प्रार्थना:प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी,
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,
राम सीता का दर्शन कराके मुझे,
मेरे सपने को साकार कर दीजिए॥
दुख देते है मुझे मेरे ही पाप,
मेरे मन में है क्या, जानते आप हैं,
आप हर रूप है इसलिए कर कृपा,
मेरे हर एक संकट को हर लीजिए,
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी,
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,
मैं भावुक तो हूं पर नहीं भक्त हूं,
इसी कारण तो विषयों में आसक्त हूं
वासना मुक्त कर मेरे मन को प्रभु
राम सीता की भक्ति से भर दीजिए,
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी,
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,
तन निरोगी रहे, धन भी भरपुर हो,
मन भजन में रहे, द्वंद्व दुख दूर हो,
कर्ज भी ना रहे, मर्ज भी ना रहे,
फर्ज निभाते रहे ऐसा वर दीजिए,
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी,
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,
मैं कथा भी कहूं सियाराम की,
मैं भक्ति भी करूं तो सिया राम की,
मेरे हर एक संकट को हर लीजिये ,
प्रार्थना है यही मेरी, हनुमान जी,
मेरे सर पर भी अब हाथ धर दीजिए,
मंत्र:
उद्यमः साहसं धैर्यं बुद्धिः शक्तिः पराक्रमः।
षडेते यत्र वर्तन्ते तत्र दैवं सहायकृत्॥
अर्थः जहाँ परिश्रम, साहस, धैर्य, बुद्धि, शक्ति और पराक्रम होते हैं, वहीं भाग्य भी साथ देता है।
गर्भ संवाद:
“तुम्हारा हर कदम सफलता की ओर बढ़ेगा। चाहे रास्ते में कितनी भी बाधाएं आएं, तुम्हारी सकारात्मक सोच और कड़ी मेहनत तुम्हें हमेशा सही दिशा में ले जाएगी। तुम्हारे भीतर हर मुश्किल को पार करने की शक्ति है। तुम जो भी निर्णय लोगे, वो तुम्हारे लिए सफलता के नए रास्ते खोलेंगे।”
पहेली:
खड़ा द्वार पर ऐसा घोडा,
जिसने चाहा पेट मरोड़ा।
कहानी: खुशियां मेरे भीतर हैं
नेहा नाम की एक युवती बड़े शहर में रहती थी। वह अपनी नौकरी और जीवन से संतुष्ट नहीं थी। उसे हमेशा लगता था कि अगर उसे बड़ी तनख्वाह, अच्छा घर या नई गाड़ी मिल जाए, तो वह खुश हो जाएगी।
नेहा हर दिन सोशल मीडिया पर अपने दोस्तों की तस्वीरें देखती, जहां वे विदेश यात्रा कर रहे होते, महंगे रेस्तरां में खाते या नई चीजें खरीदते। यह सब देखकर नेहा को लगता कि उसकी जिंदगी अधूरी है।
एक दिन, नेहा के दादाजी, जो गांव में रहते थे, उससे मिलने शहर आए। उन्होंने नेहा को चिंतित देखकर पूछा, “बेटा, क्या हुआ? तुम इतनी परेशान क्यों हो?”
नेहा ने जवाब दिया, “दादाजी, मेरी जिंदगी में कुछ भी अच्छा नहीं है। मुझे ऐसा लगता है कि मेरे पास कुछ नहीं है। मैं खुश रहना चाहती हूं, लेकिन यह संभव नहीं है।”
दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं। क्या तुम मेरे साथ गांव चलोगी?” नेहा ने झिझकते हुए हामी भर दी। गांव पहुंचकर दादाजी ने नेहा को वहां के लोगों से मिलवाया। वे सभी लोग साधारण जीवन जीते थे, लेकिन उनके चेहरे पर हमेशा मुस्कान रहती थी। नेहा ने देखा कि वे छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढते थे जैसे- खेतों में काम करना, बच्चों के साथ खेलना, और रात में मिलकर गाने गाना।
दादाजी ने कहा, “देखो, बेटा, खुशी बाहर की चीजों में नहीं है। यह तुम्हारे भीतर है। अगर तुम अपने पास जो है, उसकी कद्र करना सीख जाओ, तो तुम हमेशा खुश रहोगी।”
नेहा ने दादाजी की बात को गहराई से महसूस किया। उसने सोचा, “मैंने हमेशा बाहरी चीजों में खुशी ढूंढी, लेकिन असली खुशी तो मेरे भीतर ही है।”
गांव से लौटने के बाद, नेहा ने अपने जीवन को एक नए नजरिए से देखना शुरू किया। उसने छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढना सीखा। सुबह की चाय का स्वाद, दोस्तों के साथ बिताए पल, और अपने काम की छोटी-छोटी उपलब्धियां।
अब नेहा हर दिन खुद से कहती, “खुशियां मेरे भीतर हैं। मुझे किसी और चीज की जरूरत नहीं है।”
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्ची खुशी हमारे भीतर है। बाहरी चीजें केवल अस्थायी खुशी देती हैं। अगर हम अपनी जिंदगी की छोटी-छोटी बातों की कद्र करना सीख जाएं, तो हम हमेशा खुश रह सकते हैं।
पहेली का उत्तर : ताला
=========================154
प्रार्थना:
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
जितेंद्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं
श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये॥
अर्थ: जिनकी गति, मन के समान तथा वेग वायु के समान है, जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, पवन के पुत्र एवं वानरों की सेना के मुखिया हैं तथा श्री रामचन्द्र के दूत हैं। ऐसे हनुमान जी की मै शरण लेता हूँ और उन्हें प्रणाम करता हूँ।
मंत्र:
यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च य:।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो य: स च मे प्रिय:॥
अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण कहते है— जिससे किसी को कष्ट नहीं पहुँचता तथा जो अन्य किसी के द्वारा विचलित नहीं होता, जो सुख-दुख में, भय तथा चिन्ता में समभाव रहता है, वह मुझे अत्यन्त प्रिय है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारी ऊर्जा इतनी सकारात्मक है कि वह न केवल तुम्हारे जीवन को बदल देगी, बल्कि वह अन्य लोगों को भी प्रेरित करेगी। तुम अपनी मेहनत और उत्साह से न सिर्फ अपनी मंजिल तक पहुंचोगे, बल्कि अपने आस-पास के लोगों के लिए भी नए रास्ते खोलोगे। तुम्हारी ऊर्जा से ही दुनिया में परिवर्तन आएगा। मैं जानती हूं कि तुम जो चाहोगे, वह हासिल करोगे।”
पहेली:
छोटा-सा काला घर,
पर चलता है, इधर-उधर।
कहानी: लोहड़ी का उत्सव
पंजाब के एक छोटे से गांव में लोहड़ी का त्योहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता था। इस त्योहार का खास महत्व था क्योंकि यह नई फसल के आगमन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का प्रतीक था।
इस बार गांव में लोहड़ी का त्योहार और भी खास था क्योंकि किसान राजेश ने अपने बेटे करण की शादी की पहली लोहड़ी मनाने का फैसला किया था। पूरे गांव में खुशी का माहौल था। घर-घर में गुड़, तिल, मूंगफली और रेवड़ी बनाई जा रही थी। महिलाएं पारंपरिक गीत गा रही थीं और बच्चे अपनी पतंगों के साथ आसमान को रंगीन कर रहे थे।
शाम को राजेश ने गांव के बीच में एक बड़ी आग जलाने की व्यवस्था की। सभी लोग पारंपरिक कपड़े पहनकर वहां जमा हुए। आग के चारों ओर नृत्य और गानों का सिलसिला शुरू हुआ। हर कोई खुश था और अपने जीवन की अच्छी फसल के लिए भगवान का धन्यवाद कर रहा था।
उसी समय, राजेश ने महसूस किया कि गांव का एक गरीब किसान बलराज, इस उत्सव में शामिल नहीं हो सका था क्योंकि उसकी फसल बर्बाद हो गई थी।
राजेश ने तुरंत अपने बेटे करण से कहा, “त्योहार का असली मतलब तब होता है जब हम अपनी खुशियां दूसरों के साथ बांटें। चलो, बलराज के घर चलते हैं और उसे भी इस खुशी में शामिल करते हैं।”
करण और राजेश बलराज के घर गए और उसे अपने साथ लोहड़ी मनाने के लिए ले आए। गांव के लोगों ने बलराज का स्वागत किया और उसके लिए खाना और मिठाई का इंतजाम किया। बलराज की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने कहा, “आज मैंने जाना कि लोहड़ी का असली मतलब क्या है। यह त्योहार केवल आग और नृत्य का नहीं, बल्कि एकता और परस्पर सहायता का प्रतीक है।”
उस रात गांव के सभी लोगों ने मिलकर लोहड़ी का उत्सव मनाया। बलराज ने राजेश का धन्यवाद करते हुए कहा, “आपने आज दिखाया कि त्योहारों का असली अर्थ क्या होता है। यह केवल खुशी मनाने का नहीं, बल्कि दूसरों की मदद करने का मौका होता है।”
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि लोहड़ी का त्योहार केवल नई फसल और खुशी का उत्सव नहीं है, बल्कि यह एकता, सहयोग, और दूसरों की मदद करने का प्रतीक है।
पहेली का उत्तर : छाता
=========================155
प्रार्थना:
प्रह्लाद, नारद, पाराशर, पुंडरीक, व्यास, अंबरीश, शूक, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रूक्मांगद, अर्जुन, वशिष्ठ और विभीषण आदि इन परम पवित्र वैष्णवो का मै स्मरण करता हूं।
वाल्मीकि, सनक, सनंदन, तरु, व्यास, वशिष्ठ, भृगु, जाबाली, जमदग्नि, कच्छ, जनक, गर्ग, अंगिरा, गौतम, मांधाता, रितुपर्ण पृथु, सगर, धन्यवाद देने योग्य दिलीप और नल, पुण्यात्मा युधिष्ठिर, ययाति और नहुष ये सब हमारा मंगल करें।
मंत्र:
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम्।
आरोर्यमूलमंत्तुष्टिं, तुष्टिं च मूलमीश्वरम् ॥
अर्थ: धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों का मूल उत्तम स्वास्थ्य है। स्वास्थ्य का आधार संतोष है, और संतोष का आधार ईश्वर की कृपा है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारी सकारात्मक सोच तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत होगी। जीवन में जब भी समस्याएं आएंगी, तुम्हारे पास उन्हें हल करने की शक्ति होगी। जब तुम किसी भी कठिनाई का सामना करोगे, तो उसे एक अवसर के रूप में देखोगे और वह तुम्हारी सफलता की ओर एक कदम और बढ़ाएगी। मैं जानती हूं कि तुम्हारी सोच और आत्मविश्वास तुम्हें हर बाधा को पार करने में मदद करेगा।”
पहेली:
जाने कहाँ किधर से आता,
फिर न जाने क्यों छिपकर जाता।
आसमान में पड़े दिखाई
सात रंग में रखता नाता।
कहानी: रामनवमी की कथा
एक समय की बात है, अयोध्या के राजा दशरथ के महल में खुशी का माहौल था। रामनवमी का पवित्र दिन था। जिस दिन भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। यह दिन न केवल अयोध्या में, बल्कि पूरे भारत में धार्मिक आस्था और उत्सव का प्रतीक है।
अयोध्या के पास एक छोटा गांव था, जहां हर साल रामनवमी बड़े धूमधाम से मनाई जाती थी। गांव के लोग मिलकर भगवान राम की कथा सुनते और उनका जन्मदिन मनाते। इस बार रामनवमी के दिन गांव के पुजारी ने बच्चों को श्रीराम के आदर्शों और उनके जीवन के बारे में सिखाने का फैसला किया।
पुजारी ने बच्चों को इकट्ठा किया और कहा, “रामनवमी केवल एक त्योहार नहीं है। यह भगवान राम के आदर्श जीवन को समझने और उनसे प्रेरणा लेने का अवसर है।” उन्होंने भगवान राम के धैर्य, सत्य और मर्यादा के गुणों को समझाते हुए कहा कि हमें उनके जीवन से शिक्षा लेनी चाहिए।
एक छोटे लड़के अर्जुन ने पूछा, “पंडित जी! भगवान राम ने इतनी कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और सत्य का साथ कैसे दिया?”
पुजारी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, भगवान राम ने हमें सिखाया कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, हमें अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि धर्म और मर्यादा का पालन ही सबसे बड़ा धर्म है।”
उस दिन बच्चों ने रामायण की कथा सुनी और भगवान राम के गुणों को अपने जीवन में अपनाने का प्रण लिया। गांव में पूरे दिन भजन-कीर्तन हुए, और शाम को भगवान राम की झांकी निकाली गई।
रामनवमी का यह त्योहार गांव के बच्चों और बड़ों के लिए बहुत खास बन गया। हर किसी ने यह महसूस किया कि यह त्योहार केवल पूजा और भजन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे जीवन को सही दिशा देने का संदेश है।
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि रामनवमी केवल भगवान राम के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह उनके आदर्श जीवन से प्रेरणा लेने और सत्य, धर्म और मर्यादा का पालन करने का संदेश है।
पहेली का उत्तर : इन्द्र्धनुष
=========================156
प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥
भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥
ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः
भावार्थ– ईश्वर हम दोनों (गुरू एवं शिष्य) की रक्षा करें! हम दोनों का पोषण करें! हम दोनों पूर्ण शक्ति के साथ कार्यरत रहें! हम तेजस्वी विद्या को प्राप्त करें! हम कभी आपस में द्वेष न करें ! सर्वत्र शांति रहे!
ॐ असतो मा सद्गमय।।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
मृत्योर्मामृतं गमय।।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।
भावार्थ– हे ईश्वर! हमको असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता के भाव की ओर ले चलो।
मंत्र:
अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तथैव च।
त्याज्यं न धैर्यं विपदि, न च धर्मं त्यजेत्क्वचित्॥
अर्थः अहिंसा ही परम धर्म है, लेकिन धर्म की रक्षा के लिए हिंसा भी आवश्यक हो सकती है। विपत्ति में धैर्य नहीं त्यागना चाहिए और कभी भी धर्म का त्याग नहीं करना चाहिए।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारा दृष्टिकोण हर चीज को बदलने में सक्षम होगा। तुम्हारे भीतर इतनी शक्ति है कि तुम अपनी सोच और नजरिए से किसी भी परिस्थिति को बेहतर बना सकोगे। तुम्हारी ऊर्जा और दृष्टिकोण तुम्हारे भविष्य को आकार देंगे। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन अपने सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ो और इसे दूसरों के लिए भी एक प्रेरणा बना दो।”
पहेली:
कट-कट गया हुआ हल,
सब्जी खाएंगे उसे हम कल।
कहानी: मां की मेहनत का फल
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में अनीता नाम की महिला रहती थी। अनीता के पति एक मजदूर थे, लेकिन एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। अनीता पर अपने तीन बच्चों की परवरिश की पूरी जिम्मेदारी आ गई।
अनीता ने अपनी जिंदगी की हर मुश्किल को स्वीकार करते हुए मेहनत करने का फैसला किया। वह खेतों में काम करती, दूसरों के घरों में रोटी बनाती, और हर काम करती जिससे अपने बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठा सके।
उसका बड़ा बेटा करण पढ़ाई में होशियार था। वह हमेशा कहता, “मां, एक दिन मैं आपकी मेहनत को सफल बनाऊंगा। आप देखना, मैं ऐसा कुछ करूंगा जिससे आपको मुझ पर गर्व होगा।”
अनीता ने अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रोत्साहित किया और उनकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखा। उसने खुद भूखा रहकर भी अपने बच्चों की किताबें और स्कूल की फीस भरने का इंतजाम किया।
जब करण ने बारहवीं की परीक्षा दी, तो पूरे गांव में उसे सबसे ज्यादा अंक मिले। उसे इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए एक बड़े कॉलेज में दाखिला मिला। लेकिन समस्या तब आई जब उसकी फीस भरने के लिए पैसे नहीं थे।
अनीता ने अपनी एकमात्र जमीन गिरवी रख दी और करण को पढ़ने के लिए भेजा। उसने कहा, “बेटा, तुम्हारी पढ़ाई मेरी सबसे बड़ी पूंजी है। मैं किसी भी कीमत पर तुम्हारे सपने को टूटने नहीं दूंगी।”
करण ने अपनी मां की मेहनत को देखकर और भी मेहनत करना शुरू कर दिया। उसने कॉलेज में हर बार टॉप किया और एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पाई।
जब करण ने अपनी पहली तनख्वाह से अपनी मां की गिरवी रखी जमीन वापस ली, तो अनीता की आंखों में गर्व और खुशी के आंसू थे। उसने कहा, “बेटा, यह सब तुम्हारी मेहनत का फल है। लेकिन मेरे लिए सबसे बड़ी खुशी यह है कि तुमने मेरी मेहनत को सार्थक बनाया।”
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मां की मेहनत और त्याग बच्चों के सपनों को पंख देता है। मां का समर्पण हर बच्चे को जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
पहेली का उत्तर : कटहल
========================157
प्रार्थना
अंतर्यामी परमात्मा को नमन,
शक्ति हमेशा मिलती रहे आपसे;
ऐसी कृपा कर दो, अज्ञान दूर हो, आतम ज्ञान पाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
सद्बुद्धि प्राप्त हो, व्यवहार आदर्श हो, सेवामय जीवन रहे।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मात-पिता का उपकार ना भूलें, हरदम गुरु के विनय में रहें, दोस्तों से स्पर्धा ना करेंगे, एकाग्र चित्त से पढ़ेंगे हम;
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
आलस्य को टालो, विकारों को दूर कर दो, व्यसनों से हम मुक्त रहें, ऐसे कुसंगों से बचा लो हमें।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मन-वचन और काया से, दुःख किसी को हम ना दें।
चाहे ना कुछ भी किसी का, प्योरिटी ऐसी रखेंगे हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
कल्याण के हम सब, निमित्त बने ऐसे,
विश्व में शांति फैलाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
पूर्ण रूप से हम खिलें, मुश्किलों से ना डरें... धर्मों के भेद मिटा दें जग में, ज्ञानदृष्टि को पाकर हम।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
अभेद हो जाएँ, लघुतम में रहकर हम,
प्रेम स्वरूप बन जाएँ।
अंतर्यामी परमात्मा को नमन
मंत्र का अर्थः अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, और ध्यान से कर्म के फल का त्याग श्रेष्ठ है। त्याग से ही मनुष्य शांति प्राप्त करता है।
गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारी सकारात्मकता तुम्हें हर नकारात्मकता से दूर रखेगी। दुनिया की हर बुरी स्थिति को तुम एक नई दिशा में बदल सकोगे। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा खुद को सकारात्मक बनाए रखो, ताकि तुम्हारे चारों ओर भी सकारात्मकता का माहौल हो। नकारात्मकता से परे, तुम्हारा रास्ता हमेशा रोशन रहेगा।”
पहेली:
लाल गाय लकड़ी खाय
पानी पिये मर जाये।
कहानी: एक मां की प्रेरणा
किसी छोटे से शहर में सुधा नाम की एक महिला रहती थी। सुधा का बेटा रोहित पढ़ाई में बहुत तेज था। वह हमेशा कहता था कि वह एक वैज्ञानिक बनकर अपने देश का नाम रोशन करेगा।
सुधा के पति एक साधारण नौकरी करते थे, जिससे घर का गुजारा मुश्किल से चलता था। लेकिन सुधा ने ठान लिया था कि वह अपने बेटे की हर संभव मदद करेगी। उसने घर में छोटे-मोटे काम शुरू किए और हर पैसा बचाने लगी।
रोहित जब दसवीं में था, तो उसने राज्य स्तरीय विज्ञान प्रदर्शनी में भाग लिया। उसने एक ऐसा मॉडल बनाया, जो किसानों की सिंचाई के लिए तकनीक पेश करता था। लेकिन प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए उसे पैसे की जरूरत थी।
सुधा ने अपनी पुरानी साड़ी और गहने बेचकर उसका इंतजाम किया। उसने रोहित से कहा, "बेटा, तुम्हारी सफलता ही मेरी सबसे बड़ी दौलत है। मैं चाहती हूं कि तुम अपने सपनों को पूरा करो।”
रोहित ने प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। यह उसकी मेहनत और उसकी मां की प्रेरणा का नतीजा था। लेकिन यह सफर यहीं खत्म नहीं हुआ। रोहित ने अपनी पढ़ाई में और मेहनत की और एक बड़े वैज्ञानिक संस्थान में काम करने का मौका पाया।
सालों बाद, जब रोहित को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो उसने मंच पर अपनी मां को धन्यवाद देते हुए कहा, “मेरी मां मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने मुझे सिखाया कि मुश्किल हालात में भी सपनों को पूरा करने का जुनून होना चाहिए।”
शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मां अपने बच्चों की सबसे बड़ी प्रेरणा होती है। उसका समर्पण और विश्वास बच्चों को हर मुश्किल से लड़ने और अपने सपनों को पूरा करने का साहस देता है।
पहेली का उत्तर : आग
========================= 158
प्रार्थना
1. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा का किंचित्मात्र भी अहम् न दुभे (दुःखे), न दुभाया (दुःखाया) जाए या दुभाने (दुःखाने) के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
मुझे किसी भी देहधारी जीवात्मा का किंचित्मात्र भी अहम् न दुभे, ऐसी स्याद्वाद वाणी, स्याद्वाद वर्तन और स्याद्वाद मनन करने की परम शक्ति दीजिए ।
2. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी धर्म का किंचितमात्र भी प्रमाण न दुभे, न दुभाया जाए या दुभाने के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
मुझे किसी भी धर्म का किंचित्मात्र भी प्रमाण न दुभाया जाए ऐसी स्याद्वाद वाणी, स्याद्वाद वर्तन और स्याद्वाद मनन करने की परम शक्ति दीजिए।
3. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी उपदेशक साधु, साध्वी या आचार्य का अवर्णवाद, अपराध, अविनय न करने की परम शक्ति दीजिए।
4. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा के प्रति किंचित्मात्र भी अभाव, तिरस्कार कभी भी न किया जाए, न करवाया जाए या कर्ता के प्रति न अनुमोदित किया जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
5. हे अंतर्यामी परमात्मा! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा के साथ कभी भी कठोर भाषा, तंतीली भाषा न बोली जाए, न बुलवाई जाए या बोलने के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
कोई कठोर भाषा, तंतीली भाषा बोले तो मुझे, मृदु-ऋजु भाषा बोलने की शक्ति दीजिए।
6. हे भगवान! मुझे, किसी भी देहधारी के प्रति स्त्री, पुरुष या नपुंसक, कोई भी लिंगधारी हो, तो उसके संबंध में किंचितमात्र भी विषय-विकार संबंधी दोष, इच्छाएँ, चेष्टाएँ या विचार संबंधी दोष न किए जाएँ, न करवाए जाएँ या कर्ता के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
मुझे, निरंतर निर्विकार रहने की परम शक्ति दीजिए।
7. हे भगवान! मुझे, किसी भी रस में लुब्धता न हो ऐसी शक्ति दीजिए।
समरसी आहार लेने की परम शक्ति दीजिए।
8. हे भगवान! मुझे, किसी भी देहधारी जीवात्मा का प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष, जीवित अथवा मृत, किसी का किंचितमात्र भी अवर्णवाद, अपराध, अविनय न किया जाए, न करवाया जाए या कर्ता के प्रति अनुमोदना न की जाए, ऐसी परम शक्ति दीजिए।
9. हे भगवान ! मुझे, जगत् कल्याण करने का निमित्त बनने की परम शक्ति दीजिए, शक्ति दीजिए, शक्ति दीजिए।
मंत्र:
माता पिता गुरुस्तस्मात्, धर्मेण सुखमेधिनी।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः॥
अर्थ: माता, पिता और गुरु का आदर धर्म के अनुसार करना चाहिए। जहाँ नारियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारा जीवन हमेशा प्यार और ऊर्जा से भरा रहेगा। तुम्हारे पास वह शक्ति है जो हर मुश्किल को पार कर सकती है। तुम्हारी मानसिकता और तुम्हारा दृष्टिकोण तुम्हारे जीवन को एक नई दिशा देगा। मैं चाहती हूं कि तुम अपने दिल को पूरी तरह से खुला रखो और इसे प्यार, स्नेह और सकारात्मकता से भर दो।”
पहेली:
ये धनुष है सबको भाता,
मगर लड़ने के काम न आता।
कहानी: मदद का जादू
एक छोटे से गांव में एक लड़का रहता था, जिसका नाम रोहन था । रोहन अपने परिवार और दोस्तों के बीच अपनी दयालुता और मदद के लिए जाना जाता था। चाहे किसी को स्कूल का काम समझने में दिक्कत हो या किसी बूढ़ी महिला को सड़क पार करने में मदद चाहिए हो, रोहन हमेशा हर किसी के लिए तैयार रहता था।
गांव में एक किसान रामू, रहता था, जो हाल ही में अपनी फसल बर्बाद होने की वजह से बहुत परेशान था। उसका घर कर्ज में डूब गया और उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह कैसे अपने परिवार का पेट भरेगा। रामू ने अपने पड़ोसियों से मदद मांगी, लेकिन सभी ने अपनी समस्याओं का बहाना बना दिया। हताश होकर वह एक दिन गांव के चौराहे पर बैठा हुआ था।
रोहन ने रामू को देखा और उसके पास गया। उसने पूछा, “रामू काका, आप इतने परेशान क्यों लग रहे हैं?” रामू ने अपनी समस्या रोहन को बताई। रोहन ने कहा, “काका, मैं आपकी मदद करूंगा। भले ही मेरे पास ज्यादा कुछ नहीं है, लेकिन मैं जो कर सकता हूँ, वह करूंगा।”
रोहन ने गांव के सभी लोगों से बात की और उनसे रामू की मदद के लिए थोड़ा-थोड़ा चंदा इकट्ठा किया। कुछ लोगों ने अनाज दिया, कुछ ने पैसे, और कुछ ने अपनी मेहनत से मदद करने का वादा किया। कुछ ही दिनों में, रामू के खेतों में नई फसल उगाई जाने लगी, और धीरे-धीरे उसकी स्थिति में सुधार होने लगा।
रामू ने रोहन से कहा, “बेटा, तुम्हारी मदद ने मेरे जीवन को बदल दिया। तुमने मुझे सिखाया कि मुश्किल समय में एक-दूसरे की मदद करना कितना जरूरी है। अगर तुमने मेरी मदद नहीं की होती, तो मैं शायद हार मान लेता।”
कुछ महीनों बाद, जब गांव में बाढ़ आई, तो रामू ने रोहन के दिखाए रास्ते पर चलते हुए उन सभी लोगों की मदद की, जिनके घर बाढ़ में बह गए थे। उसने महसूस किया कि रोहन के छोटे से कदम ने उसे सिखाया कि मदद का जादू हर दिल को छू सकता है।
शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी की मदद करने से केवल दूसरों का जीवन ही नहीं बदलता, बल्कि हमारी आत्मा को भी शांति मिलती है। मदद का जादू हमेशा लौटकर हमारे पास आता है। यह हमें सिखाता है कि इंसानियत का असली अर्थ दूसरों की भलाई में है।
पहेली का उत्तर : इन्द्र्धनुश
======================= 159
प्रार्थना:
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बनें,
ब्रह्मचारी धर्म-रक्षक वीर व्रत धारी बनें।
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..
निंदा किसी की हम किसी से भूल कर भी न करें,
ईर्ष्या कभी भी हम किसी से भूल कर भी न करें।
सत्य बोलें, झूठ त्यागे, मेल आपस में करें,
दिव्य जीवन हो हमारा, यश तेरा गाया करें।
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..
जाए हमारी आयु हे प्रभु लोक के उपकार में,
हाथ डालें हम कभी न भूल कर अपकार में।
कीजिए हम पर कृपा ऐसी हे परमात्मा,
मोह मद मत्सर रहित होवे हमारी आत्मा।
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..
प्रेम से हम गुरु जनों की नित्य ही सेवा करें,
प्रेम से हम संस्कृति की नित्य ही सेवा करें।
योग विद्या ब्रह्म विद्या हो अधिक प्यारी हमें,
ब्रह्म निष्ठा प्राप्त कर के सर्व हितकारी बनें।
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए..
हे प्रभु आनंद-दाता ज्ञान हमको दीजिए,
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिए।
मंत्र का अर्थः धन सपने के समान क्षणभंगुर है और यौवन फूल की तरह जल्दी मुरझा जाता है। केवल विद्या ही साथ चलती है और जीवन के हर कार्य में बल प्रदान करती है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारी आशा और विश्वास ही तुम्हारी ताकत है। जब भी तुम किसी चुनौती का सामना करोगे, तुम्हारे भीतर यह विश्वास रहेगा कि तुम उसे पार कर सकते हो। यह विश्वास तुम्हें आगे बढ़ने की शक्ति देगा और तुम्हें महान बनाएगा। मैं जानती हूं कि तुम्हारी मेहनत, सकारात्मकता और विश्वास से तुम जीवन में हर लक्ष को हासिल करोगे।”
पहेली:
जरा-सी बिटिया
गजभर की चुटिया।
कहानी: संतोष का सुख
एक समय की बात है, एक धनी व्यापारी था, जिसका नाम महेश था। महेश के पास सब कुछ था – धन, संपत्ति, नौकर-चाकर, और एक बड़ा व्यापार। लेकिन वह हमेशा किसी न किसी चीज को लेकर असंतुष्ट रहता था। उसे लगता था कि उसे और अधिक चाहिए।
महेश के घर के पास एक गरीब किसान गोपाल, रहता था। गोपाल के पास न तो बड़ा घर था, न ज्यादा धन, लेकिन वह हमेशा खुश और संतुष्ट रहता था। वह सुबह जल्दी उठता, खेतों में काम करता, और रात को परिवार के साथ हंसते-खेलते समय बिताता।
महेश ने एक दिन गोपाल से पूछा, “तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, फिर भी तुम हमेशा खुश कैसे रहते हो?” गोपाल मुस्कुराते हुए बोला, “सेठजी, मैं संतोष में विश्वास रखता हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है, मैं उसी में खुश रहता हूँ। मुझे ज्यादा की लालसा नहीं है। मेरी खुशी मेरे परिवार और मेरे काम में है।”
महेश को गोपाल की बातों पर विश्वास नहीं हुआ। उसने सोचा, “यह कैसे संभव है? एक गरीब आदमी जो शायद दिन में दो वक्त की रोटी मुश्किल से कमा पाता है, वह मुझसे ज्यादा खुश कैसे हो सकता है?”
महेश ने सोचा कि वह अपनी संपत्ति बढ़ाकर और खुश हो सकता है। उसने दिन-रात काम करना शुरू कर दिया। उसने अपने व्यापार का विस्तार किया और और भी ज्यादा धन अर्जित किया। लेकिन जितना ज्यादा धन वह कमाता, उतना ही अधिक असंतोष उसके दिल में बढ़ता गया।
एक दिन, महेश ने महसूस किया कि उसके पास सब कुछ होते हुए भी वह खुश नहीं है। उसने गोपाल की बातों को याद किया और सोचा, “संतोष का सुख ही असली सुख है। अगर मैं अपनी लालसाओं को छोड़ दूं और अपने पास जो कुछ है, उसमें संतुष्ट रहूं, तो मैं भी खुश हो सकता हूँ।”
उसने अपने जीवन को सरल बनाया। अब वह अपनी संपत्ति का एक हिस्सा जरूरतमंदों की मदद के लिए दान करता और अपने परिवार के साथ समय बिताता। धीरे-धीरे, महेश ने खुशी और संतोष का असली अर्थ समझा।
शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि खुशी हमारे पास धन या संपत्ति से नहीं आती, बल्कि हमारे संतोष और जीवन के प्रति दृष्टिकोण से आती है। संतोष का सुख ही सच्चा सुख है। जब हम अपने पास जो कुछ है, उसमें खुश रहना सीखते हैं, तो जीवन और भी सुंदर हो जाता है।
पहेली का उत्तर : सुई धागा
========================= 160
प्रार्थना:
ॐ एकदन्ताय विद्महे
वक्रतुंडाय धीमहि
तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात॥
अर्थ: हम भगवान गणपति, जिनके हाथी के दांत हैं और जो सर्वव्यापी है, उनको नमन करते हैं। हम भगवान गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें अधिक बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को ज्ञान से रोशन कर दें। हम आपके सामने नतमस्तक होते हैं।
मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
भावार्थ: हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।
गर्भ संवाद:
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !
— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।
— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।
— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।
— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।
— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।
— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।
— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।
— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।
— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।
—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।
गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे, सच्चा सुख तभी मिलता है जब तुम दूसरों की मदद करते हो। जब तुम किसी की मदद करते हो, तो न केवल उस व्यक्ति का जीवन बेहतर होता है, बल्कि तुम्हारे भीतर एक गहरी संतुष्टि का अहसास होता है। जीवन में खुद को दूसरों की मदद करने के लिए समर्पित करना सच्ची खुशी का स्रोत बनता है। जब तुम दूसरों के लिए जीते हो, तो तुम्हें असली सुख और शांति मिलती है। यह तुम्हारे दिल को सुकून देता है और तुम्हारी आत्मा को शांति।”
पहेली:
बारह घोड़े, 30 गाड़ी,
365 करें सवारी।
कहानी: भरत का आदर
भरत, भगवान राम के छोटे भाई अपने आदर, प्रेम, और त्याग के लिए जाने जाते हैं। रामायण की कहानी में भरत का स्थान केवल एक छोटे भाई तक सीमित नहीं है, बल्कि वह आदर्श भाई और राजा के प्रतीक भी हैं। उनकी कहानी हमें सिखाती है कि कैसे परिवार और धर्म के प्रति निष्ठा और आदर सबसे ऊपर होते हैं।
जब कैकयी ने अपने बेटे भरत के लिए अयोध्या का राजपाठ मांगा और भगवान राम को वनवास भेज दिया, तो भरत इस निर्णय से बहुत आहत हुए। भरत को जब यह पता चला कि उनकी मां ने राम को 14 वर्षों के लिए वनवास भेज दिया है, तो उन्होंने अपनी मां से कहा, “मां, आपने यह क्या किया? राम बड़े भाई ही नहीं बल्कि हमारे लिए भगवान समान हैं। मैं इस राजपद को स्वीकार नहीं करूंगा।”
भरत राम से मिलने चित्रकूट पहुंचे। उन्होंने राम से कहा, “भैया, अयोध्या का राजा बनने का हक सिर्फ आपका है। कृपया लौट आइए और अयोध्या का शासन संभालिए।” लेकिन राम ने अपनी मर्यादा और पिता के वचन को निभाने का निश्चय किया। उन्होंने भरत से कहा, “भाई, यह हमारा कर्तव्य है कि हम पिता के वचनों का पालन करें। अयोध्या का राजपद अब तुम्हारा है।”
भरत ने राम का आदेश तो मान लिया, लेकिन वह अयोध्या के राजा बनने के लिए तैयार नहीं थे। उन्होंने राम की चरणपादुका (जूते) अपने सिर पर रखी और कहा, “भैया, यह राज्य मैं नहीं, आपकी चरणपादुकाएं संभालेंगी। मैं केवल उनका सेवक बनकर शासन करूंगा।”
भरत ने 14 वर्षों तक राजकाज संभाला लेकिन वह राम के बिना एक सामान्य व्यक्ति की तरह ही रहे। वह राम की वापसी का इंतजार करते रहे और हर क्षण उनके आदर और सम्मान में बिताया।
शिक्षा:
भरत की कहानी हमें सिखाती है कि परिवार और धर्म के प्रति आदर और निष्ठा ही जीवन का सच्चा आधार है। उन्होंने त्याग और आदर का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया, जो हमें यह सिखाता है कि अपने कर्तव्य और मर्यादा का पालन करना सबसे महत्वपूर्ण है।
पहेली का उत्तर : साल, महीने, दिन
========================= 161
प्रार्थना:
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।
हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के परम ज्योति जगा देना।
बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर,
हमे आपस में मिलजुल के प्रभु रहना सीखा देना।
हमारा कर्म हो सेवा, हमारा धर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा, वो सेवक चर बना देना।
वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना,
वतन पे जा फ़िदा करना, प्रभु हमको सीखा देना।
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना।
मंत्र:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।
अर्थः हे भगवान गणेश! आप विशालकाय और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। हमारे सभी कार्य बिना विघ्न के पूरे करें।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।
— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।
— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।
— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।
— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।
— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।
— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।
— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।
— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।
— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।
— तुम अनुशासन प्रिय हो।
— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।
— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।
— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।
— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।
— तुम सत् और असत के पारखी हो।
— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।
— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।
— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।
— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।
— तुम हाजिर जवाबी हो।
— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।
— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।
पहेली:
एक हाथ का प्राणी अचल
हाथ हिलाओ निकले जल।
कहानी: विभीषण की धर्मनिष्ठा
विभीषण, रावण के छोटे भाई धर्म और सत्य के प्रति अपनी निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। रामायण में उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि सही मार्ग पर चलने के लिए कभी-कभी हमें अपने परिवार के खिलाफ भी खड़ा होना पड़ता है।
जब रावण ने माता सीता का हरण किया और उन्हें लंका ले गया, तो विभीषण ने इसे गलत ठहराया। उन्होंने अपने बड़े भाई रावण से कहा, “भ्राता, आपने जो किया है, वह अधर्म है। सीता माता को उनके पति राम के पास वापस भेज दीजिए। यह हमारा धर्म और मर्यादा है।”
लेकिन रावण ने विभीषण की बात को नजरअंदाज कर दिया और उन्हें अपमानित किया। रावण ने कहा, “तुम मेरे शत्रु राम का पक्ष ले रहे हो। अगर तुम मेरे आदेश का पालन नहीं कर सकते, तो इस राज्य से चले जाओ।”
विभीषण ने रावण को चेतावनी दी, “भ्राता! अधर्म का मार्ग विनाश की ओर ले जाता है। मैं आपका साथ नहीं दे सकता।” यह कहकर विभीषण लंका छोड़कर राम के पास चले गए।
राम ने विभीषण का आदर किया और उनकी धर्मनिष्ठा को सराहा। उन्होंने विभीषण को लंका का राजा बनाने का वचन दिया और उन्हें अपनी सेना में शामिल किया।
राम और विभीषण के सहयोग से रावण का वध हुआ और लंका में धर्म की पुनर्स्थापना हुई।
विभीषण ने यह साबित किया कि धर्म और सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन यह हमेशा सही होता है। उन्होंने अपने परिवार के खिलाफ खड़े होकर भी धर्म का पालन किया और न्याय की स्थापना की।
शिक्षा:
विभीषण की कहानी हमें सिखाती है कि धर्म और सत्य का मार्ग ही सच्चा मार्ग है। कभी-कभी सही चीज़ करने के लिए हमें कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं, लेकिन अंत में सत्य और धर्म की जीत होती है। हमें हमेशा अपने कर्तव्यों और सही मूल्यों का पालन करना चाहिए।
पहेली का उत्तर : हैण्ड पम्प
=======================162
प्रार्थना:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
भावार्थ: हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।
मंत्र:
ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे शंकरप्राणवल्लभे।
ज्ञान वैराग्य सिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वती॥
अर्थः हे मां अन्नपूर्णा! आप हमें भोजन, ज्ञान और वैराग्य का आशीर्वाद दें।
गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!
— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ भौतिक गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।
— परम तेजस्वी ईश्वर का अंश होने के कारण तुम्हारे मुख पर सूर्य के समान दिव्य तेज और ओज रहता है।
— तुम्हारे नैन-नक्श तीखे और बहुत सुन्दर है, तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा सबको बहुत प्यारा लगता है।
— तुम्हारे चेहरे का रंग गोरा और सबका मन मोह लेने वाला है।
— तुम्हारी हर अदा सुन्दरतम ईश्वर की झलक लिए हुए है, तुम्हारा माथा चौड़ा है, तुम्हारी आँखें बड़ी है, तुम्हारी भौहें तीर के आकार की तरह बड़ी है, तुम्हारी पलकें काली और बड़ी हैं।
— तुम्हारे होंठ फूल की तरह कोमल और सुन्दर हैं, तुम्हारे चेहरे पर हर पल एक मधुर मुस्कान छाई रहती है।
— तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र है, तुम्हारी वाणी मधुर और सम्मोहन करने वाली है।
— तुम बहुत अच्छे खिलाडी हो, तुम्हारा शरीर तंदुरुस्त और फुर्तीला है। (किसी विशेष खेल के प्रति शिशु के मन में प्रतिभा विकसित करनी हो तो यहाँ कह सकते हैं)
— तुम बहुत सुंदर दिखते हो, बड़े होने पर भी तुम्हारी सुंदरता और निखरती जाएगी।
— तुम्हारी हर अदा बहुत निराली और अनोखी है।
— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर में बहुत प्रसन्न हूँ, जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन है।
पहेली:
अजब सुनी इक बात,
नीचे फल और ऊपर पात।
कहानी: दधीचि का आत्मत्याग
भारत के पुराणों और वेदों में बहुत से ऐसे महान व्यक्तित्वों का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने अपने जीवन में अपार बलिदान और साहस का परिचय दिया। उनमें से एक महान उदाहरण महर्षि दधीचि का है। महर्षि दधीचि की कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर कोई उद्देश्य महान हो, तो आत्मत्याग भी महत्त्वपूर्ण हो सकता है। उनका जीवन न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह हमें अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पण, त्याग और बलिदान की प्रेरणा देता है।
महर्षि दधीचि का जीवन:
महर्षि दधीचि का जन्म एक तपस्वी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह तपस्वी और ब्रह्मचारी थे। बचपन से ही अत्यंत ज्ञानी, तपस्वी और ब्रह्मचारी थे। उनकी साधना और तपस्या का स्तर इतना उच्च था कि वह न केवल अपने समय के महान ऋषियों में गिने जाते थे, बल्कि उन्हें देवताओं से भी विशेष आशीर्वाद प्राप्त था। उनका जीवन अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित था, और उनकी विशेषता यह थी कि वह हमेशा दूसरों की भलाई के लिए तत्पर रहते थे।
महर्षि दधीचि की एक बहुत प्रसिद्ध कथा है, जो उनके महान बलिदान से जुड़ी हुई है। यह कथा न केवल हमारे धर्म ग्रंथों में वर्णित है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि कभी-कभी हमें अपने व्यक्तिगत सुखों और इच्छाओं को छोड़कर समाज और अन्य जीवों के कल्याण के लिए बलिदान देना पड़ता है।
दधीचि का आत्मत्यागः
एक समय की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हो रहा था। देवता अपने विरोधी असुरों, से पराजित हो रहे थे। असुरों के पास एक बहुत ही शक्तिशाली अस्त्र था जिसे ‘वज्र’ कहा जाता था। यह अस्त्र इतना शक्तिशाली था कि वह किसी भी प्राणी को समाप्त करने की क्षमता रखता था। इस अस्त्र को प्राप्त करने के लिए देवताओं ने ब्रह्मा जी से मार्गदर्शन लिया। ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया कि इस अस्त्र को प्राप्त करने के लिए एक विशिष्ट प्रकार की हड्डी चाहिए और वह हड्डी महर्षि दधीचि के शरीर से ही प्राप्त की जा सकती थी।
महर्षि दधीचि के शरीर की हड्डियां इतनी मजबूत और शक्तिशाली थीं कि देवताओं को विश्वास था कि इस हड्डी से वज्र अस्त्र का निर्माण हो सकता है जो असुरों के आतंक से छुटकारा दिल सकता था। लेकिन यह कोई साधारण कार्य नहीं था। हड्डी को प्राप्त करने के लिए महर्षि दधीचि को उनका शरीर त्यागने की आवश्यकता थी।
जब देवताओं ने यह प्रस्ताव महर्षि दधीचि के सामने रखा, तो वह बिना किसी हिचकिचाहट के तैयार हो गए। उन्होंने न केवल अपनी हड्डी दी, बल्कि अपने शरीर को पूर्ण रूप से त्याग दिया। महर्षि दधीचि का यह आत्मत्याग एक अद्वितीय उदाहरण था, जो यह दर्शाता है कि किसी उद्देश्य के लिए जीवन का बलिदान कैसे किया जा सकता है।
महर्षि दधीचि का त्याग केवल व्यक्तिगत बलिदान नहीं था, बल्कि यह समाज और मानवता के कल्याण के लिए किया गया था।
उन्होंने अपनी हड्डियों का त्याग कर देवताओं को वज्र अस्त्र बनाने की अनुमति दी, जिससे असुरों के आतंक का अंत हुआ और देवताओं की विजय हुई। इस प्रकार, महर्षि दधीचि के बलिदान ने देवताओं को असुरों से मुक्ति दिलाई, और उनके त्याग ने संपूर्ण ब्राह्मण धर्म और समाज को गौरवान्वित किया।
दधीचि का त्याग और बलिदानः
महर्षि दधीचि का त्याग और बलिदान इस बात का प्रतीक है कि जब कोई उद्देश्य महान हो, तो व्यक्ति को अपनी सुख-सुविधाओं और जीवन के सबसे अमूल्य अंगों को भी त्यागने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। महर्षि दधीचि ने यह साबित कर दिया कि उच्च उद्देश्य के लिए व्यक्तिगत सुखों और इच्छाओं का त्याग करना एक सर्वोत्तम कर्तव्य है। उनका यह बलिदान केवल एक धार्मिक कार्य नहीं था, बल्कि यह समाज की भलाई के लिए किया गया कार्य था। उनके द्वारा दी गई हड्डियों से वज्र अस्त्र बना, जिससे असुरों का नाश हुआ और देवताओं को सुरक्षा मिली। महर्षि दधीचि का यह बलिदान न केवल देवताओं के लिए, बल्कि सभी प्राणियों के लिए था। उनके त्याग के कारण समाज को शांति मिली और असुरों का आतंक समाप्त हुआ।
दधीचि के बलिदान से शिक्षा:
महर्षि दधीचि का जीवन और उनका आत्मत्याग हमें कई महत्वपूर्ण शिक्षाएं देता है। यह हमें सिखाता है कि किसी भी महान उद्देश्य के लिए हमें अपने व्यक्तिगत लाभ और सुख को त्यागने में संकोच नहीं करना चाहिए। महर्षि दधीचि ने न केवल अपने शरीर की हड्डियों का त्याग किया, बल्कि वह इस त्याग को समाज और प्राणियों के कल्याण के लिए एक महान कार्य मानते थे।
उच्च उद्देश्य के लिए त्याग:
महर्षि दधीचि का जीवन हमें यह सिखाता है कि जब उद्देश्य उच्च और समाजहित में हो, तो व्यक्ति को अपने सुखों और इच्छाओं को त्यागने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। उनका त्याग एक उदाहरण है कि कैसे व्यक्ति अपने जीवन का बलिदान समाज और प्राणियों के कल्याण के लिए दे सकता है।
समाज का कल्याण सर्वोपरि:
महर्षि दधीचि का त्याग यह बताता है कि किसी भी व्यक्ति को केवल अपने सुख की चिंता नहीं करनी चाहिए। समाज और दूसरों का कल्याण हमेशा सर्वोपरि होना चाहिए।
समर्पण और सेवा:
महर्षि दधीचि के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका समर्पण और सेवा भाव था। उन्होंने अपना जीवन दूसरों की सेवा में समर्पित किया और इस सेवा ने उन्हें एक महान ऋषि और आदर्श बना दिया।
आत्मत्याग का महत्व:
महर्षि दधीचि का त्याग यह सिखाता है कि कभी-कभी हमें अपनी इच्छाओं और व्यक्तिगत सुखों को त्यागकर समाज और अन्य जीवों के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। उनका आत्मत्याग एक प्रेरणा है कि त्याग और बलिदान के बिना किसी महान कार्य की सफलता संभव नहीं होती।
महर्षि दधीचि का अमर योगदानः
महर्षि दधीचि का योगदान केवल धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से ही नहीं, बल्कि उनके द्वारा दिखाए गए त्याग और बलिदान के कारण भी अमर रहेगा। उनका जीवन और उनकी साधना न केवल धार्मिक ग्रंथों में वर्णित है, बल्कि वह भारतीय समाज में एक आदर्श के रूप में स्थापित हैं।
शिक्षा:
महर्षि दधीचि का जीवन यह सिखाता है कि जब उद्देश्य महान हो, तो आत्मत्याग का मूल्य भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। उनके बलिदान ने हमें यह संदेश दिया कि हमें अपने व्यक्तिगत सुखों की चिंता किए बिना समाज और मानवता के कल्याण के लिए कार्य करना चाहिए। उनका जीवन एक प्रेरणा है कि केवल अपने लिए जीने से कहीं बढ़कर दूसरों के लिए जीने में सुख है।
पहेली का उत्तर : अनानास
======================== 163