाईया लेता था. लेकिन मुझे पता था, यह बीमारी दवाईयो से ठीक नहीं होती हैं. उस के लिये मुझे याद आया था. भूलेश्वर में एक जगह उस की पुड़िया मिलती हैं. चार पुड़ियों का कोर्स था जो पूरा करने से पीलिया की मुल से निकल जाती हैं.

      मैंने ' कीसी' को यह जानकारी दी थी.

      और वह फ़ौरन तैयार हो गई थी.

       शाम को वह मेरे साथ भूलेश्वर आई थी.

        मैंने उसे पुड़िया दिलाई थी. फिर चलकर हम लोग चर्नी रोड गये थे.

         उस की तबियत का हाल चाल देखने जाना मेरा कर्तव्य था. उस के लिये मैंने  उस का एड्रेस पूछा था. तब उस ने मुझे सामने से कहां था.

           "अगर आप के समय हो और कुछ काम ना हो तो मेरे साथ आ जाइये. आप को घर ढूढ़ने की मेहनत नहीं होगी. "

         मुझे उस का सुझाव सही लगा था. उस वक़्त PCO से आरती को फोन कर के बता दिया था और मैं उस के घर चला गया था.

       मुझे देखकर वह बहुत खुश हुआ. ' कीसी' ने उसे बडे उत्साह से बताया:

       ' मैं संभव भैया के साथ आप के लिये पीलिया की दवा लेने गई थी. यह चार पुड़िया हैं. वह लेने से पीलिया भाग जायेगा. "

       " थैंक्स! संभव भैया."   

       " दोस्ती यारी में थैंक्स को कोई अवकाश नहीं होता. "

        ' कीसी' ने मेरे लिये कोफ़ी मंगाई थी. बहुत मना करने के बावजूद उसने पडोशी के लडके से वड़ा पाऊं मंगाया था. 

        एक घंटे के बाद मैं उस के घर से निकल गया था

         और 9-30 बजे तक मैं घर पहुंच गया था.

          आरती से क्यों देर होने वाली हैं उस के बारे में कोई बात नहीं हुई थी. तो सहज उस ने सवाल किया था. और मैंने उसे सच बताया था. दोनों ने अपने प्यार और व्यवहार से दोनों के मन जीत लिये थे.

        पुड़िया लेने से परमेश्वर की तबियत में बहुत बदलाव हुआ था. और दो तीन में वह ठीक भी हो गया था. यह जानकार उसे दोबारा मिलने की इच्छा हुई थी. तो मैंने ' कीसी' को कहां था.

         " मैं तुम्हारे साथ चलता हूं. " 

          यह करना गलत था. अब मुझे उस का घर मालूम था. मैं अगर चाहता था तो अकेला जा सकता था.

           मेरी बात सुनकर ' कीसी' भी असमंजस में आ गई थी. वह कैसे मना कर सकती थी.

      और मैं दूसरी बार उस के साथ उस के घर गया था.

       परमेश्वर ने मुंह से तो कुछ नहीं कहां था. लेकिन उस की बोडी लैंग्वेज उस के दिल की बात कह गई थी.

       जाने वह कह रही थी : " अब तो घर मालूम था ना?

       मैं खुद अपनी हरकत से. शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. वह भी सही था. मैं पहली बार गया था उस में से कुछ लोग उस दिन भी मौजूद थे. वह लोग क्या सोंचेगे. मैंने मन हीं मन दोनों की और ईश्वर की भी माफ़ी मांगी थी.

                    00000000000

      उस के जाने के बाद यादों की सहेलगाह जारी हो गई थी.

       एक बार शाम को घर जाने के समय उस ने मुझे बताया था :

        " मेरा एक पायल कहाँ खो गया है! "

        " कहाँ खो गया? " मैंने चिंतित स्वर में उसे सवाल किया था .

         " मालूम नहीं  शायद गाड़ी में कोई दरवाज़े पर बैठी भिखारीन ने निकाल दिया होगा. ना जाने परमेश्वर ने कितनी जहमत से पैसे बचाकर मेरे लिये यह पायल ख़रीदे थे. उस को मैं क्या जवाब दूंगी? मुझे इस परिस्थिति से बचने के लिये दूसरा पायल खरीदना होगा. महिने के आखिरी दिन है मेरे पास तो पैसे भी नहीं है. "

       " तुम उस की फ़िक्र मत करो! पैसे तुम्हे मिल जायेंगे. "

       " मैं आज हीं नया पायल खरीदना चाहती हूं, क्या तुम मेरे साथ चलोंगे? "

        यह कुछ पूछने वाली बात है? मैं तुम्हारी हर जरूरत में तुम्हारे साथ रहूंगा. "

      और हम ओफिस छूटने के बाद बस में ज्वेलर्स की दुकान पहुंच गये थे. शाम का समय था. दुकान में थोड़ी भीड़ थी, इस लिये हमे थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा था.. बाद में सेल्समेन ने हमे एंटरटेइन किया था. 

       वह दो मिनिट में बिल्कुल वैसा ही पायल लेकर आया था जिस में कौन सा पायल ' कीसी' का था? वह कहना मुश्किल था. 

        ' कीसी' ने अपने हाथों पायल पहनने की कोशिश कर रही थी. इस लिये मैंने उसे पहनाने में मदद की थी.

       उस वक़्त एक परिचित व्यकित दुकान में दाखिल हुआ था. उसे देखकर मैं चकित ऱह गया था.. वह ओफिस का जीता जागता अख़बार था.

        उस में बिना कुछ जाने समझे बताये मुझे सवाल किया था. इस दुकान में मेरा खुद का लड़का काम करता हैं, मुझे बताया होता तो मैं तुम्हारे साथ टेक्सी में यहाँ आ गया होता. तुम्हे अच्छा खासा डिस्काउंट भी दिला देता. "

      मैंने उस की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया था. मैंने ' कीसी' को अपने हाथों पायल पहनाया था. उस का जिक्र करते हुए मेरी तारीफ की थी:

       " आप ने फ्लोरा मेम साब को आपने खुद पायल पहनाया वह देखकर मुझे फ़िल्म ' गाइड ' का दृश्य याद आ गया. "

        मैं उसे मूंह नहीं लगना चाहता था. इस लिये भुगतान कर के दुकान से बाहर निकल आये. हमारे पीछे दीवार पर पान की पिचकारी मारता हुआ फुटपाथ तक आ गया और उस ने सवाल किया:

         " कहाँ जाओगे? "

         उस के सवाल में गंदगी भरी हुई थी. 

          वह सोच रहा था. हम लोग ऐयासी के लिये  होटल जा रहे थे.

       मैं कुछ भी कहे बिना फ्लोरा को लेकर टेक्सी में बैठ गया था. दरवाजा बंद कर के मैंने ड्राइवर को सूचना दी थी. 

       " चर्नी रोड स्टेशन ले चलो. "

        ड्राइवर ने मीटर डाउन किया और टेक्सी गतिमान हो गई. रास्ते में थोड़ा ट्राफीक था, इस लिये पहुंच ने में थोड़ा ज्यादा समय लग गया. 

       मैंने ' कीसी' को महिला कम्पार्टमेंट में चढ़ाया और खुद लगेज के डिब्बे में चढ़ गया.

                   00000000000  ( क्रमशः)