Yaado ki Sahelgaah - 20 in Hindi Biography by Ramesh Desai books and stories PDF | यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (20)

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई (20)

     

               : : प्रकरण -20 : :

        उस दिन खास तो कुछ नहीं हुआ था. मेरी फ्लोरा से कोई बात नहीं हुई थी. मुझे एक लेटर टाइप करवाना था, जो मैं रश्मि को बोल सकता था. लेकिन अगली रात के सपने ने मुझे विचलित कर दिया था. उस को खो बैठने का ख्याल दिलों दिमाग़ पर सवार हो गया था.. इस लिये उस से बात कर के मैं अपना डर दूर करना चाहता था.

        वह किचन में थी. 12-45 का समय हुआ था. वह किशन से बातें कर रही थी. दोनों की आवाज मेरे कानो से टकरा रही थी.

        उस बात से मुझे अचरज हुआ था.

        दोनों के बीच अनबन हो गई थी. वह दोनों एक दूसरे से बात भी नहीं करते थे. फिर ऐसा क्या जादू हो गया था, जिस के कारण दोनों के बीच पेच अप हो गया था.

        मैंने उसे बुलाया था. फिर भी काफ़ी समय तक वह मेरे पास नहीं आई थी. इस से मुझे पहली बार उस पर गुस्सा आया था.

        दूसरी बार मैंने प्यून को भेजा तो वह आई थी.

        आकर ही उस ने मुझे सवाल किया था.

        " क्या बात हैं? "

        " कब से बुला रहा हूं. आती क्यों नहीं. एक अरजेंट लेटर टाइप करना है. "

        " मेरी तबियत ठीक नहीं है. आप रश्मि से लेटर टाइप करवा सकते थे!! "

        उस की इस तरह की बात से मुझे बहुत बुरा लगा था. मेरी भूख मर गई थी. मैंने खाना खाने से मना कर दिया था. उस बात से फ्लोरा को बुरा लगा था. उस ने ही नहीं लेकिन रोज साथ बैठकर खाने वाले सब लोगो ने खाने से मना कर दिया था. मानो सब के सब लोग हड़ताल पर उतर गये थे.

      उस वक़्त मैंने फ्लोरा की डिश से उबला हुआ अंडा उठाकर खाना शुरु किया था. उस के बाद सब लोगो ने खाने का प्रारम्भ किया था.

      खाना खाने के बाद भी मेरा मूड ठीक नहीं हुआ था. उस वक़्त ओपरेटर काजल ने फोन कर के मुझे बताया था.

      " तुम्हारे घर से फोन आया था.. तुम्हारे पिताजी की तबियत ठीक नहीं हैं. तुम्हे तुरंत घर बुलाया हैं.. "

      यह उन दोनों की साजिश थी मुझे इस हालत से दूर रखने की जो मेरी समज़ में आ गई थी. मैं तुरंत सुशील भाई की रजामंदी लेकर ओफिस से बाहर निकल गया था.. लेकिन मैं घर भी नहीं जा सकता था.. इस स्थिति में टिकिट लेकर सिनेमा घर में घूस गया था.

       फ़िल्म में क्या था? मेरा देखने का मूड नहीं था. मैं आंखे बंद किये फ़िल्म पुरी होने तक सिनेमा घर में बैठा रहा था. फ़िल्म छूटने के बाद फ्लोरा का इंतजार कर के मैं उस के घर के बगीचे में बैठा रहा था.

       और सात बजे मैं उस के घर गया था.

        मेरे पूछने पर उस ने खुलासा किया था.

        " किशन मेरे लिये जोब की ओफर लाया था. उसी सिलसिले में मैं उस से बातें कर रही थी. "

         मुझे यह बात रास नहीं आई थी. वह क्यों यकायक उस पर मेहरबान हो गया था.

       जरूर दाल में काला था. फ्लोरा को जोब से बर्खास्त करने की साजिश में किशन शामिल था. फ्लोरा को मुज पर पूरा भरोसा था. इस लिये उस ने किशन की ओफर को नजर अंदाज कर दिया था.

       उस ने मेरे साथ बूरी तरह से बात की थी उस के लिये मेरी मांफी मांगी थी.

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          ओफिस में कुछ लोग ऐसे थे जिस के साथ रहना, कोई बात करना बेकार था.

           उस में सब से पहले रश्मि का मौसरा भाई रामन्ना था. वह दक्षिण भारतीय था. वह ' हम बोला' इस तरह से बोलता था मानो बड़ोदा का नरेश बोलता हो. 

        मैंने ' शेठ ब्रदर्स ज्वाइन किया तब मुझे सिखाने की चेष्टा की थी तो मैंने उसे आड़े हाथ ले लिया था. वह मैनेजमेंट का चमचा था. जूनियर पार्टनर नवनीत राय ने उसे खूब माथे चढ़ाया था. उस की सामने बात करने की हिम्मत नहीं थी. वह पीठ पीछे नवनीत राय को भड़काता था. मेरे और फ्लोरा के रिश्ते के बारे में अनाप सनाप बातें की थी.

        मैं और फ्लोरा बहुत करीब आ गये थे जैसे किस करने के लिये दो मूंह. इस बात से मुझे ' कीसी ' नाम सूझा था. मैं उसे यहीं नाम से बुलाना चाहता था. उस के लिये मैंने फ्लोरा की अनुमति चाही थी. उसे कोई प्रोब्लेम नहीं था, लेकिन लोग क्या कहेंगे उस की चिंता थी. मैंने और खुद परमेश्वर ने उसे समजाया था. वह खुद अपनी बीवी को ' कीची' कहकर बुलाता था.. इस लिये मिलता जुलता नाम उसे भी पसंद आया था.. उस को भी कोई दिक्कत नहीं थी. और उस ने यह नाम स्वीकार कर लिया था.

       फ्लोरा और रामन्ना के टेबल बाजु बाजु में थे. उस की हर बातों पर उस की नजर रहती थी.

       वह मैनेजमेंट का HMV था, चमचा था. वह पूरा रिपोर्ट जूनियर पार्टनर नवनीत राय को देता था.. उसे इस बात में शिस्त भंग होता दिखता था. उस ने मुझे संभाषण देते हुए कहां था. 

       " हमारी ओफिस में डिसीप्लिन नहीं है.! "

       यह सुनकर मुझे बड़ा झटका लगा था.

       मैंने उन को डटकर जवाब दिया था.

       " इस में डिसीप्लिन भंग नहीं बल्कि नजर की गंदगी नजर आ रही है."

         ओफिस में हम दोनों ही थे जो उसे पाई पाई का हिसाब देते थे.

          वह हमारे पीछे था. लेकिन कुछ नहीं कर सकता था.

       उसे फ्लोरा की प्रसूति से नहीं बल्कि उस को लगने वाली छुट्टी से प्रोब्लेम था, साथ में पगार के छुट्टी देनी पड़ेगी यह बात खटकती थी.

       वह पढ़ा लिखा था. लेकिन आज के दौर में ओफिस के नये नियमों से कुछ लेना देना नहीं था.

       मैंने पिकनिक की रात फ्लोरा के बारे में जो सपना देखा था.. वह दूसरे ही दिन नवनीत राय ने अपनी शर्म नाक हरकत से सच कर दिया था.

       उस ने फ्लोरा को अपनी केबिन में बुलाकर बहुत बडे झूठ का सहारा लेकर कहां था.

       " हमारी कंपनी का धंधा कम हो गया हैं, इस लिये हम तुम्हे नौकरी से बर्खास्त कर रहे है. "

      ओफिस में चालीस लोग काम कर रहे थे. उस में केवल फ्लोरा ही ज्यादा लगी.

       ऐसी हरकत कर के उस ने अपने आप को नंगा कर दिया था.

        उस के सामने फ्लोरा ने लोर्ड क्राइस्ट को प्रार्थना की थी.

        " गोद यह आदमी क्या कर रहा हैं. उसे माफ कर देना. "

       ऐसा कहकर वह हंसते हंसते ' शेठ ब्रदर्स' को अलविदा कर गई थी. उस ने तो किसी का बुरा नहीं  किया था लेकिन नवनीत राय को अपना झूठ भारी पड़ा था, धंधा सचमुच नीचे आ रहा था.

                 00000000000    ( क्रमशः)