:: प्रकरण :: 2
एक बार नानी मा की मार खाकर मैं तो ठिकाने आ गया था, लेकिन मेरा बड़ा भाई ने दोबारा स्कूल ना जाते हुए बाहर भटकना शुरू कर दिया. यह जानकर नानी मा ने उसे ढोर मार मारा था. और पडोशी के बंध, अंधेरे कमरे में उसे कैद कर दिया. उसे खाना पीना कुछ नहीं दिया. और वह बीमार पड़ गया.
उस के कई उपचार किये लेकिन उस की हालत में कोई सुधार नहीं आया.
एक दिन मैं स्कूल जाने के लिये तैयार होकर खाना खाने बैठा था. मेरा बड़ा भाई मेरे पीछे ही सोया हुआ था. उस को बुखार था.
उस वक़्त पोस्ट मेन एक पोस्ट कार्ड डालकर चला गया था, जो उस के बाजु में ही गिरा था. बडे भाईने उसे उठाकर पढ़ने का प्रयास किया, तो नानी मा ने सहज उसे सवाल किया.
" किस का ख़त हैं.? "
उस ने जवाब देने की कोशिश की. वह केवल इतना ही बोल पाया.
" पप पप पप्पा का, मम मम मौसी का. "
इतना बोलकर उस की जुबान अटक गई. वह कुछ बोल नहीं पा रहा था. इस हालत में नानी मा ने मौसी के लडके को बुलाया. वह भी भाई की हालत देखकर चिंतित किया. उस ने तुरंत मेरे पिताजी को ट्रंक कोल किया और पांच बजे तक मेरे पिताजी नई मा के साथ हांसोट पहुंच गये.
उस की हालत काफ़ी गंभीर थी. इस स्थिति में डोक्टर ने उसे सूरत ले जाने की राय दी. और हम लोग टेक्सी में सूरत पहुंच गये. उस वक़्त शाम को 6-30 बजे थे. नई मा के ममेरे भाई डोक्टर थे. उन्होंने ने ताबड़तोड़ उपचार शुरू कर दिया लेकिन उसे बचा ना सके.
दूसरे दिन ठीक 6-30 बजे बडे भाई ने देह त्याग दिया. उस वक़्त दो कड़े दुश्मन, दो नानी मा को भगवान ने आमने सामने ऱख दिया, और मेरे भाई ने उन्ही के घर में देह त्याग दिया.
भाई के मौत से पिताजी को बहुत बड़ा धक्का लगा. उस के लिये नानी मा ने नई मा को जिम्मेदार ठहराया, ज़ब की मेरे पिताजी ने उनकी लापरवाही को जिम्मेदार माना. यह सुनकर वह अपना रोना नहीं रोक पाये थे.
उस में उन बेचारी की कोई गलती नहीं थी. लेकिन उन्होंने जो क्रूर, निर्दय व्यवहार भाई के साथ किया था, उस का ही यह नतीजा था. इस बात को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता था.
उस स्थिति में पिताजी ने अपना फ़ेंसला नानी मा को सुनाया था.
आज से मैं अपने बच्चों को अपने पास ही रखूंगा.
उस पर नानी मा ने एतराज व्यक्त किया था. रोना धोना शुरू किया था. उस से प्रभावित होकर पिताजी ने मेरी बहन भाविका को उन की कस्टडी में रखा था. यह मेरे पिताजी की सब से बड़ी भूल साबित हुई थी., जिस ने हम दोनों भाई बहनों के रिश्ते को कभी बनने नहीं दिया था.
पिताजी के साथ मैं मुंबई आ गया था.
नानी मा दो तीन महिनो में भाविका को लेकर मुंबई आते थे. एक हप्ते के लिये आते थे, और दो महिने तक वापस नहीं जा सकते थे.
हमारी नई नानी मा को हम से क्या दुश्मनी थी? वह हम को अछूत मानती थी, कभी पास नहीं आने देती थी.
उन की एक सौतेली बेटी थी, जो रिश्ते में मेरी मौसी लगती थी. उसे भी हम से क्या दुश्मनी थी? उस का पति भी मेरे पीछे पड़ा था. वह दोनों अक्सर मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करते थे.. मेरी बुद्धू लडके में गिनती करते थे. मेरा आत्म विश्वास तोड़ने की कोशिश करते थे. वह दोनों डरते थे अगर मेरी नई मा ने मुझे बेटा स्वीकार लिया तो संपत्ति में मेरा भाग लगेगा.
मुझे उन से दूर रखने की कोशिश में एक दिन शाम को चार बजे की करीब वह हमारे घर आई थी. उस ने नई मा को आदेश दिया था.
" चलो तैयार हो जाओ. हमें अस्पताल जाना हैं. "
यह सुनकर मैंने जिद की थी." मुझे भी साथ ले चलो. "
उस पर मौसी ने यह कहकर मुझे रोका था.
" छोटे बच्चे अस्पताल नहीं जा सकते. "
मरीज और गीता बहन का कोई संबंध नहीं था, फिर भी मैं अकेली नहीं जा सकती, ऐसा बहाना बनाकर नहीं मा को साथ घसीट ले गई थी.
मैं अकेला घर में था. मैं रो रहा था.
उस समय पड़ोश में रहने वाली अनन्या मेरी मदद को आई थी. उस ने मेरे पिताजी का डायरी से फोन नंबर लेकर उन्हें बताया था :
" आप का बेटा घर में अकेला रो रहा हैं. आप फ़ौरन घर आ जाइये. "
और वह सब काम छोड़कर घर दौड़े आये थे.
वह तुरंत मुझे मौसी के घर ले गये थे. घर में उनकी नौकरानी मौजूद थी, उसे वह कौन सी अस्पताल में गये थे उस का पता नहीं था.
इस स्थिति में हम बाप बेटे मायूस होकर घर लौट आये थे.
ठीक 7-30 बजे गीता बहन घर लौट आये थे.. मेरे पिताजी ने उन्हें बहुत भला बुरा कहां था. और वह बच्चे की भ्रान्ति रोने लग गये थे.
और मेरे पिताजी हमें होटल में खाना खाने ले गये थे. और फ़िल्म भी दिखाई थी.
00000000000 ( क्रमशः)