Yaado ki Sahelgaah - 22 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (22)

Featured Books
Categories
Share

यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (22)


                      : : प्रकरण : : 22

         ' कीसी' के जाने के बाद मेरी जिंदगी में अंधेरा हो गया था.

          आखिरी दिन मैं उस के साथ वी टी स्टेशन तक चल कर गया था.

           मैं बहुत मायूस हो गया था.. उस वक़्त ' कीसी' ने मुझे आश्वस्त किया था.

        " संभव भैया मेरा जोब छूटने से हमारे रिश्ते का अंत नहीं होता हैं. आप ज़ब चाहे तब अपनी बहन और भाई जैसे दोस्त को मिलने आ सकते हो. आप के लिये हमारे दरवाजे सदैव खुल्ले रहेंगे. "

       उस वक़्त किशन भी हमारे साथ हो गया था. उस को सब कुछ मालूम था, फिर भी उस का जोब चला गया था उस के बारे में अनजान बन गया था.

        सच्चाई जानकर उस ने नवनीत राय को कोसा था. बहुत कुछ बोला था.

        मैं ' कीसी' के साथ वी टी जा रहा था, उस के बारे में भी उसे दिक्कत हो रही थी. उस ने मुझे सवाल भी किया था.

         " आप किस तरफ कैसे? "

          मैंने उसे जवाब दिया था.

          " मैं फ़िल्म की टिकिट बुक करने जा रहा हूं. "

      " आप ने क्यों कष्ट लिया. मुझे कहां होता तो मैं टिकिट बुक कर के देता था. "

      मैंने उस की नौटंकी का कोई जवाब देना जरुरी नहीं लगा था. मैं चुप रहा था. और अपने आप को ' कीसी' से बात करने में व्यस्त रखा था.

      उस के नसीब कुछ अच्छे थे. लेकिन प्रसूति की वजह से दूसरा जोब मिलना मुश्किल था. इस लिये उसे प्रसूति तक और उस के बाद कुछ महिने घर में बैठना पड़ा था.

       बाद में उसे पडोशी की वजह से अच्छा जोब मिल गया था. ' कीसी' ने एक बच्ची को जन्म दिया था. उस वक़्त उस की देखभाल के लिये उस की ग्रेनी उस के घर आई थी. वह भी मेरा आदर करती थी, मेरा ख्याल रखती थी.

       उस की प्रसूति की परमेश्वर ने हमे जानकारी दी थी और हम उन की बेटी का चेहरा देखने मेटरनीटी होम गये थे. उस को सकून के तौर पर कुछ राशि  उस को दी थी.

       बाद में उस का नया जोब शुरू हो गया था.

       ' कीसी' एक चीज के लिये नसीब वाली थी. पहले उसे मैं मिला था जो उसे स्टेशन से ओफिस और ओफिस से स्टेशन तक साथ देता था, उस लडके का नाम विशाल था जिस की स्कूटी पर ' कीसी' ओफिस जाती थी, घर आती थी.

     ' शेठ ब्रदर्स ' का जोब जाने की वजह मैं बना था, ऐसा मनहूस ख्याल परमेश्वर को आया था. लेकिन मैं उस को सच्चाई बयान की तो उस ने मेरी मांफी मांगी थी. उस ने हमारे रिश्ते की सराहना कर के साथ में फ़िल्म देखने की छूट भी दी थी  लेकिन दुनिया के डर से उसे स्वीकारा नहीं था.

       ' कीसी' के मौसा मौसी भी हमारे रिश्ते की इज्जत करते थे. हमारे लिये ईश्वर का मानो सब से बड़ा उपहार था.

        वह हर साल मुझे राखी बांधती थी. मैं विरपसली की रसम अदा करता था तो वह भाई दूज के दिन हमे सह परिवार अपने घर खाना खाने बुलाती थी और कुछ ना कुछ तोहफा देती थी, मैं उसे मना करता था फिर भी वह मुझे कुछ ना कुछ देती ही रहती थी.

      एक बार भाई दूज के दिन हम उस के घर गये थे. तो उस ने बडे उत्साह से परमेश्वर को कहां था.

      " मैं अपने भाई की बाजु में खाना खाने बैठूंगी, तुम भाभी के पास बैठना. " यह सब से बड़ी बात थी जिसे मैं कभी भूला पाया था.

                     0000000000

      दूसरी बार रक्षाबंधन  का त्यौहार था. मैंने ' कीसी' को राखी बांधने का आमंत्रण दिया था, परमेश्वर को भी मैं बुलाता था.

       उस दिन मुशलाधार बारिश हो रही थी. उन की बेटी मुस्कान छोटी थी. बारिश में निकलना संभव नहीं था. वह लोग को मैंने आमंत्रित किया था. उसे रोकने के लिये मैंने लगातार फोन किया था. घंटी बज रही थी. कोई उठा नहीं रहा था. उस का मतलब था वह लोग घर से निकल रहे थे.

      मुझे विशेषत मुस्कान की चिंता हो रही थी.

      और वह लोग हमारे बिल्डिंग के कंपाउंड में दाखिल हुए थे. वह देखकर मैं चकित ऱह गया था. मैंने उन्हें टोका भी था. उस पर परमेश्वर ने सफाई पेश ki थी. आज राखी का दिन हैं तुम्हारी बहन राखी नहीं बांधेगी तो कैसा चलेगा?

      ' कीसी'  केथोलिक थी. उस की बिरादरी में इस त्यौहार का कोई स्थान नहीं था. लेकिन उस ने हिन्दू बिरादरी की तरह मान लिया था, उसे अपना लिया था. अपना त्यौहार बना लिया था. वह बड़ी बात थी.

       मैं उन लोगो का व्यवहार देखकर बहुत भावुक हो गया था. मैंने दोनों को गले लगा दिया था.

        मेरे मात पिता ने भी उन को अपना लिया था. 

        परमेश्वर भी ' कीसी ' की तरह उन का सन्मान करता था.

         उस ने पास पोर्ट के लिये आवेदन किया था. वह उसे मिल गया था तो उस ने प्लेसमेंट एजेंसी को संपर्क किया था तो उसे दुबई से कॉल आया था. और वह जाने को तैयार हो गया था, उस की बेटी दो साल की हो चुकी थी, वह अपने पिता के बिना ऱह नहीं पाती थी. उसे छोड़कर जाना पड़ रहा था. यह बात परमेश्वर के लिये कठिन, नामुमकिन साबित हो रही थी. लेकिन उस का जाना जरुरी था. कुछ भी कहो एक बात को नकारा जा नहीं सकता था. दूसरे देश में ज्यादा पैसे कमाने का चांस था. लेकिन ' कीसी ' यह मानने के लिये तैयार नहीं थी. वह खुद दिल से नहीं चाहती थी, लेकिन परमेश्वर की जिद के सामने झुक गई थी.

      और नियत दिन और समय पर वह दुबई के लिये निकल पड़ा था. हम सब लोग उसे छोड़ने एयर पोर्ट गये थे. उस के साले साली, सास और ग्रैनी सब लोग शामिल थे.

       वह जा रहा था लेकिन मुस्कान उसे छोड़ने को तैयार नहीं थी.

       एक pl बेटी के आगे वह हार गया था. लेकिन उस के सामने सब का सुनहरा भविष्य इंतजार कर रहा था. उस के फेंसले से बहुत लोग नाराज थे. जिस में मेरे पिताजी भी शामिल थे. उस समय मुझे अपने बचपन का किस्सा याद आ रहा था.

       मेरे पिताजी मुझे छोड़कर मुंबई जा रहे थे. और मैं रोता हुआ उस की बस के पीछे भाग रहा था.

       ठीक वैसा ही सिनारियो था. मुस्कान रो रही थी और परमेश्वर हवाई जहाज में चढ़ रहा था.

                   0000000000    ( क्रमशः)