Garbha Sanskar - 18 in Hindi Women Focused by Praveen Kumrawat books and stories PDF | गर्भ संस्कार - भाग 18 - ऐक्टिविटीज़–17

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गर्भ संस्कार - भाग 18 - ऐक्टिविटीज़–17

प्रार्थना:
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए, 
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए। 
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें, 
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक वीर व्रत धारी बनें।

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..

निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी न करें, 
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी न करें। 
सत्य बोलें, झूठ त्यागे, मेल आपस में करें, 
दिव्य जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें।

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..

जाए हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में, 
हाथ डालें हम कभी न भूल कर अपकार में। 
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा, 
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा।

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..

प्रेम से हम गुरु जनों की नित्य ही सेवा करें, 
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें। 
योग विद्या ब्रह्म विद्या हो अधिक प्यारी हमें, 
ब्रह्म निष्ठा प्राप्त कर के सर्व हितकारी बनें। 

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..

हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए, 
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।

मंत्र:
धर्मेण यत्र लोकाः सर्वे सुखं समुपाश्रिताः।
सर्वे सन्तुष्टिमायान्ति धन्यं धर्मनिष्ठितं।

अर्थ: जहां धर्म का पालन होता है, वहाँ सभी प्राणी सुखी होते हैं। इस श्लोक से यह प्रेरणा मिलती है कि जब हम अपने जीवन में धर्म का पालन करते हैं, तो न केवल हमारे जीवन में शांति आती है, बल्कि हमारा समाज भी सुखी और समृद्ध होता है।

गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारा भविष्य तुम्हारे प्रयासों और विचारों पर निर्भर करता है। अगर तुम आज से ही अपनी दिशा सही करते हो, तो कल तुम्हारा भविष्य शानदार होगा। मैं चाहती हूं कि तुम अपने भविष्य के लिए खुद को पूरी तरह से तैयार करो, क्योंकि यह तुम्हारे हाथों में है। जितना तुम मेहनत और समर्पण से इसे आकार दोगे, उतना ही तुम्हारा भविष्य तुम्हारे लिए शानदार होगा।”

पहेली:
सुख-दुख की जीवन साथी 
पग-पग साथ निभाती हूँ। 
क्षण भर भी मैं जुदा न होती 
हाँ, बड़ी, छोटी बन जाती हूँ।

कहानी: शिवाजी महाराज की वीरता
भारत के इतिहास में छत्रपति शिवाजी महाराज का नाम हमेशा सम्मान से लिया जाता है। उनका जीवन न केवल वीरता का प्रतीक था, बल्कि उनके नेतृत्व, राजनीति और सामाजिक सुधारों ने भारतीय समाज और सैन्य इतिहास को गहरे तौर पर प्रभावित किया। शिवाजी महाराज की वीरता की कहानियाँ आज भी लोगों को प्रेरित करती हैं और उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अग्रदूतों में शुमार है।

शिवाजी महाराज का जन्म:
शिवाजी महाराज का जन्म 19 फरवरी 1630 को पुणे जिले के शिवनेरी किले में हुआ था। वे एक महान मराठा शासक थे और उन्हें भारतीय इतिहास के सबसे महान योद्धाओं में गिना जाता है। उनके पिता शाहजी भोसले, एक मराठा सेनापति थे और उनकी माता जीजाबाई, एक अत्यंत प्रेरणादायक महिला थीं। जीजाबाई ने शिवाजी महाराज को युद्ध की कला, राज्य संचालन और प्रशासन की शिक्षा दी, और यही शिक्षा शिवाजी महाराज के जीवन में एक बड़ा मार्गदर्शन बनी।

शिवाजी महाराज की वीरता की पहली मिसाल:
शिवाजी महाराज ने अपनी वीरता की शुरुआत बहुत कम उम्र में की थी। मात्र 16 साल की उम्र में, उन्होंने पुणे के पास स्थित तोर्णा किले पर हमला कर उसे अपनी पकड़ में लिया। यह उनकी पहली सैन्य विजय थी और इसके बाद शिवाजी महाराज ने अपने जीवन के हर चरण में यही साबित किया कि उनकी वीरता और युद्ध कौशल किसी से कम नहीं था। 

लेकिन शिवाजी महाराज की वीरता केवल युद्ध तक सीमित नहीं थी। वह एक रणनीतिकार भी थे, जिनकी सोच समय से कहीं आगे थी। उनके द्वारा किए गए हमले और युद्ध न केवल उनके शौर्य का प्रतीक थे, बल्कि उनकी सूझबूझ और नीतियों ने उन्हें एक महान सेनापति बना दिया।

शिवाजी महाराज की महान सैन्य रणनीतियां:
शिवाजी महाराज ने युद्ध की रणनीतियों में नवीनतम तरीके अपनाए, जो उनकी वीरता को और भी प्रभावी बनाते थे। उनके द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सैन्य रणनीतियां आज भी सैन्य स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं। उनका ध्यान हमेशा छापामार युद्ध (guerrilla warfare) पर था, क्योंकि वे जानते थे कि बड़े-बड़े किलों और महलों को घेरने से ज्यादा असरदार छोटे-छोटे हमले होंगे। 

उनके पास कुछ विशिष्ट युद्ध कौशल थे:
सैन्य की गति और चपलता: शिवाजी महाराज की सेनाएं आम तौर पर हल्की होती थीं, जिससे वे तेजी से हमला करने में सक्षम होती थीं। वे बहुत जल्दी अपनी सैन्य स्थिति बदल सकते थे और दुश्मन को उलझा कर अपने किले में सुरक्षित वापसी कर सकते थे।

गुप्त मार्गों का प्रयोग: शिवाजी महाराज ने किलों में और उनके आस-पास के इलाके में गुप्त रास्तों का निर्माण कराया, जिससे उनकी सेना बिना किसी के ध्यान में आए दुश्मन पर हमला कर सकती थी।

लोकप्रिय समर्थन:
शिवाजी महाराज ने हमेशा अपने लोगों को जोड़ा और उनकी भलाई के लिए काम किया। इस कारण उन्हें आम जनता का भरपूर समर्थन मिला, जिससे उन्हें लगातार संसाधन और जानकारी मिलती रही।

शिवाजी महाराज और अफजल खान का युद्धः
शिवाजी महाराज का सबसे प्रसिद्ध युद्ध अफजल खान के साथ था, जो कि बीजापुर के सुलतान आदिलशाह का सेनापति था। अफजल खान शिवाजी महाराज को पकड़ने के लिए आया था, लेकिन शिवाजी महाराज ने अपनी बहादुरी और कूटनीति का उपयोग करके उसे हराया। अफजल खान को शिवाजी महाराज से मिलने के लिए कोंधलाज (महाराष्ट्र) में एक जगह पर बुलाया गया था।

शिवाजी महाराज ने अपनी सेना के साथ रणनीति बनाई और शाही तंबू में अपने हथियारों को छिपाकर अफजल खान से मिलने गए। जब दोनों मिलकर बात कर रहे थे, तब अचानक अफजल खान ने शिवाजी महाराज पर हमला कर दिया। शिवाजी महाराज ने भी बचाव में हमला किया। अफजल खान के पूरे सैन्य दस्ते को इस हमले का कोई अंदाजा नहीं था। शिवाजी महाराज ने अफजल को हराकर मार डाला। इस युद्ध ने शिवाजी महाराज की वीरता और युद्ध कौशल को सिद्ध किया और उनका नाम पूरे भारत में फैल गया।

शिवाजी महाराज और मुघल बादशाह औरंगजेब: 
शिवाजी का संघर्ष सिर्फ आदिल शाह तक सीमित नहीं था, बल्कि उनका मुख्य संघर्ष औरंगजेब से था, जो उस समय का सबसे शक्तिशाली मुघल बादशाह था। औरंगजेब ने शिवाजी महाराज को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाने के लिए कई बार कोशिश की, लेकिन शिवाजी महाराज ने हमेशा अपनी स्वतंत्रता की रक्षा की।

शिवाजी का सबसे बड़ा साहसिक कदम 1666 में मुघल बादशाह औरंगजेब से मिलने के लिए दिल्ली जाना था। शिवाजी महाराज ने अपने जीवन के सबसे कठिन समय में भी औरंगजेब से खुली बातचीत की और एक महल में बंद कर दिए जाने के बावजूद उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की कीमत को समझा। बाद में, शिवाजी महाराज ने औरंगजेब से सफलतापूर्वक भागकर अपने किलों में वापस लौटने में सफलता प्राप्त की, जो उनकी वीरता और साहस का सबसे बड़ा उदाहरण था।

शिवाजी महाराज की राज्य प्रबंधन नीति:
शिवाजी महाराज केवल एक महान सेनापति नहीं थे, बल्कि वे एक कुशल शासक भी थे। उन्होंने अपने राज्य के प्रशासन में कई सुधार किए। उनका प्रशासन सुसंगठित और अनुशासित था। उन्होंने अपने राज्य के हर हिस्से को ठीक से नियंत्रित किया।

उन्होंने सशक्त पुलिस व्यवस्था, कर प्रणाली और कानूनी ढांचा स्थापित किया। उनका शासन आम लोगों के हित में था और उन्होंने हमेशा यह सुनिश्चित किया कि उनके राज्य में शांति और व्यवस्था बनी रहे।

शिवाजी महाराज का धार्मिक सहिष्णुता और समाज सुधार:
शिवाजी महाराज ने धार्मिक सहिष्णुता का हमेशा पालन किया। उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को सम्मान दिया और उन्हें समान अधिकार दिए। वे एक ऐसे शासक थे, जो अपनी प्रजा की भलाई के लिए काम करते थे, चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान। शिवाजी महाराज का आदर्श यही था कि राज्य का कल्याण तभी संभव है जब सभी लोग एकजुट होकर अपने धर्म और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करें।

शिवाजी महाराज का अंतिम समयः
शिवाजी महाराज का निधन 1680 में हुआ। उनका जीवन और उनके योगदान भारतीय समाज और संस्कृति में अमर हो गए। उन्होंने भारतीय इतिहास में अपनी वीरता और नायकत्व के रूप में एक अमिट छाप छोड़ी। उनकी नीति और उनके कार्य आज भी भारत के विभिन्न हिस्सों में लोगों को प्रेरित करते हैं।

शिक्षा:
शिवाजी महाराज की वीरता हमें यह सिखाती है कि एक व्यक्ति का साहस, नेतृत्व और रणनीतिक सोच किसी भी महान कार्य को पूरा करने के लिए जरूरी हैं। शिवाजी महाराज ने हमें यह भी सिखाया कि एक महान सेनापति वही होता है जो अपने सैनिकों को केवल युद्ध की रणनीति नहीं, बल्कि उनके भले के लिए काम करने की प्रेरणा भी दे।

पहेली का उत्तर : परछाई
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प्रार्थना:
तूने हमें उत्पन्न किया, पालन कर रहा है तू। 
तुझसे ही पाते प्राण हम, दुखियों के कष्ट हरता तू ॥ 
तेरा महान् तेज है, छाया हुआ सभी स्थान। 
सृष्टि की वस्तु-वस्तु में, तू हो रहा है विद्यमान ॥ 
तेरा ही धरते ध्यान हम, मांगते तेरी दया। 
ईश्वर हमारी बुद्धि को, श्रेष्ठ मार्ग पर चला ॥

मंत्र:
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाह् पर्युपासते। 
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्।

अर्थः जो लोग मुझमें निःसंदेह विश्वास रखते हुए बिना विचलित हुए मेरी पूजा करते हैं, मैं उनका योगक्षेम अर्थात् उनके जीवन की सभी आवश्यकताएं पूरी करता हूँ। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने बताया कि जब हम भगवान पर पूरी श्रद्धा और विश्वास रखते हैं, तो वह हमारे जीवन की सभी परेशानियों का समाधान कर देते हैं।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारा भविष्य तुम्हारे भीतर छुपी हुई अपार संभावनाओं से बना है। जब तुम अपने भीतर की शक्ति और क्षमता को पहचानते हो, तो तुम कोई भी लक्ष्य हासिल कर सकते हो। मैं चाहती हूं कि तुम अपने भविष्य के बारे में हमेशा उम्मीद रखो, क्योंकि तुम्हारे भीतर इतनी शक्ति है कि तुम किसी भी सपने को साकार कर सकते हो।”

पहेली:
आग भरे गुड़गूडीया दास, 
पेट में जिनके पानी, 
पूंछ लगाकर उसकी मुँह में, 
उगले धुआँ रमजानी।

कहानी: फूलों की भाषा
किसी समय की बात है, एक बड़े से बग़ीचे में कई प्रकार के रंग-बिरंगे , फूल खिले थे। वहाँ गुलाब, सूरजमुखी, चमेली, जासमीन, और कई तरह के अन्य फूलों की महक से हवा महकती रहती थी। यह बग़ीचा गाँव के बच्चों और बड़े सभी का पसंदीदा स्थल था। हर कोई वहाँ आकर फूलों की सुंदरता का आनंद लेता था, लेकिन फूलों के बीच एक ऐसा फूल था, जिसका नाम था मुरझाया। मुरझाया गुलाब था, हमेशा किसी को भी देखने पर उदास लगता था।

जब भी कोई उसे देखता, वह बस मुरझाए हुए पत्तों के साथ खड़ा रहता। लोग उसके पास से गुजरते हुए उसे अनदेखा कर देते। मुरझाया गुलाब कई बार सोचता, “क्या मुझे कभी वह प्यार मिलेगा, जो बाकी फूलों को मिलता है?”

एक दिन बग़ीचे में एक लड़की आई, जिसका नाम था निधि। वह हमेशा फूलों से बातें करती और उनके बारे में जानने की कोशिश करती थी। वह एक दिन मुरझाए गुलाब के पास गई और उसे देखा। उसकी पत्तियाँ सूखी और मुरझाई हुई थीं, लेकिन निधि को उसकी सुंदरता में कुछ खास महसूस हुआ। उसने गुलाब से कहा, “तुम इतने उदास क्यों हो? तुम सुंदर हो, तुम्हारे पास वह रंग और खुशबू है जो दूसरों के पास नहीं है।”

मुरझाया गुलाब धीरे से बोला, “मुझे लगता है कि कोई मुझे पसंद नहीं करता। मैं बाकी फूलों की तरह रंग-बिरंगा और खुशबूदार नहीं हूं। लोग मुझे नजरअंदाज करते हैं।”

निधि मुस्कराई और बोली, “तुम्हें यह समझना होगा कि सुंदरता केवल बाहरी रूप में नहीं होती। असली सुंदरता तो तुम्हारी आत्मा में है। तुम्हारी सजावट और रंग तुम्हारे अंदर की सुंदरता का केवल एक बाहरी रूप हैं।”

गुलाब ने सोचा और महसूस किया कि उसे खुद को पहचानने की जरूरत थी। अगले दिन से, वह अपने मुरझाए हुए पत्तों को छोड़कर अपने भीतर की सुंदरता को जानने लगा। वह महसूस करने लगा कि उसे बाहरी रूप की बजाय अपनी आत्मा की सुंदरता को महकने देना चाहिए। धीरे-धीरे उसका मुरझाना खत्म हुआ और उसने अपने असली रंगों को पहचान लिया। अब लोग उसे न सिर्फ देखते, बल्कि उसकी महक और सुंदरता की सराहना करते थे।

शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि असली सुंदरता हमारी आत्मा में होती है, न कि सिर्फ बाहरी रूप में। हमें अपनी आंतरिक विशेषताओं को समझना और उन्हें विकसित करना चाहिए। जो चीज़ हमसे अनदेखी लगती है, वह कभी न कभी अपनी असल पहचान पा ही लेती है।

पहेली का उत्तर : हुक्का
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प्रार्थना:
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे।।
जग सिरमौर बनाएँ भारत,
वह बल विक्रम दे। वह बल विक्रम दे।।
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
साहस शील हृदय में भर दे,
जीवन त्याग-तपोमय कर दे,
संयम सत्य स्नेह का वर दे,
स्वाभिमान भर दे। स्वाभिमान भर दे ॥ १ ॥ 
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..
लव-कुश, ध्रुव, प्रहलाद बनें हम
मानवता का त्रास हरें हम,
सीता, सावित्री, दुर्गा मां,
फिर घर-घर भर दे। फिर घर-घर भर दे॥२॥
हे हंसवाहिनी ज्ञान दायिनी
अम्ब विमल मति दे। अम्ब विमल मति दे..

मंत्र:
स्वधर्मे निधनं श्रेयं परधर्मो भयावहः। 
स्वधर्मे न स्थिते जन्तो दुःखं प्राप्नोति निश्चितम्।

अर्थः अपने धर्म का पालन करना सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि परधर्म में भय और अशांति है। जब हम अपने कर्तव्यों को ठीक से निभाते हैं, तो हम निश्चित रूप से सुख और शांति प्राप्त करते हैं। इस श्लोक से यह सिखने को मिलता है कि हमें हमेशा अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और किसी भी परिस्थिति में अपने धर्म से विचलित नहीं होना चाहिए।

गर्भ संवाद:
“तुम्हारा भविष्य सिर्फ एक सपना नहीं है, बल्कि यह तुम्हारे आज के फैसलों और कार्यों से बनता है। हर दिन जो तुम सोचते हो और करते हो, वही तुम्हारे भविष्य को आकार देता है। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन को एक अवसर समझो, क्योंकि यह तुम्हारे भविष्य का आधार है। अगर तुम आज सही दिशा में काम करते हो, तो भविष्य में तुम्हारी सफलता खुद-ब-खुद सामने आएगी।”

पहेली:
एक पेड़ कश्मीरा
कुछ लोग फरे, 
कुछ जीरा, कुछ ककड़ी 
कुछ खीरा।

कहानी: पर्वत की महानता
बहुत समय पहले, एक छोटे से गाँव में, एक विशाल पर्वत खड़ा था। यह पर्वत गाँव के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान था और लोगों का मानना था कि यह पर्वत किसी देवता का निवास स्थान था। यह पर्वत गाँववालों के लिए न केवल सुरक्षा का प्रतीक था, बल्कि वे इसकी महानता और शांति से प्रेरित होते थे। लेकिन इस पर्वत के शिखर पर चढ़ने की कोशिश करने वालों की संख्या बहुत कम थी। लोग कहते थे कि यह पर्वत बहुत कठिन था और उसके शिखर तक पहुँचना किसी के लिए आसान नहीं था।

एक दिन एक युवा लड़का जिसका नाम अर्जुन था, गाँव में आया। अर्जुन का सपना था कि वह पर्वत की चोटी तक पहुंचे। गाँववालों ने उसे यह सलाह दी कि वह इस मुश्किल यात्रा पर न जाए, क्योंकि यह किसी के लिए संभव नहीं था। लेकिन अर्जुन का दिल दृढ़ था। उसने ठान लिया कि वह पर्वत की चोटी पर जरूर पहुंचेगा।

अर्जुन ने यात्रा शुरू की और पहले ही दिन उसे कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। तंग रास्ते, खड़ी चढ़ाई और कठिन मौसम ने उसे बहुत परेशान किया। कई बार वह थक कर बैठ जाता, लेकिन वह अपने सपने को छोड़ने का नाम नहीं लेता। वह हर बार उठता, अपनी चोटों को सहता, और फिर से चढ़ाई शुरू करता।

यात्रा के दौरान, अर्जुन ने महसूस किया कि पर्वत की कठिनाई से उसे सिर्फ शारीरिक थकान ही नहीं हो रही थी, बल्कि उसकी मानसिक स्थिति भी परखी जा रही थी। कई बार उसे लगा कि वह हार मान जाए, लेकिन उसका दृढ़ संकल्प उसे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता रहा।

अर्जुन ने अपने रास्ते में पड़ने वाले छोटे-छोटे पहाड़ी गाँवों से मदद ली। गाँववालों ने उसे सहारा दिया, उसे ऊर्जा दी और उसकी हिम्मत बढ़ाई। अंततः कई महीनों की कठिन यात्रा के बाद, अर्जुन ने पर्वत की चोटी पर पहुँचकर अपने लक्ष्य को हासिल किया। उसने पाया कि शिखर तक पहुँचने का रास्ता जितना कठिन था, उतना ही अद्भुत और संतोषजनक था।

जब अर्जुन ने शिखर पर पहुँचकर नीचे देखा, तो उसने महसूस किया कि इस यात्रा ने उसे शारीरिक नहीं, बल्कि मानसिक रूप से भी मजबूत बना दिया। वह समझ चुका था कि अगर किसी को अपने सपने को पूरा करना है, तो उसे कड़ी मेहनत, धैर्य और आत्मविश्वास की जरूरत होती है।

शिक्षा:
पर्वत की कहानी हमें यह सिखाती है कि जीवन में सफलता पाने के लिए हमें कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। जब तक हम अपने लक्ष्यों के प्रति पूरी मेहनत और समर्पण के साथ आगे बढ़ते हैं, तब तक कोई भी बाधा हमें रोक नहीं सकती।

पहेली का उत्तर : महुआ
======================== 146

प्रार्थना:
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तारदे माँ

हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ

तू स्वर की देवी, ये संगीत तुझसे
हर शब्द तेरा है, हर गीत तुझसे
हम है अकेले, हम है अधूरे
तेरी शरण हम, हमें प्यार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ

मुनियों ने समझी, गुणियों ने जानी
वेदों की भाषा, पुराणों की बानी
हम भी तो समझे, हम भी तो जाने
विद्या का हमको अधिकार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ

तू श्वेतवर्णी, कमल पर विराजे
हाथों में वीणा, मुकुट सर पे साजे
मन से हमारे मिटाके अँधेरे
हमको उजालों का संसार दे माँ
हे शारदे माँ, हे शारदे माँ
अज्ञानता से हमें तार दे माँ

मंत्र:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

अर्थः हे भगवान गणेश! आप विशालकाय और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। हमारे सभी कार्य बिना विघ्न के पूरे करें।

गर्भ संवाद:
“अपने भविष्य के लिए एक ठोस योजना बनाना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह भी जरूरी है कि तुम उस यात्रा का आनंद लो जो तुम्हें उस भविष्य तक ले जाती है। सफलता का सफर उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कि मंजिल। मैं चाहती हूं कि तुम अपने भविष्य के लिए कदम बढ़ाओ, लेकिन साथ ही उस यात्रा के हर पल का आनंद लो, क्योंकि यही तुम्हारे जीवन का सबसे सुंदर हिस्सा होगा।”

पहेली:
चार खड़े, चार पड़े 
बीच में ताने बाने 
पसरे हैं लम्बोदर लाला 
लम्बी चादर ताने।

कहानी: आत्मा और परमात्मा
बहुत समय पहले, एक छोटे से गाँव में एक साधक का वास था। उसका नाम था नारायण। वह जीवन के सच्चे उद्देश्य की खोज में निकला हुआ था। नारायण को हमेशा यह जानने की इच्छा थी कि आत्मा और परमात्मा का संबंध क्या है। वह बहुत समय से यह समझने की कोशिश कर रहा था कि आत्मा और परमात्मा के बीच की दूरी क्या है और कैसे आत्मा परमात्मा से जुड़ी हुई है।

नारायण ने कई वर्षों तक ध्यान और साधना की, लेकिन उसे संतुष्टि नहीं मिली। एक दिन उसने गाँव के सबसे बड़े गुरु से यह सवाल पूछा, “गुरुजी, आत्मा और परमात्मा के बीच क्या अंतर है? कैसे मैं अपनी आत्मा को परमात्मा से मिला सकता हूँ।”

गुरु मुस्कराए और बोले, “नारायण, आत्मा और परमात्मा के बीच कोई अंतर नहीं है। वह दोनों एक ही सत्य के रूप हैं। आत्मा को परमात्मा का अंश माना जा सकता है और जब आत्मा अपने सत्य को समझती है तब वह परमात्मा से मिल जाती है। जैसे नदियाँ समुद्र में मिलकर एक हो जाती हैं, वैसे ही आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। आत्मा और परमात्मा का मिलन तब होता है, जब हम अपने भीतर की सीमाओं को छोड़कर, परमात्मा की अपारता को समझने लगते हैं।” नारायण ने गुरु की बातों को गहरे से सुना और ध्यान लगाया। धीरे-धीरे, उसे महसूस होने लगा कि उसके भीतर एक अद्वितीय शांति और ऊर्जा है।

उसने महसूस किया कि वह परमात्मा के साथ जुड़ा हुआ है, और यह जुड़ाव केवल उसकी आंतरिक जागरूकता और प्रेम के माध्यम से ही संभव था।

एक दिन, जब नारायण ध्यान में लीन था, उसे यह एहसास हुआ कि आत्मा और परमात्मा का संबंध केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक गहरी अनुभूति है। जब वह अपने भीतर की आवाज़ सुनने लगा, तब उसे लगा कि परमात्मा हमेशा उसके साथ है, और वह कभी अकेला नहीं है। उसे समझ में आ गया कि आत्मा और परमात्मा का मिलन तब होता है, जब व्यक्ति अपनी सच्चाई को समझता है और अपने अहंकार को छोड़ देता है।

यह जान नारायण ने अपनी साधना को और गहरा किया और अंततः उसे परमात्मा का साक्षात्कार हुआ। वह जान चुका था कि आत्मा और परमात्मा का संबंध केवल अनुभव के माध्यम से समझा जा सकता है, और यह अनुभव तब प्राप्त होता है जब हम अपनी अंतरात्मा को शुद्ध करते हैं और अपनी सच्चाई को समझते हैं।

शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि आत्मा और परमात्मा के बीच कोई भेद नहीं है। दोनों एक ही दिव्य सत्य के रूप हैं और हम तब परमात्मा से मिलते हैं, जब हम अपनी आंतरिक जागरूकता और प्रेम को परमात्मा की ओर मोड़ते हैं। आत्मा और परमात्मा का मिलन केवल हमारी अंतरात्मा के शुद्ध होने से संभव होता है।

पहेली का उत्तर : चारपाई
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प्रार्थना:
सभी सुखी हो, सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो, सबका दुःख दुर हो, सबका वैर शांत हो। इस संसार मे रहने वाले सारे प्राणियो की पीड़ा समाप्त हो वे सुखी और शांत हो। चाहे वे जीव जल मे रहने वाले हो या स्थल मे या फिर गगन मे रहने वाले। सभी सुखी हो। इस पूरे ब्रह्माण्ड मे सभी दृश्य और अदृश्य जीवो का कल्याण हो। बह्मांड मे रहने वाले सभी जीव और प्राणी सुखी हो वे पीड़ा से मुक्त हो।

मंत्र:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥

अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते है— जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं होता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।

गर्भ संवाद:
“तुम्हारे विश्वास से ही तुम्हारा भविष्य बनता है। जब तुम खुद पर और अपने प्रयासों पर विश्वास करते हो, तो तुम्हारा हर कदम एक सफलता की ओर बढ़ता है। जीवन में कई उतार-चढ़ाव आएंगे, लेकिन अगर तुम आत्मविश्वास से भरे रहते हो, तो तुम्हारा भविष्य हर रोज़ बेहतर होता जाएगा। मैं चाहती हूं कि तुम अपने आत्मविश्वास को कभी भी कम न होने दो, क्योंकि यह तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है।”

पहेली:
पत्थर पर पत्थर 
पत्थर पर पैसा 
बिना पानी के घर बनावे 
वह कारीगर कैसा?

कहानी: निर्मल मन की शक्ति
एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में एक साधक रहा करता था, जिसका नाम था राघव। राघव को जीवन में शांति और संतुलन की तलाश थी, लेकिन उसका मन हमेशा अशांत रहता था। उसे यह महसूस होता था कि बाहरी दुनिया के शोर-शराबे और तनाव के कारण वह कभी भी मानसिक शांति को अनुभव नहीं कर पाता था। वह सोचता था कि जब तक उसका मन शांत नहीं होगा, तब तक वह कभी सच्ची शांति प्राप्त नहीं कर सकेगा।

एक दिन, राघव ने गाँव के एक प्रसिद्ध संत से सुना कि निर्मल मन की शक्ति अत्यधिक है। संत ने कहा, “जब मन पूरी तरह से शांत और निर्मल हो, तब वह सभी दुखों से मुक्त होता है और उस व्यक्ति को सच्ची शांति प्राप्त होती है।” राघव ने यह सुना और सोचा, “मुझे भी निर्मल मन की शक्ति का अनुभव करना चाहिए।” वह संत के पास गया और उनसे यह पूछा, “गुरुजी, मुझे निर्मल मन की शक्ति प्राप्त करनी है। क्या आप मुझे मार्गदर्शन देंगे?”

संत मुस्कराए और बोले, “राघव, निर्मल मन वह मन है जो सभी विचारों, इच्छाओं और विकारों से मुक्त हो। जब तुम्हारा मन पूरी तरह से शुद्ध होगा, तब तुम अपने भीतर की शांति और संतुलन को महसूस करोगे। सबसे पहले, तुम्हे अपने विचारों को नियंत्रित करना होगा। तुम जो सोचते हो, वही तुम्हारी दुनिया बन जाती है। जब तुम अपने विचारों को सकारात्मक और शुद्ध बनाओगे, तब तुम्हारा मन भी निर्मल हो जाएगा।”

राघव ने संत के शब्दों को ध्यान से सुना और उनकी बातों को अपनी जीवनशैली में लागू करना शुरू किया। उसने अपने मन को शांत करने के लिए ध्यान करना शुरू किया और अपने विचारों को नियंत्रित करने की कोशिश की। धीरे-धीरे, उसे यह महसूस हुआ कि उसका मन पहले से कहीं अधिक शांत हो गया था। वह बाहरी दुनिया के शोर से अधिक प्रभावित नहीं होता था और उसे अपने भीतर एक गहरी शांति का अहसास होने लगा।

कुछ समय बाद, राघव ने देखा कि जब उसका मन निर्मल हो गया, तो उसे जीवन की समस्याओं का सामना करना अधिक आसान हो गया। वह बिना किसी तनाव के अपने कार्यों को करता और हर परिस्थिति में शांति बनाए रखता। उसे यह समझ में आ गया कि निर्मल मन की शक्ति ही सच्ची शक्ति है, क्योंकि जब मन शांत होता है, तो व्यक्ति हर स्थिति का सामना बिना घबराए करता है और अपने भीतर की शक्ति को महसूस करता है। 

शिक्षा:
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि निर्मल मन की शक्ति हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण होती है। जब हम अपने मन को शुद्ध करते हैं और अपने विचारों को नियंत्रित करते हैं, तो हम मानसिक शांति और संतुलन प्राप्त करते हैं। निर्मल मन ही हमें जीवन में सच्ची शक्ति प्रदान करता है और यह शक्ति हमें हर चुनौती का सामना करने में मदद करती है।

पहेली का उत्तर : मकड़ी
===========================148

गीता सार:
आप चिन्ता करते हो तो व्यर्थ है।
मौत से जो डरते हो तो व्यर्थ है।।
आत्मा तो चिर अमर है जान लो।
तथ्य यह जीवन का सच्चा अर्थ है।।

भूतकाल जो गया अच्छा गया। 
वर्तमान देख लो चलता भया।। 
भविष्य की चिन्ता सताती है तुम्हें? 
है विधाता सारी रचना रच गया।।

नयन गीले हैं तुम्हारा क्या गया? 
साथ क्या लाये जो तुमने खो दिया? 
किस लिए पछता रहे हो तुम कहो?
जो लिया तुमने यहीं से है लिया।।

नंगे तन पैदा हुए थे खाली हाथ।
कर्म रहता है सदा मानव के साथ।। 
सम्पन्नता पर मग्न तुम होते रहो।
एक दिन तुम भी चलोगे खाली हाथ।।

धारणा मन में बसा लो बस यही। 
छोटा-बड़ा, अपना-पराया है नहीं।। 
देख लेना मन की आँखों से जरा। 
भूमि-धन-परिवार संग जाता नहीं।।

तन का क्या अभिमान करना बावरे। 
कब निकल जाये यह तेरा प्राण रे।। 
पाँच तत्वों से बना यह तन तेरा। 
होगा निश्चय यह यहाँ निष्प्राण रे।।

स्वयं को भगवान के अर्पण करो। 
निज को अच्छे कर्म से तर्पण करो।। 
शोक से, भय से रहोगे मुक्त तुम।
सर्वस्व ‘रत्नम्’ ईश को समपर्ण करो।

मंत्र:
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। 
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

अर्थः भगवान श्री कृष्णा कहते हैं– तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों में कभी नहीं। कर्म को फल की इच्छा से न करो और न ही आलस्यपूर्वक कर्म से विमुख हो।

गर्भ संवाद:
“सपने देखना एक अच्छा प्रारंभ है, लेकिन उन्हें हकीकत में बदलने के लिए तुम्हें विश्वास की जरूरत है। जब तुम अपने सपनों में विश्वास रखते हो और उन्हें अपनी मेहनत से साकार करते हो, तो तुम्हारा भविष्य उसी दिशा में आकार लेने लगता है। मैं चाहती हूं कि तुम अपने सपनों को सिर्फ ख्वाबों तक सीमित न रखो, बल्कि उन्हें विश्वास और मेहनत के साथ साकार करो।”

पहेली:
बीच ताल में 
बसे तिवारी 
बे कुंजी की 
लगी किवाड़ी।

कहानी: शेर और लोमड़ी की परीक्षा
बहुत समय पहले की बात है। एक घने जंगल में एक शेर रहता था, जिसे अपनी शक्ति और बुद्धिमानी पर बहुत गर्व था। वह खुद को जंगल का राजा मानता था और चाहता था कि बाकी सभी जानवर उसकी ताकत और ज्ञान की प्रशंसा करें। हालांकि, जंगल के सभी जानवर उससे डरते थे, लेकिन शेर को इस बात का अहसास नहीं था कि उनका डर सम्मान की वजह से नहीं था, बल्कि उसकी क्रूरता और अहंकार की वजह से था। 

एक दिन, शेर ने जंगल के सभी जानवरों को बुलाया और घोषणा की, “मैं जंगल का सबसे ताकतवर और बुद्धिमान राजा हूँ। मैं यह देखना चाहता हूं कि तुममें से सबसे चतुर और समझदार कौन है। इसलिए, मैं तुम सभी को एक परीक्षा देना चाहता हूं। जो इस परीक्षा में पास होगा, उसे मैं अपना मंत्री बनाऊंगा और जंगल के फैसलों में उसकी राय लूंगा।”

शेर की घोषणा सुनकर सभी जानवर चिंतित हो गए। उन्हें डर था कि अगर वे शेर की परीक्षा में विफल हुए, तो वह क्रोधित होकर उन्हें नुकसान पहुंचा सकता है। लेकिन एक चालाक लोमड़ी ने सोचा कि यह एक अवसर हो सकता है। उसने तय किया कि वह शेर की परीक्षा में हिस्सा लेगी और अपनी बुद्धिमानी से शेर को प्रभावित करेगी।

अगले दिन, शेर ने परीक्षा की शुरुआत की। उसने सभी जानवरों को एक पेड़ के नीचे बुलाया और कहा, “तुम सभी को मेरे सवालों का जवाब देना होगा। जो सबसे अच्छा जवाब देगा, वह विजेता बनेगा।”

शेर ने पहला सवाल पूछा, “मुझे यह बताओ कि जंगल का सबसे बड़ा गुण क्या है?”

हिरण ने जवाब दिया, “जंगल का सबसे बड़ा गुण इसकी हरियाली है।” तोता बोला, “जंगल का सबसे बड़ा गुण इसके पेड़ों और फलों का स्वाद है।” खरगोश ने कहा, “जंगल का सबसे बड़ा गुण इसकी शांति है।”

शेर ने इन उत्तरों को सुना, लेकिन वह संतुष्ट नहीं हुआ। तब लोमड़ी ने उत्तर दिया, “जंगल का सबसे बड़ा गुण यह है कि यहां सभी जीव एक दूसरे पर निर्भर हैं। यह निर्भरता ही जंगल को जीवंत बनाती है। पेड़ जानवरों को भोजन और छाया देते हैं, और जानवर बीज फैलाकर पेड़ों को बढ़ने में मदद करते हैं। यह संतुलन ही जंगल की ताकत है।”

शेर लोमड़ी के जवाब से प्रभावित हुआ। उसने दूसरा सवाल पूछा, “क्या कोई मुझसे ताकतवर है?” सभी जानवर चुप हो गए। कोई भी शेर को यह कहने की हिम्मत नहीं कर सका कि वह सबसे ताकतवर नहीं है। लेकिन लोमड़ी ने बिना डरे कहा, “ताकत केवल शारीरिक बल में नहीं होती, बल्कि सोच और समझ में भी होती है। हो सकता है कि किसी दिन जंगल में कोई ऐसा जानवर आए जो आपसे भी ज्यादा बुद्धिमान हो और आपको चुनौती दे सके।”

शेर यह सुनकर चौंका, लेकिन उसने महसूस किया कि लोमड़ी सच कह रही है। उसने तीसरा और अंतिम सवाल पूछा, “अगर मैं इस जंगल का राजा हूं, तो मुझे कैसा राजा होना चाहिए ?”

लोमड़ी ने जवाब दिया, “एक राजा का कर्तव्य है कि वह अपने प्रजा का ख्याल रखे। डर के बजाय, अगर आप प्यार और न्याय से राज करेंगे, तो सभी जानवर आपको दिल से सम्मान देंगे। एक सच्चा राजा वह है जो अपनी ताकत का इस्तेमाल दूसरों की भलाई के लिए करता है।”

शेर लोमड़ी के जवाब से बहुत प्रभावित हुआ। उसने घोषणा की, “लोमड़ी ने अपनी बुद्धिमानी और ईमानदारी से यह परीक्षा जीत ली है। मैं उसे जंगल का मंत्री नियुक्त करता हूँ.”

उस दिन के बाद, शेर ने लोमड़ी की सलाह से जंगल पर राज करना शुरू किया। वह समझ गया था कि एक राजा का असली गुण उसकी ताकत नहीं, बल्कि उसकी सोच और न्यायप्रियता होती है।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा नेतृत्व केवल ताकत से नहीं, बल्कि समझदारी, न्याय और दूसरों की भलाई से होता है। किसी भी समस्या का सामना बुद्धिमानी और ईमानदारी से करना चाहिए।

पहेली का उत्तर : घोंघा
==========================149

सप्तश्लोकी गीता:
श्री भगवान ने कहा— अनुभव, प्रेमाभक्ति और साधनों से युक्त अत्यंत गोपनीय अपने स्वरूप का ज्ञान मैं तुम्हें कहता हूं, तुम उसे ग्रहण करो। 
मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएं हैं—मेरी कृपा से तुम उनका तत्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो। 
सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहां यह सृष्टि नहीं है, वहां मैं-ही-मैं हूं और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूं और जो कुछ बचा रहेगा, वह भी मैं ही हूं। 
वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मंडल के नक्षत्रो में राहु की भांति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझना चाहिए। 
जैसे प्राणियों के पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी है और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किए हुए हूं और आत्म दृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उन में प्रविष्ट नहीं भी हूं। 
यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं— इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है— इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है, वही वास्तविक तत्व है। जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है।
ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधि के द्वारा मेरे इस सिद्धांत में पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हें कल्प-कल्प में विविध प्रकार की सृष्टि रचना करते रहने पर भी कभी मोह नहीं होगा।

श्लोक का अर्थः जो व्यक्ति आत्मज्ञान को प्राप्त करता है, वह ब्रह्म का साक्षात्कार करता है और जीवन के सभी भ्रमों से मुक्त होता है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मज्ञान ही सबसे बड़ा ज्ञान है, जो हमें जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर मार्गदर्शन करता है।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारे उज्जवल भविष्य का निर्माण हर छोटे कदम से होता है। हर दिन की छोटी-छोटी मेहनत, सही निर्णय और सकारात्मक सोच तुम्हें सफलता के करीब ले जाती है। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन अपने भविष्य के लिए एक कदम आगे बढ़ाओ, क्योंकि यही तुम्हें बड़ी सफलता की ओर ले जाएगा। तुम जितना ज्यादा आज पर काम करोगे, उतना तुम्हारा भविष्य रोशन होगा।”

पहेली:
काली नदी सुहावनी, 
पीले अण्डे दे, 
जो आये आदमी, 
सभी समेट ले जाए।

कहानी: गधा और संगीत
बहुत समय पहले, एक गांव के पास एक गरीब धोबी रहता था। उसके पास एक गधा था, जो उसका सबसे वफादार साथी था। धोबी हर दिन गधे की मदद से कपड़ों का बोझ उठाकर नदी के पास धोने ले जाता था। गधा अपने मालिक के प्रति बहुत वफादार था और हमेशा मेहनत करता था।

हालांकि, गधे के बारे में एक बात मशहूर थी कि वह बहुत बेसुरा था। जब भी वह अपनी खुशी व्यक्त करने के लिए आवाज निकालता, उसकी आवाज इतनी अजीब और कर्कश होती कि कोई भी उसे सुनना नहीं चाहता। सभी जानवर उसे चिढ़ाते और उसकी आवाज का मजाक उड़ाते थे।

एक दिन, धोबी ने गधे को चारा खाने के लिए जंगल में छोड़ा। गधा जंगल में घूमते-घूमते एक संगीत के समूह के पास पहुंच गया। वह समूह जंगल के पक्षियों और अन्य जानवरों का था, जो मिलकर मधुर धुन गा रहे थे। कोयल अपनी मधुर आवाज में गा रही थी, बुलबुल अपनी सुंदर धुन से जंगल को संगीतमय बना रही थी और मोर अपने नृत्य के साथ ताल दे रहा था।

गधे ने पहली बार इतना सुंदर संगीत सुना और सोचा, “मैं भी इनकी तरह गाना गा सकता हूं। अगर ये जानवर इतना अच्छा गा सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं?”

गधे ने समूह के बीच जाकर अपनी कर्कश आवाज में गाना शुरू किया। जैसे ही उसने गाना गाया, सभी जानवर चौंक गए। कोयल ने कहा, “यह कैसी आवाज है? यह संगीत नहीं, बल्कि शोर है!” बुलबुल ने कहा, “तुम्हारी आवाज से हमारी मधुर धुन खराब हो रही है।”

गधा बहुत निराश हुआ। उसने पक्षियों से कहा, “मैं भी संगीत में अच्छा बन सकता हूं। बस मुझे एक मौका दो।” पक्षियों ने उसे समझाया, “संगीत केवल आवाज का खेल नहीं है। यह समर्पण, धैर्य और अभ्यास से आता है।”

गधे ने पक्षियों की बात मानी और रोजाना अभ्यास करने की ठानी। उसने अपनी आवाज को सुधारने और मधुर बनाने के लिए मेहनत शुरू की। कई महीनों तक उसने कठिन परिश्रम किया। धीरे-धीरे उसकी आवाज में सुधार होने लगा। अंत में, एक दिन, गधे ने पक्षियों के सामने गाना गाया। उसकी आवाज अब पहले से बेहतर हो चुकी थी। पक्षियों ने उसकी मेहनत और समर्पण की तारीफ की और उसे अपने समूह में शामिल कर लिया।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी कला या कौशल में सफलता पाने के लिए धैर्य, मेहनत और अभ्यास जरूरी हैं। चाहे शुरुआत में हम असफल क्यों न हों, अगर हम लगातार प्रयास करते हैं, तो हमें अपनी मंजिल जरूर मिलती है

पहेली का उत्तर: पकौड़ी
========================= 150

प्रार्थना:
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । 
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं। 
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

अर्थ: मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।

मंत्र:
मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः। 
बन्धाय विषयासक्तं, मुक्तं निर्विषयं स्मृतम् ॥

अर्थः मनुष्य के बंधन और मोक्ष का कारण उसका मन ही है। जब मन विषयों (इंद्रिय सुखों) में आसक्त होता है, तो बंधन होता है। जब मन निर्विषय (निर्लिप्त) हो जाता है, तो मोक्ष की प्राप्ति होती है।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारी सकारात्मकता से तुम्हारा भविष्य हमेशा उज्जवल रहेगा। जब भी कोई समस्या सामने आएगी, तुम्हारा आत्मविश्वास और दृष्टिकोण उसे एक अवसर में बदल देगा। तुम हर स्थिति को हल्के-फुलके तरीके से देखोगे और इसके परिणामस्वरूप तुम्हारा जीवन एक सशक्त और खुशहाल रास्ते पर चलेगा। तुम अपनी सकारात्मक ऊर्जा से इस दुनिया को एक बेहतर जगह बना सकोगे।”

पहेली:
बिन धोए सब खाते है, 
खाकर ही पछताते हैं, 
बोलो ऐसी चीज है क्या, 
कहते समय शरमाते है

कहानी: बेटी का संघर्ष
किसी छोटे से गांव में सीमा नाम की एक लड़की रहती थी। वह अपने माता-पिता की इकलौती संतान थी। सीमा पढ़ाई में बहुत होशियार थी, और उसका सपना था कि वह बड़ी होकर एक डॉक्टर बने। लेकिन उसका सपना आसान नहीं था, क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर थी। उसके पिता एक किसान थे और मां गृहिणी।

गांव में लड़कियों की पढ़ाई को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था। लोगों का मानना था कि लड़कियां घर का काम संभालने के लिए होती हैं। सीमा की मां ने कई बार उसे समझाने की कोशिश की, “बेटी, हमें अपने सीमित साधनों में ही जीना है। पढ़ाई छोड़कर घर का काम संभालो।”

लेकिन सीमा ने अपनी मां से कहा, “मां, मैं डॉक्टर बनकर आप सबकी जिंदगी बदल सकती हूं। मुझे एक मौका दीजिए। मैं आप सबका नाम रोशन करूंगी।”

सीमा का यह आत्मविश्वास उसके पिता के दिल को छू गया। उन्होंने कहा, “अगर मेरी बेटी पढ़ना चाहती है, तो मैं उसकी हरसंभव मदद करूंगा।”

दसवीं कक्षा में सीमा ने पूरे जिले में टॉप किया। उसकी इस सफलता से गांव वालों की सोच बदलने लगी।

लेकिन आगे की पढ़ाई के लिए उसे शहर जाना था। गांव के लोगों ने उसकी मां को ताने मारे, “तुम्हारी बेटी को शहर भेजना गलत है। वह बिगड़ जाएगी।”

सीमा ने उन बातों की परवाह नहीं की। उसने अपनी पढ़ाई जारी रखी। वह गांव से शहर गई और वहां कई कठिनाइयों का सामना किया। सीमित साधनों में वह अपना खर्च संभालती और दिन-रात मेहनत करती।

परीक्षा के दिन पास आ रहे थे। सीमा को कई बार लगता था कि वह हार मान लेगी। लेकिन हर बार उसे अपने पिता के शब्द याद आते, “मेरी बेटी हार नहीं मान सकती। तुम सबसे अलग हो।”

आखिरकार, सीमा ने मेडिकल प्रवेश परीक्षा पास कर ली। वह डॉक्टर बनी और गांव वापस लौटी। अब वह अपने गांव के लोगों का इलाज करने लगी। उसके संघर्ष और समर्पण ने न केवल उसके माता-पिता, बल्कि पूरे गांव का नाम रोशन किया।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि आत्मविश्वास और मेहनत से हर सपना पूरा किया जा सकता है। परिवार का समर्थन और अपनी लगन इंसान को हर मुश्किल से पार करा सकती है।

पहेली का उत्तर : धोखा
==========================151

प्रार्थना:
माँ सरस्वती वरदान दो, 
मुझको नवल उत्थान दो। 
यह विश्व ही परिवार हो, 
सब के लिए सम प्यार हो । 
आदर्श, लक्ष्य महान हो । माँ सरस्वती..........

मन, बुद्धि, हृदय पवित्र हो, 
मेरा महान चरित्र हो। 
विद्या विनय वरदान दो। माँ सरस्वती.... 

माँ शारदे हँसासिनी, 
वागीश वीणा वादिनी। 
मुझको अगम स्वर ज्ञान दो। 
माँ सरस्वती, वरदान दो। 
मुझको नवल उत्थान दो।
उत्थान दो। उत्थान दो...।

मंत्र:
धर्मेण हीना पशुभिः समानाः, धर्मेण हीना न सुखं प्रपद्यते। 
धर्मेण हीना न परं लभन्ते, तस्माद्धर्मं परमं प्रजानाम्॥ 

अर्थः जो धर्म (कर्तव्य और सदाचार) से हीन हैं, वे पशुओं के समान हैं। धर्म का पालन न करने वाले सुख नहीं पाते और न ही वे परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकते हैं। इसलिए धर्म का पालन सभी मनुष्यों का परम कर्तव्य है।

गर्भ संवाद
“तुम्हारी सकारात्मकता ऐसी ऊर्जा है जो सबको प्रभावित करती है। जहां भी तुम जाओगे, वहां प्यार, उत्साह और खुशी फैलाओगे। तुम्हारी सोच का असर हर व्यक्ति पर पड़ेगा और तुम अपनी उपस्थिति से हर वातावरण को हल्का और उज्जवल बना दोगे। मुझे पूरा विश्वास है कि तुम जहां भी रहोगे, वहां सबका मनोबल ऊंचा रहेगा।”

पहेली:
खुशबु है पर फूल नहीं, 
जलती है पर ईर्षा (जलन) नहीं।

कहानी: ननद और भाभी का प्रेम
एक गांव में सुमन नाम की एक महिला अपने पति और ननद मीरा के साथ रहती थी। सुमन नई-नई शादी करके आई थी और अपने ससुराल के हर सदस्य को खुश रखने की कोशिश करती थी। मीरा अपनी भाभी सुमन को पसंद करती थी, लेकिन उनके बीच उम्र का बड़ा फासला था। मीरा को अक्सर लगता था कि सुमन उसकी बातों को नहीं समझ पाएगी।

सुमन ने यह महसूस किया और मीरा के करीब जाने की कोशिश करने लगी। वह मीरा की पसंद-नापसंद को समझने लगी और उसके साथ समय बिताने लगी। सुमन ने महसूस किया कि मीरा पढ़ाई में बहुत अच्छी थी और उसका सपना था कि वह एक शिक्षक बने। 

एक दिन, मीरा ने अपनी भाभी से कहा, “भाभी, मैं अपने सपने पूरे करना चाहती हूं, लेकिन घर के काम और जिम्मेदारियां मुझे समय नहीं देतीं। मैं क्या करूं?”

सुमन ने मीरा का हौसला बढ़ाया और कहा, “मीरा, मैं तुम्हारी मदद करूंगी। घर का काम मैं संभाल लूंगी। तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम्हारा सपना पूरा करना मेरा भी कर्तव्य है।” मीरा ने सुमन की मदद से अपनी पढ़ाई जारी रखी। हर दिन सुमन मीरा को पढ़ने के लिए समय देती और घर का पूरा काम खुद करती।

सुमन ने यह तय कर लिया था कि वह किसी भी हाल में अपनी ननद के सपनों को पूरा करने में मदद करेगी।

मीरा ने अपनी मेहनत और सुमन के समर्थन से शिक्षक बनने का अपना सपना पूरा किया। जब उसने पहली बार स्कूल में पढ़ाना शुरू किया, तो उसने भाभी को धन्यवाद देते हुए कहा, “भाभी, आपकी वजह से ही मैं आज यहां हूं। अगर आप मेरा साथ न देतीं, तो मैं कभी अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाती।”

सुमन मुस्कुराते हुए बोली, “मीरा, तुम मेरी छोटी बहन हो। तुम्हारी सफलता में मेरी खुशी छिपी है। परिवार के लिए एक-दूसरे का साथ देना ही सबसे बड़ी खुशी है।”

मीरा और सुमन के बीच का रिश्ता और भी मजबूत हो गया। दोनों ननद-भाभी के बजाय अब सगी बहनों की तरह एक-दूसरे का ख्याल रखने लगीं।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि परिवार में एक-दूसरे का सहयोग और समर्थन ही रिश्तों को मजबूत बनाता है। सच्चे रिश्ते वही होते हैं, जहां हर सदस्य दूसरे के सपनों को साकार करने में मदद करता है।

पहेली का उत्तर : अगरबत्ती
============================ 152

प्रार्थना:
हे ईश्वर आप ही इस धरती और इस ब्रह्मांड के निर्माणकर्ता हो। आप सभी के जीवन के कर्ता-धर्ता है, आप ही सभी प्राणियों के सुख-दुख को हरने वाले हो। हे ईश्वर हमें सुख-शांति का रास्ता दिखाने का उपकार करें। हे श्रृष्टि के रचियता! हे परमपिता परमेश्वर! हमारी आपसे यही विनती है कि आप मुझे सद्बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को उज्जवल बनाए।

मंत्र:
सहस्रं मित्रा नायकृतं बभूव, येषां सर्वं हितमिच्छंति धर्मम्। 
न तस्य धर्मोऽविदितः सतां च, यः पुण्यमाप्नोति हितं च जानाति॥

अर्थः जो दूसरों के कल्याण की कामना करते हैं, वे सच्चे मित्र हैं। ऐसे व्यक्ति धर्म के ज्ञाता होते हैं और पुण्य के भागी बनते हैं।

गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारे भीतर इतना आत्मविश्वास है कि तुम जीवन की किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हो। जब तुम्हारे पास सकारात्मक सोच और आत्मविश्वास हो, तो तुम्हें किसी भी मुश्किल से डरने की जरूरत नहीं होती। तुम हमेशा अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहोगे और आत्मविश्वास से उसे पूरा करोगे। तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारा सबसे बड़ा हथियार होगा।”

पहेली:
धक-धक मैं हूँ करती, 
फक फक धुँआ फेंकती, 
बच्चे बूढ़े मुझ पर चढ़ते, 
निशानों पर मैं दौड़ती।

कहानी: धैर्य से बड़ी जीत
किसी छोटे से गांव में राजू नाम का एक किसान रहता था। राजू का सपना था कि वह अपने खेतों में एक ऐसी फसल उगाए, जिससे पूरे गांव में उसका नाम हो। लेकिन उसके पास साधन और अनुभव की कमी थी। गांव के अन्य किसान उसे अक्सर ताने मारते थे, “तुम्हारे जैसे नौसिखिए से कुछ नहीं होगा।”

राजू ने इन बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने सपने को पूरा करने के लिए मेहनत करना शुरू कर दिया। उसने फसल के बारे में पढ़ाई की, नई तकनीकें सीखी और अपनी जमीन पर दिन-रात काम किया। उसने अपनी जमीन में ऐसे पौधे लगाए, जिन्हें उगने में समय लगता था।

गांव के लोग उसे देखकर हंसते और कहते, “राजू, इतनी मेहनत करोगे, तो खुद भूखे मर जाओगे। इतनी धीमी बढ़ने वाली फसल से तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा।” लेकिन राजू ने उनकी बातों को नजरअंदाज किया। उसने खुद से कहा, “हर सफलता धैर्य और मेहनत से मिलती है। मैं तब तक हार नहीं मानूंगा, जब तक मेरा सपना पूरा नहीं होता।”

महीने गुजर गए, लेकिन राजू की फसल जमीन से ऊपर नहीं निकली। अब खुद राजू को भी अपनी मेहनत पर संदेह होने लगा। लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने धैर्य के साथ काम करना जारी रखा।

एक दिन, जब बारिश हुई और सूरज चमका, तो उसकी फसल ने अचानक से तेजी से बढ़ना शुरू किया। कुछ ही हफ्तों में उसकी जमीन हरे-भरे पौधों से भर गई। राजू की मेहनत रंग लाई। उसने जो फसल उगाई थी उसकी कीमत बाजार में बहुत ज्यादा थी।

अब वही लोग, जो राजू का मजाक उड़ाते थे, उसकी तारीफ करने लगे। उन्होंने कहा, “राजू, तुम्हारा धैर्य और मेहनत काबिले तारीफ है। तुमने हम सबको सिखाया है कि बड़ी सफलता पाने के लिए समय और धैर्य की जरूरत होती है।”

राजू ने मुस्कुराते हुए कहा, “धैर्य ही सबसे बड़ी ताकत है। अगर मैं हार मान लेता, तो यह सफलता कभी नहीं मिलती।”

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि धैर्य और मेहनत से बड़ी से बड़ी चुनौती को पार किया जा सकता है। समय पर विश्वास रखें और अपने काम को निरंतरता के साथ करते रहें ।

पहेली का उत्तर : रेलगाड़ी
=============================153