Garbha Sanskar - 7 in Hindi Women Focused by Praveen Kumrawat books and stories PDF | गर्भ संस्कार - भाग 7 - ऐक्टिविटीज़–06

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गर्भ संस्कार - भाग 7 - ऐक्टिविटीज़–06

प्रार्थना:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्

भावार्थ: हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म-मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।

मंत्र:
सर्वे भवन्तु सुखिनः। सर्वे सन्तु निरामयाः।।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु। मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत।।

अर्थ— सब लोग सुखी रहें। सब लोग निरोगी रहें। 
सब लोग मंगलमय घटनाएँ देखें। किसी को भी दुख न हो।

गर्भ संवाद 
“मेरे बच्चे, जीवन में संयम और धैर्य की बहुत आवश्यकता होती है। जब भी तुम कोई काम करते हो, तो उसमें धैर्य बनाए रखो, क्योंकि बिना धैर्य के सफलता प्राप्त करना कठिन हो सकता है। संयम तुम्हें हर कठिनाई में शांत और स्थिर रहने की शक्ति देता है। धैर्य से तुम जीवन की किसी भी मुश्किल को पार कर सकते हो, और हर सफलता तुम्हारे कदमों में होगी।”

पहेली:
एक आदमी ने एक ऊँगली से छह लोगों को छह सेकंड में ऊपर पहुँचा दिया।
वो न तो स्पाइडर मैन था और न ही सुपर मैन। तो बताओ वो कौन था?

कहानी: एक मां का सपना
यह कहानी एक छोटे से गाँव की एक साधारण महिला, राधा, की है, जो अपने सपनों को अपने बच्चे के भविष्य में जीने का सपना देखती थी। राधा एक गरीब, लेकिन मेहनती महिला थी। उसके पास कोई विशेष संपत्ति नहीं थी, लेकिन उसके दिल में अपार प्यार और एक मजबूत आत्मविश्वास था। उसका एक बेटा, राहुल था जो अब पांच साल का हो चुका था। राधा का जीवन अपनी दिन-रात की मेहनत में बीतता था, लेकिन हर समय उसका सपना यही था कि उसका बेटा एक दिन दुनिया में कुछ बड़ा कर सके, और वह उसे उस स्थिति में देख सके, जहाँ उसे कभी भी किसी चीज़ की कमी न हो।

राधा का सपना इतना विशाल था कि उसने कभी अपनी परिस्थितियों से हार मानने का नाम नहीं लिया। वह जानती थी कि गरीबी उसकी नियति नहीं है, बल्कि यह एक अस्थायी स्थिति है। उसे पूरा विश्वास था कि अगर वह अपने बेटे राहुल को सही शिक्षा और जीवन के मूल्य सिखाएगी, तो वह जीवन में किसी भी मुश्किल का सामना कर सकेगा। यही सपना उसे हर दिन प्रेरित करता था, यही सपना उसे हर सुबह और शाम को अपने बेटे के लिए मेहनत करने की ताकत देता था।

राधा का दिन कभी आराम से नहीं गुजरता था। वह सुबह जल्दी उठती, चाय बनाती, फिर घर के छोटे-मोटे कामों को करती और दिन भर , किसी घर में बर्तन धोने, किसी के घर में झाड़ू-पोछा करने और कपड़े धोने का काम करती थी। लेकिन उसका एकमात्र ध्यान यही था कि वह राहुल को अच्छे से अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाए, ताकि वह बड़ा आदमी बने और गरीबी से बाहर निकल सके। राहुल का मन भी पढ़ाई में बहुत लगता था। राधा उसे हर दिन पढ़ने के लिए प्रेरित करती थी।

वह जानती थी कि बेटे का भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है, जब वह खुद कठिनाई से उबरकर अपने सपनों को सच कर सके। राधा हमेशा उसे यही सिखाती थी, “बेटा, सपने देखने से ज्यादा जरूरी है उन्हें पूरा करने के लिए कठिन मेहनत करना।”

समय बीतता गया, और राहुल ने अपनी पढ़ाई में काफी अच्छा प्रदर्शन किया। उसने अपनी कड़ी मेहनत से स्कूल में टॉप किया, और इसके बाद उसे एक अच्छे कॉलेज में प्रवेश मिल गया। राधा को अपने बेटे की सफलता में वह सब कुछ दिखाई दे रहा था, जो उसने वर्षों तक मेहनत की थी। राहुल ने यह साबित कर दिया कि मेहनत और समर्पण से कोई भी बाधा पार की जा सकती है।

लेकिन राधा का सपना अब भी अधूरा था। उसे यह विश्वास था कि राहुल एक दिन अपने देश के लिए कुछ बड़ा करेगा, वह समाज में बदलाव लाएगा और उसकी सफलता न केवल उसे, बल्कि पूरे गाँव और समाज को प्रेरित करेगी। 

उसकी यह आकांक्षा थी कि उसका बेटा किसी दिन डॉक्टर, इंजीनियर या कोई बड़ा अधिकारी बने, ताकि वह दूसरों की मदद कर सके और समाज में बदलाव ला सके।

कई सालों बाद, राहुल ने एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की और एक बड़े संस्थान में काम करने लगा। उसकी कड़ी मेहनत और लगन के कारण उसने अपनी जगह बनाई और दूसरों के लिए एक प्रेरणा बन गया लेकिन सबसे बड़ी खुशी राधा के लिए यह थी कि राहुल ने हमेशा अपने माता-पिता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई।

राधा को यह समझ में आ गया कि उसने जो सपना देखा था, वह अब सच हो चुका था। उसका सपना केवल राहुल के भविष्य के बारे में नहीं था, बल्कि यह सपने देखने और उन्हें साकार करने की प्रक्रिया के बारे में था। राधा ने अपने बेटे के रूप में न केवल अपने सपने को, बल्कि अपने संघर्ष और मेहनत के फल को भी देखा। राहुल ने न केवल अपनी माँ के सपने को पूरा किया, बल्कि उसने उस सपने को और भी विशाल बना दिया।

राधा का सपना अब पूरा हो चुका था, लेकिन यह सपना केवल उसकी मेहनत और प्यार का परिणाम नहीं था, बल्कि यह उस उम्मीद का प्रतीक था जो हर मां के दिल में अपने बच्चे के लिए होती है। राधा ने यह महसूस किया कि एक मां का सपना उसके बच्चे की सफलता में ही साकार होता है, और यह सपना कभी न खत्म होने वाली प्रेरणा का स्रोत बनता है।

शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि एक मां का सपना कभी भी खुद से नहीं होता, बल्कि यह उसके बच्चे की सफलता और खुशी में होता है। माँ की ममता और उसकी मेहनत, उसके सपनों को हकीकत में बदल देती है। सही मार्गदर्शन, प्रेम और संघर्ष से न केवल हम अपनी समस्याओं को पार कर सकते हैं, बल्कि हम अपने बच्चों को भी जीवन में सफल और खुशहाल बना सकते हैं। एक मां का सपना अपने बच्चे की खुशी, उसकी सफलता और उसकी उन्नति में छिपा होता है, और यही वह शक्ति है जो उसे कभी हारने नहीं देती।

पहेली का उत्तर : लिफ्ट मैन
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प्रार्थना:
ॐ एकदन्ताय विद्महे 
वक्रतुंडाय धीमहि 
तन्नो बुदि्ध प्रचोदयात॥

अर्थ: हम भगवान गणपति, जिनके हाथी के दांत हैं और जो सर्वव्यापी है, उनको नमन करते हैं। हम भगवान गणेश जी से प्रार्थना करते हैं कि हमें अधिक बुद्धि प्रदान करें और हमारे जीवन को ज्ञान से रोशन कर दें। हम आपके सामने नतमस्तक होते हैं। 

मंत्र:
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। 
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

अर्थ: गुरु ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान हैं। हम गुरु को साक्षात् परमात्मा के रूप में वंदन करते हैं।

गर्भ संवाद 
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हें यह हमेशा याद रखना है कि अच्छाई का रास्ता कभी आसान नहीं होता, लेकिन यह हमेशा जीतता है। जब तुम सच्चाई और अच्छाई के मार्ग पर चलोगे, तो भले ही शुरुआत में कठिनाई आए, पर अंत में तुम्हारी मेहनत और अच्छाई को ही जीत मिलेगी। बुराई कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अच्छाई हमेशा उसे परास्त कर देती है।”

पहेली:
तीन अक्षर का उसका नाम 
आता है जो खाने के काम, 
अंत कटे तो हल बन जाये, 
मध्य कटे तो हवा बन जाये। 
बोलो जरा उसका नाम ?

कहानी: ईमानदारी की पहचान
यह कहानी एक छोटे से गाँव के एक लड़के अर्जुन की है। अर्जुन एक ईमानदार और नेक दिल लड़का था, जो हमेशा सच बोलता था और किसी भी स्थिति में अपनी ईमानदारी से समझौता नहीं करता था। उसका मानना था कि ईमानदारी सबसे बड़ी संपत्ति है और उसे हमेशा अपनी मेहनत और अच्छाई से आगे बढ़ना चाहिए।

अर्जुन के माता-पिता बहुत गरीब थे, लेकिन वे सच्चाई और ईमानदारी की महत्वता को हमेशा उसे समझाते रहते थे। अर्जुन ने भी उनसे यही सीखा था कि जीवन में अगर ईमानदारी से काम किया जाए, तो चाहे परिस्थितियाँ जैसी भी हों, एक दिन सफलता जरूर मिलती है। 

गाँव के पास एक बड़ा बाजार था, जहाँ लोग विभिन्न सामान खरीदने और बेचने आते थे। अर्जुन का एक छोटा सा काम था–वह एक दुकानदार के पास कुछ पैसे लाकर देता था और बदले में कुछ सामान लेकर आता था। एक दिन अर्जुन को बाजार से लौटते समय रास्ते में एक थैला मिला। वह थैला किसी का खोया हुआ लग रहा था। अर्जुन ने थैले को खोला और देखा कि उसमें बहुत सारे पैसे थे। उसका मन करने लगा कि क्यों न इन पैसों को अपने घर ले जाऊँ और इसका सही इस्तेमाल करूँ लेकिन उसी वक्त उसने सोचा, “अगर ये पैसे किसी और के हैं, तो क्या होगा?” उसने तुरन्त निर्णय लिया कि वह इन पैसों को किसी के हाथ में दे देगा।

अर्जुन थैले को लेकर बाजार के एक पुलिसकर्मी के पास गया और कहा, “सर, मुझे यह थैला रास्ते में मिला है। इसमें बहुत सारे पैसे हैं। यह किसी का खोया हुआ हो सकता है। कृपया इसे सही आदमी तक पहुँचाइए।” पुलिसकर्मी ने थैले को देखा और अर्जुन की ईमानदारी की सराहना की।

कुछ दिन बाद, गाँव में एक घोषणा की गई कि एक व्यापारी ने बाजार में अपना थैला खो दिया था, जिसमें काफी पैसे थे। व्यापारी ने अपनी खोई हुई संपत्ति के लिए एक इनाम घोषित किया था। पुलिसकर्मी ने अर्जुन को व्यापारी के पास भेजा, और व्यापारी ने उसकी ईमानदारी के लिए उसे बहुत सराहा। उसने अर्जुन को एक अच्छा पुरस्कार दिया और कहा, “तुम्हारी ईमानदारी ने हमें यह समझाया कि सच में सबसे बड़ी दौलत ईमानदारी है।”

इस घटना ने अर्जुन को और भी प्रेरित किया। उसने समझा कि ईमानदारी की कोई कीमत नहीं होती, और इसका सही मूल्य केवल वही जान सकता है, जो सच के रास्ते पर चलता है। अर्जुन ने उस दिन तय किया कि वह हमेशा अपनी ईमानदारी से ही जीवन जीएगा और कभी भी किसी गलत रास्ते पर नहीं चलेगा।

शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि ईमानदारी सबसे बड़ी संपत्ति है, जो कभी भी हमें निराश नहीं करती। जीवन में चाहे जैसी भी कठिनाई आए, अगर हम ईमानदारी से काम करें, तो सफलता जरूर मिलती है। अर्जुन की तरह हमें भी अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना चाहिए, क्योंकि ईमानदारी ही हमारे चरित्र की पहचान होती है और यह हमें हर संकट से बाहर निकालती है।

पहेली का उत्तर : हलवा
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प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥

मंत्र:
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय धन्वंतरये । 
अमृतकलश हस्ताय सर्वामय विनाशनाय । 
त्रैलोक्यनाथाय श्री महाविष्णवे नमः।।

अर्थः हे भगवान धन्वंतरि! आप हमें आरोग्य और सभी रोगों से मुक्ति प्रदान करें।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे, देखो, सूरज की रोशनी कितनी गर्म और उज्ज्वल होती है। जैसे सूरज हर सुबह नयी ऊर्जा और आशा के साथ दुनिया को रोशन करता है, वैसे ही तुम्हारे जीवन में हर दिन एक नई ऊर्जा और संभावना लाता है। सूरज की तरह तुम्हें भी हर दिन एक नई शुरुआत करनी चाहिए। सूरज की तरह अपनी ऊर्जा और सकारात्मकता से तुम न केवल अपनी, बल्कि दूसरों की दुनिया भी रोशन कर सकते हो।”

पहेली:
हरा हूँ पर पत्ता नहीं, नकलची हूँ पर बन्दर नहीं। 
बूझो तो मेरा नाम सही ?

कहानी: सेवा का सच्चा सुख
यह कहानी एक छोटे गाँव के एक साधारण लड़के, मोहन, की है। मोहन गरीब था, लेकिन उसमें एक विशेष गुण था–वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता था। उसकी मदद करने की भावना इतनी गहरी थी कि उसे खुद की परेशानियों से कहीं अधिक दूसरों की परेशानियाँ छूती थीं।

गाँव में एक वृद्ध महिला, शांति देवी, रहती थीं। वह उम्र में बहुत बड़ी थीं और उनका शरीर भी कमजोर हो चुका था। उन्हें चलने-फिरने में बहुत कठिनाई होती थी। मोहन ने अक्सर देखा था कि शांति देवी को अपने घर के कामों में मुश्किल होती थी लेकिन किसी से मदद लेने की उनकी कभी भी हिम्मत नहीं होती एक दिन मोहन ने शांति देवी से कहा, “आंटी, मुझे आपके घर के कामों में मदद करने दीजिए। मुझे अच्छा लगेगा।” शांति देवी पहले तो थोड़ी झिझकीं, लेकिन मोहन की सच्ची मदद की भावना देख कर उन्होंने हामी भर दी।

मोहन ने शांति देवी के घर के बर्तन धोने से लेकर, उनकी दुकान से सामान लाने तक, हर काम में मदद करना शुरू किया। वह रोज़ शांति देवी के घर जाता और उनकी मदद करता। धीरे-धीरे, शांति देवी की सेहत में भी सुधार होने लगा और उनके चेहरे पर एक नई चमक आ गई। मोहन की सेवा ने शांति देवी को मानसिक शांति और शारीरिक स्फूर्ति प्रदान की थी।

एक दिन शांति देवी ने मोहन से कहा, “बच्चे, तुम्हारी सेवा ने मुझे जो सुख दिया है, वह शब्दों में नहीं कहा जा सकता। यह सुख किसी बड़े पुरस्कार से भी बढ़कर है। जब तक हम दूसरों की मदद नहीं करते, तब तक हमें जीवन का असली सुख नहीं मिलता।”

मोहन को यह सुनकर बहुत खुशी हुई। उसने महसूस किया कि सेवा केवल भौतिक मदद नहीं है, बल्कि यह एक गहरे आंतरिक सुख की अनुभूति है। मोहन ने यह भी समझा कि सेवा का असली सुख दूसरों की मदद करने में ही नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी में सकारात्मक बदलाव लाने में होता है।

कई दिनों बाद, मोहन के गाँव में एक बड़ा आयोजन हुआ। गाँव के लोग उसे सम्मानित करने के लिए एक समारोह आयोजित करने वाले थे। उन्होंने मोहन को “सेवा का सच्चा सुख” पुरस्कार देने का निर्णय लिया। गाँव के सभी लोग जानते थे कि मोहन ने बिना किसी स्वार्थ के हमेशा दूसरों की मदद की थी। मोहन को यह सम्मान मिला, लेकिन उसने कभी यह नहीं सोचा था कि उसकी छोटी-सी मदद को इतना बड़ा माना जाएगा। उसे सबसे बड़ा सुख तो यह था कि वह शांति देवी की मदद करके उनके जीवन में एक बदलाव ला सका था।

शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सेवा का असली सुख केवल उस कार्य में नहीं होता, बल्कि उस कार्य से दूसरों के जीवन में जो सकारात्मक बदलाव आता है, वही सबसे बड़ा सुख है। मोहन ने हमें यह समझाया कि सेवा एक आत्मिक संतोष देती है और यह न केवल दूसरों की मदद करने का तरीका है, बल्कि यह हमारी आत्मा की शुद्धता और आंतरिक सुख का प्रतीक भी है। जब हम बिना किसी स्वार्थ के दूसरों के लिए कुछ करते हैं, तो वही सच्चा सुख होता है।

पहेली का उत्तर : तोता
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प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥

मंत्र:
ॐ शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्। 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभांगम्॥
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

अर्थः मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।

गर्भ संवाद
“सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाहट सुनो, वे कितनी खुशी से अपने दिन की शुरुआत करते हैं। जैसे पक्षी बिना किसी चिंता के खुले आकाश में उड़ते हैं, वैसे ही तुम भी अपनी जीवन यात्रा को बिना डर के, बिना किसी चिंता के अपनाओ। हर दिन नया होता है और तुम्हें उस नए दिन को पूरी ऊर्जा और खुशी के साथ जीना चाहिए, जैसे पक्षी अपने जीवन में हर दिन का स्वागत करते हैं।”

पहेली:
तीन अक्षर का मेरा नाम 
प्रथम कटे तो शस्त्र बनू 
अंत कटे तो ज्वाला, 
मध्य कटे तो बनू मैं आन, 
बोलो क्या हैं मेरा नाम ?

कहानी: युधिष्ठिर का सत्य
यह कहानी महाभारत के महान नायक युधिष्ठिर की है। युधिष्ठिर, जो पांडवों में सबसे बड़े थे, सत्य के प्रति अपनी गहरी निष्ठा के लिए प्रसिद्ध थे। उनका जीवन सत्य के आदर्शों पर आधारित था, और उन्होंने जीवन में हमेशा सच बोलने को प्राथमिकता दी। युधिष्ठिर का विश्वास था कि सत्य का पालन करने से चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न आएं, अंततः वही विजय प्राप्त करता है।

एक दिन दुर्योधन, जो पांडवों का कट्टर शत्रु था, ने युधिष्ठिर को चुनौती दी। उसने युधिष्ठिर को एक सभा में बुलाया और कहा, “तुम्हारे सत्य और धर्म का दावा कितना सही है, यह मैं देखना चाहता हूँ। मैं तुम्हारे सामने एक सवाल रखता हूँ, और यदि तुम इसका सही जवाब दे सको, तो तुम सच में सत्य के पालनकर्ता हो।” युधिष्ठिर ने बिना किसी संकोच के कहा, “अपना सवाल पूछो, मैं इसका उत्तर देने को तैयार हूँ।”

दुर्योधन ने सवाल पूछा, “क्या तुम यह कह सकते हो कि तुमने कभी किसी गलत कार्य का समर्थन नहीं किया है, और तुम हमेशा सत्य के मार्ग पर चले हो?” युधिष्ठिर को इस सवाल का सामना करना पड़ा, क्योंकि उन्होंने जीवन में कई कठिनाइयों का सामना किया था, और युद्ध में भी कई बार उन्हें संकोच करना पड़ा था।

लेकिन युधिष्ठिर का उत्तर यही था, “मैं सत्य के मार्ग पर चलता हूँ, और मैं जानता हूँ कि कभी-कभी हमें जीवन में कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं, लेकिन मेरी निष्ठा हमेशा सत्य के प्रति रही है। सत्य ही वह मार्ग है जो हमें सही दिशा दिखाता है, चाहे वह किसी भी स्थिति में हो।”

दुर्योधन ने इसका जवाब सुना और मुस्कुराया। वह जानता था कि युधिष्ठिर हमेशा सत्य बोलते हैं, लेकिन उसने इस प्रश्न से युधिष्ठिर को मानसिक रूप से थोड़ा असमंजस में डालने की कोशिश की थी। लेकिन युधिष्ठिर का उत्तर, उनका आत्मविश्वास और सत्य के प्रति उनका दृढ़ निश्चय ही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। उन्होंने यह साबित कर दिया कि सत्य से बड़ा कोई बल नहीं है, और सत्य ही अंत में विजयी होता है।

युधिष्ठिर ने जीवन में हमेशा सत्य को सर्वोच्च माना और अपने आदर्शों को कभी भी नहीं छोड़ा। उनका यह सत्य का पालन न केवल उन्हें महान बनाता है, बल्कि हमें भी यह सिखाता है कि सत्य का पालन करते हुए जीवन में किसी भी परिस्थिति का सामना किया जा सकता है।

शिक्षा
युधिष्ठिर की यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सत्य का पालन करना कठिन जरूर हो सकता है, लेकिन वही रास्ता हमें सही दिशा और सम्मान की ओर ले जाता है। जीवन में चाहे कितनी भी मुश्किलें आएं, अगर हम सत्य का पालन करते रहें, तो अंत में हमारी जीत होती है। युधिष्ठिर ने हमें यह सिखाया कि सत्य सबसे बड़ी शक्ति है, और अगर हम उस रास्ते पर चलते रहें, तो कोई भी शक्ति हमें रोक नहीं सकती।

पहेली का उत्तर : आँगन
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प्रार्थना:
जिनकी आकृति स्वरूप अतिशय शांत है,जो ‍जगत के आधार व देवताओं के भी ईश्वर (राजा) है, जो शेषनाग की शैया पर विश्राम किए हुए हैं, जिनकी नाभि में कमल है और जिनका वर्ण श्याम रंग का है, जिनके अतिशय सुंदर रूप का योगीजन ध्यान करते हैं, जो गगन के समान सभी जगहों पर छाए हुए हैं, जो जन्म-मरण के भय का नाश करने वाले हैं, जो सम्पूर्ण लोकों के स्वामी हैं, जिनकी भक्तजन वन्दना करते हैं, ऐसे लक्ष्मीपति कमलनेत्र भगवान श्रीविष्णु को अनेक प्रकार से विनती कर प्रणाम करता हूँ।
ब्रह्मा, शिव, वरुण, इन्द्र, मरुद्गण जिनको दिव्य स्तोत्रों से स्तुति गाकर रिझाते है, सामवेद के गाने वाले अंग, पद, क्रम और उपनिषदों के सहित वेदों द्वारा जिनका गान करते हैं, योगीजन ध्यान में स्थित प्रसन्न हुए मन से जिनका दर्शन करते हैं, देवता और असुर जिनके अंत को नही पाते, उन नारायण को मै नमस्कार करता हूँ।

मंत्र:
ॐ नारायणाय विद्महे।
वासुदेवाय धीमहि। 
तन्नो: विष्णुः प्रचोदयात्॥

अर्थः हे भगवान विष्णु! आप हमें जीवन में सन्मार्ग का प्रकाश दें।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! देखो, यह पेड़ अपनी जड़ों से कितना मजबूत है। जब भी कोई तूफान आता है, तो यह अपनी जड़ों के बल पर खड़ा रहता है। तुम्हारी भी जड़ें तुम्हारे परिवार, तुम्हारी शिक्षा और तुम्हारे संस्कार हैं। जैसे पेड़ अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए उगता है और अपनी शाखाओं को फैलाता है, वैसे ही तुम भी अपने मूल्यों और शिक्षाओं से जुड़कर जीवन में आगे बढ़ सकते हो। अपनी जड़ों पर विश्वास रखो, यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत होगी।”

पहेली:
ऐसा एक अजब खजाना, जिसका मालिक बड़ा स्याना, 
दोनों हाथों से लुटाता, फिर भी दौलत बढती जाये !! 
बताओ क्या ?

कहानी: सुदामा की मित्रता
यह कहानी भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त सुदामा की है, जो अपनी सच्ची मित्रता और सरलता के लिए प्रसिद्ध थे। सुदामा एक ब्राह्मण थे, जो बहुत ही गरीब थे, लेकिन उनका दिल बहुत बड़ा था। वे भगवान श्री कृष्ण के बचपन के मित्र थे, और कृष्ण के साथ बिताए गए अपने पुराने दिनों को हमेशा याद करते थे। सुदामा ने जीवन में कभी भी धन और सुख की चाह नहीं रखी थी। उनका जीवन परमात्मा की भक्ति और अपने मित्र कृष्ण की सेवा में समर्पित था।

एक दिन, सुदामा की पत्नी ने उनसे कहा, “स्वामी, हमारे घर में बहुत अभाव है, हमारे पास खाने के लिए भी नहीं है। आप श्री कृष्ण के पास जाइए, और उनसे कुछ आशीर्वाद लेकर आइए।” सुदामा का दिल कृष्ण के प्रति अपार श्रद्धा से भरा हुआ था, लेकिन वे यह समझ नहीं पा रहे थे कि वे अपने मित्र से मदद कैसे मांग सकते हैं। उन्होंने सोचा, “भगवान कृष्ण तो स्वयं भगवान हैं, मुझे उनसे कोई मदद नहीं लेनी चाहिए, लेकिन मेरी पत्नी के कहने पर मुझे कृष्ण से मिलने जाना चाहिए।”

सुदामा ने अपनी पत्नी से कुछ चिउड़े लेकर झोले में डाल लिए, और श्री कृष्ण के पास जाने का निश्चय किया। उन्होंने सोचा कि वे कृष्ण से मिलने जाएंगे, लेकिन बिना किसी बहाने के, क्योंकि भगवान के पास जो कुछ भी है, वह सच्चा प्रेम है।

जब सुदामा श्री कृष्ण के महल पहुंचे, तो कृष्ण ने उन्हें तुरंत पहचान लिया। कृष्ण ने कहा, “आओ सुदामा, तुम मेरे पुराने मित्र हो, तुमसे मिलने का सौभाग्य मुझे बहुत दिनों बाद प्राप्त हुआ है।” सुदामा को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ कि कृष्ण ने उन्हें इतने प्यार से देखा। कृष्ण ने उनके हाथों में चिउड़े देखे और कहा, “सुदामा, यह क्या है? तुम मेरे पास कुछ भिक्षाटन लेकर आए हो?” सुदामा ने थोड़ा संकोच करते हुए कहा, “भगवान, यह मेरी पत्नी ने मुझे आपके लिए भेजा है। मैं केवल आपको सम्मान देने आया हूँ।”

कृष्ण ने अपने भक्त सुदामा की ममता और सरलता को देखा और तुरंत उनके जीवन में एक बड़ा बदलाव कर दिया। कृष्ण ने कहा, “सुदामा, तुम मेरे प्रिय मित्र हो, तुम्हारी भक्ति और श्रद्धा के कारण मैं तुम्हारा जीवन सुखी बनाऊँगा।“ कृष्ण ने तुरंत सुदामा के घर को धन और सुख से भर दिया। सुदामा को समझ में आ गया कि सच्ची मित्रता और भगवान का सच्चा प्रेम कभी भी हमारे जीवन में असंभव नहीं होता।

शिक्षा
यह कहानी हमें यह सिखाती है कि सच्ची मित्रता और प्रेम किसी भी भौतिक चीज़ से ऊपर होते हैं। भगवान श्री कृष्ण ने हमें यह समझाया कि जब हम अपनी भक्ति और मित्रता को सच्चे दिल से प्रस्तुत करते हैं, तो भगवान हमारी मदद करते हैं और हमारे जीवन में सुख और समृद्धि लाते हैं। सुदामा की सरलता और भगवान के प्रति उनकी निष्ठा ने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चे दिल से की गई भक्ति और मित्रता कभी भी व्यर्थ नहीं जाती।

पहेली का उत्तर : ज्ञान
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प्रार्थना:
मेरे लिए श्री कृष्ण ही शरण है। एकमात्र कृष्ण ही शरण है। जहां वह त्रिगुणमयी माया और जन्म मृत्यु नहीं है तथा योगी लोग समाधि में जिस आनंदमय का यही दर्शन करते हैं।
जिनकी प्राप्ति के लिए विद्वान लोग संसार में अनेक धर्माचरण करते हैं और जिन्होंने सभी आपत्तियों से महात्माओं का उद्धार किया। 
जो भगवान में सद्बुद्धि रखने वालों के हृदय का अज्ञानांधकार नष्ट कर देते हैं और भगवत भक्तजन गुरु चरणों की सेवा करके जिनका सदा भजन करते हैं।
असुरों के विनाश के लिए देवताओं ने जिनका सदा आदर किया है और जो अनेक विषय रूपी पत्रों वाले इस संसारवृक्ष को धारण किए हुए हैं।
जिनको प्राप्त करके भगवद्भक्त फिर आवागमन के चक्र में नहीं फंसते उन्हीं की पापनाशक स्मृति कृष्णलाल द्विज के हृदय में बनी रहे।

मंत्र:
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। 
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।

अर्थः हे भगवान गणेश! आप विशालकाय और सूर्य के समान तेजस्वी हैं। हमारे सभी कार्य बिना विघ्न के पूरे करें।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! नदी की तरह बहो, जो हर रुकावट के बावजूद अपना रास्ता ढूंढ़ ही लेती है। नदी का पानी कभी भी रुका नहीं, वह अपना रास्ता खोज लेता है। तुम्हें भी नदी की तरह जीवन में आने वाली हर रुकावट को पार करना है। जीवन में कई बार ऐसा समय आएगा जब चीजें योजना के अनुसार नहीं होंगी, लेकिन तुम अपनी सकारात्मकता और मेहनत से नए रास्ते बना सकोगे। नदी की तरह अपनी मंजिल तक पहुंचने के लिए निरंतर प्रयास करो।”

पहेली:
पूंछ कटे सीता, सिर कटे तो मित्र। 
मध्य कटे तो खोपड़ी, पहेली बड़ी विचित्र।

कहानी: महात्मा बुद्ध का त्याग
महात्मा बुद्ध का जीवन एक अद्वितीय और प्रेरणादायक यात्रा है। वे दुनिया के सबसे महान शिक्षक और संत माने जाते हैं, जिन्होंने मानवता को शांति, प्रेम और अहिंसा का मार्ग दिखाया। उनका जीवन सच्चाई की खोज, भौतिक संसार के मोह से मुक्त होने और आत्मज्ञान प्राप्त करने की प्रेरणा देता है। बुद्ध के त्याग की कहानी न केवल उनके जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना है, बल्कि यह हमें अपने जीवन में तृष्णा और असंतोष से मुक्त होने की प्रेरणा भी देती है।

सिद्धार्थ गौतम, जिन्हें बाद में बुद्ध के नाम से जाना गया, एक राजकुमार के रूप में जन्मे थे। उनके पिता राजा शुद्धोधन सिद्धार्थ को एक आदर्श शाही जीवन देना चाहते थे। सिद्धार्थ का जीवन महल की चार दीवारों के भीतर था जहां उन्हें कोई दुख, दर्द या तकलीफ दिखाई नहीं देती थी। उनका हर दिन विलासिता और आराम में बीतता था, और वे बहुत खुश थे। लेकिन फिर भी, उन्हें किसी गहरी शांति की तलाश थी।

एक दिन, सिद्धार्थ ने महल से बाहर जाने का निश्चय किया। उन्होंने शहर के चारों ओर यात्रा की और वहां जो उन्होंने देखा, उससे उनका मन बहुत प्रभावित हुआ। उन्हें वृद्ध, रोगी और मरे हुए लोग दिखाई दिए। वे अत्यंत चकित हुए कि जीवन का यह पक्ष भी है, और यह सोचकर उन्हें गहरा दुःख हुआ कि वे इन सब चीजों से अपरिचित थे।

सिद्धार्थ ने सोचा, “क्या यही जीवन है ? क्या हमें हमेशा इस दुख और पीड़ा का सामना करना पड़ेगा?” यह प्रश्न उनके मन में गहराई से बैठ गया।

अगली बार, सिद्धार्थ ने एक सन्यासी को देखा, जो मानसिक शांति और आत्मज्ञान की ओर अग्रसर था।

उसे देखकर सिद्धार्थ ने यह महसूस किया कि शांति और सत्य के मार्ग पर चलने से ही जीवन का असली उद्देश्य पाया जा सकता है। उसी दिन से उन्होंने महल और सभी भौतिक सुखों का त्याग करने का निर्णय लिया। उन्होंने अपना परिवार, महल और राजसी सुख सब कुछ छोड़ दिया और एक साधू के भेष में जंगल की ओर चल पड़े। सिद्धार्थ का यह त्याग सिर्फ भौतिक वस्तुओं का नहीं था, बल्कि यह आत्मा की वास्तविकता और शांति की खोज के लिए था। वे अपने भीतर की गहरी शांति को प्राप्त करने के लिए कठिन साधना करने लगे। उन्होंने कई वर्षों तक कठिन तपस्या की, खाना-पीना छोड़ दिया और खुद को संन्यासियों की तरह कठोर अनुशासन में रखा। लेकिन फिर भी उन्हें सच्ची शांति का अनुभव नहीं हुआ।

एक दिन, सिद्धार्थ ने यह महसूस किया कि उन्होंने जो रास्ता चुना था, वह शायद सही नहीं था। उन्हें समझ में आया कि जीवन में बहुत अधिक उपवास और कठोर तपस्या से शांति और ज्ञान नहीं मिल सकते। इसके बजाय, उन्होंने 'मध्यम मार्ग' को अपनाने का निर्णय लिया, यानी न तो अत्यधिक भोग, न ही अत्यधिक तपस्या बल्कि जीवन के सभी पहलुओं का संतुलन बनाए रखना। 

इसके बाद, सिद्धार्थ ने बोधगया में एक पीपल के पेड़ के नीचे ध्यान लगाना शुरू किया। उन्होंने यह ठान लिया था कि जब तक वे सच्चे ज्ञान को प्राप्त नहीं कर लेते, तब तक वे वहाँ से नहीं उठेंगे। कई दिनों और रातों तक उन्होंने ध्यान किया, और अंततः एक रात, जब वे पूरी तरह से ध्यान में मग्न थे, उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। उन्होंने जाना कि दुख का कारण हमारी इच्छाएँ और तृष्णा होती हैं, और इन इच्छाओं से मुक्ति पाने के लिए हमें आत्म-ज्ञान की आवश्यकता है।

यह ज्ञान ही वह बोध (सच्चाई) था जिसे सिद्धार्थ ने प्राप्त किया। उन्होंने खुद को बुद्ध (ज्ञानवंत) के रूप में पहचाना, और उन्होंने यह तय किया कि वे अब दुनिया के सामने सत्य और शांति का संदेश फैलाएंगे। उन्होंने जीवन के चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग का उपदेश दिया जो आज भी मानवता के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

शिक्षा 
महात्मा बुद्ध का त्याग हमें यह सिखाता है कि जीवन के असली सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मज्ञान, मानसिक शांति और संतुलित जीवन में हैं। बुद्ध ने यह दिखाया कि सच्ची शांति की प्राप्ति के लिए हमें भौतिक सुखों का त्याग करना चाहिए और अपने भीतर की गहरी शांति को महसूस करना चाहिए। उनके जीवन का यह त्याग यह संदेश देता है कि हम जब अपनी इच्छाओं और तृष्णाओं से मुक्त होते हैं, तभी हम वास्तविक सुख और शांति पा सकते हैं। बुद्ध का जीवन यह भी सिखाता है कि आत्मज्ञान की प्राप्ति के लिए हमें सच्चाई की खोज में पूरी निष्ठा और समर्पण से काम करना चाहिए।

पहेली का उत्तर : सियार
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सप्तश्लोकी गीता
श्री भगवान ने कहा— अनुभव, प्रेमाभक्ति और साधनों से युक्त अत्यंत गोपनीय अपने स्वरूप का ज्ञान मैं तुम्हें कहता हूं, तुम उसे ग्रहण करो। 
मेरा जितना विस्तार है, मेरा जो लक्षण है, मेरे जितने और जैसे रूप, गुण और लीलाएं हैं—मेरी कृपा से तुम उनका तत्व ठीक-ठीक वैसा ही अनुभव करो। 
सृष्टि के पूर्व केवल मैं-ही-मैं था। मेरे अतिरिक्त न स्थूल था न सूक्ष्म और न तो दोनों का कारण अज्ञान। जहां यह सृष्टि नहीं है, वहां मैं-ही-मैं हूं और इस सृष्टि के रूप में जो कुछ प्रतीत हो रहा है, वह भी मैं ही हूं और जो कुछ बचा रहेगा, वह भी मैं ही हूं। 
वास्तव में न होने पर भी जो कुछ अनिर्वचनीय वस्तु मेरे अतिरिक्त मुझ परमात्मा में दो चंद्रमाओं की तरह मिथ्या ही प्रतीत हो रही है, अथवा विद्यमान होने पर भी आकाश-मंडल के नक्षत्रो में राहु की भांति जो मेरी प्रतीति नहीं होती, इसे मेरी माया समझना चाहिए। 
जैसे प्राणियों के पंचभूतरचित छोटे-बड़े शरीरों में आकाशादि पंचमहाभूत उन शरीरों के कार्यरूप से निर्मित होने के कारण प्रवेश करते भी है और पहले से ही उन स्थानों और रूपों में कारणरूप से विद्यमान रहने के कारण प्रवेश नहीं भी करते, वैसे ही उन प्राणियों के शरीर की दृष्टि से मैं उनमें आत्मा के रूप से प्रवेश किए हुए हूं और आत्म दृष्टि से अपने अतिरिक्त और कोई वस्तु न होने के कारण उन में प्रविष्ट नहीं भी हूं। 
यह ब्रह्म नहीं, यह ब्रह्म नहीं— इस प्रकार निषेध की पद्धति से और यह ब्रह्म है, यह ब्रह्म है— इस अन्वय की पद्धति से यही सिद्ध होता है कि सर्वातीत एवं सर्वस्वरूप भगवान ही सर्वदा और सर्वत्र स्थित है, वही वास्तविक तत्व है। जो आत्मा अथवा परमात्मा का तत्व जानना चाहते हैं, उन्हें केवल इतना ही जानने की आवश्यकता है।
ब्रह्माजी! तुम अविचल समाधि के द्वारा मेरे इस सिद्धांत में पूर्ण निष्ठा कर लो। इससे तुम्हें कल्प-कल्प में विविध प्रकार की सृष्टि रचना करते रहने पर भी कभी मोह नहीं होगा।

मंत्र:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। 
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

अर्थः हे भगवान शिव! आप हमें रोगों और मृत्यु के भय से मुक्त करें। हमें दीर्घायु और आरोग्य का वरदान दें।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हारा जीवन पहाड़ों जैसा होना चाहिए। स्थिर, दृढ़ और मजबूत। जब भी तूफान आता है, तो पहाड़ अपनी जगह पर खड़े रहते हैं, वे डिगते नहीं। तुम्हें भी अपनी समस्याओं और चुनौतियों के बीच स्थिर रहना है। तुम जितना मजबूत बनोगे, उतनी ही तुम्हें जीवन में सफलता मिलेगी। पहाड़ों की तरह तुम्हें कभी भी हल्के में नहीं लिया जा सकता, तुम्हारी दृढ़ता ही तुम्हारी ताकत होगी।”

पहेली:
काँटों से निकले, फूलों मे उलझे 
नाम बतलाओ,समस्या सुलझे

कहानी: आचार्य चाणक्य की नीति
चाणक्य, जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है, भारतीय इतिहास के सबसे महान रणनीतिकार और नीति निर्माता थे। उन्होंने मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य को अपनी रणनीतिक सलाह से सम्राट बनाया और भारतीय राजनीति और शासन व्यवस्था को एक नया रूप दिया। उनकी नीतियाँ न केवल राजनीति में बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में उपयोगी साबित होती हैं। चाणक्य की नीति और उनकी शिक्षाएं आज भी दुनिया भर में प्रासंगिक हैं, क्योंकि उन्होंने जो ज्ञान दिया, वह जीवन के मूल्यों और सिद्धांतों पर आधारित था।

चाणक्य की नीति को समझने से पहले हमें यह जानना होगा कि उन्होंने अपने समय में एक अत्यधिक कठिन राजनीतिक वातावरण में काम किया था। मौर्य साम्राज्य के निर्माण में उनका योगदान असाधारण था। उनका जीवन और उनकी नीतियाँ हमें यह सिखाती हैं कि धैर्य, समझदारी और सही मार्गदर्शन से हम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हैं। उनके द्वारा दी गई नीतियाँ आज भी प्रेरणा का स्रोत हैं, और ये जीवन में सफलता पाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

चाणक्य ने “अर्थशास्त्र” नामक एक महान ग्रंथ लिखा, जिसमें उन्होंने राजनीति, समाज, राज्य निर्माण और व्यक्तित्व विकास के बारे में अपनी नीतियाँ दी हैं।

उनका मानना था कि मनुष्य का जीवन नियमों और विचारों के तहत चलना चाहिए, ताकि समाज में शांति और विकास हो सके। उनकी नीतियाँ न केवल उनके समय के लिए, बल्कि आज के समय में भी अत्यंत उपयोगी हैं।

चाणक्य ने जीवन के विभिन्न पहलुओं पर अपनी नीति दी थी। उनका मानना था कि व्यक्ति को कभी भी अपने कर्तव्यों और लक्ष्यों से पीछे नहीं हटना चाहिए, और हमेशा अपने आचार और विचारों में निष्ठा और ईमानदारी रखनी चाहिए। उनके सिद्धांतों में संयम, साहस, और समझदारी की शिक्षा दी गई है। आइए हम चाणक्य की कुछ महत्वपूर्ण नीतियों पर प्रकाश डालें:

चाणक्य की नीतियों का प्रमुख सिद्धांत यह था कि आत्म-निर्भरता और संघर्षशीलता से ही व्यक्ति सफलता प्राप्त कर सकता है। चाणक्य का कहना था, “जो व्यक्ति अपने कार्य में पूरी निष्ठा से लगा रहता है, वह किसी भी कठिनाई को पार कर सकता है।” उन्होंने यह भी कहा, “मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु उसका खुद का आलस्य और नकारात्मकता होती है। आचार्य चाणक्य की नीति का सबसे बड़ा सिद्धांत यही था कि अगर हम ईमानदारी और कड़ी मेहनत से काम करते हैं, तो हमें किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मिलती।

चाणक्य का विश्वास था कि एक व्यक्ति का व्यक्तित्व ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति होती है। उनका कहना था कि “जो व्यक्ति अपने स्वभाव और विचारों में संयम रखता है, वही समाज में सम्मान पाता है।”

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि एक अच्छा शासक, एक अच्छा नेता, या एक अच्छा व्यक्ति हमेशा अपनी जिम्मेदारियों को समझता है और उनका पालन करता है। चाणक्य ने कभी भी इस बात को नकारा नहीं कि हर व्यक्ति की सफलता उसके भीतर की इच्छाशक्ति और प्रयासों पर निर्भर करती है।

चाणक्य की नीति में एक और महत्वपूर्ण बात यह थी कि व्यक्ति को अपने मित्र और शत्रु की पहचान होनी चाहिए। उन्होंने यह कहा था कि “जो व्यक्ति अपने शत्रु को पहचानता है, वही अपने मित्र को सही तरीके से समझ सकता है।” यह नीति न केवल राजनीति में, बल्कि हर क्षेत्र में लागू होती है। हमें यह समझने की आवश्यकता है कि किसे हम मित्र मान सकते हैं और किसे शत्रु। चाणक्य ने कहा, “एक बुद्धिमान व्यक्ति कभी भी बिना समझे किसी के साथ मित्रता या शत्रुता नहीं करता।”

चाणक्य ने जीवन में सफलता पाने के लिए बुद्धिमानी, रणनीति, और निर्णय क्षमता पर जोर दिया। उन्होंने यह सिखाया कि सही समय पर सही निर्णय लेना जीवन की सबसे महत्वपूर्ण कला है। उनकी नीति के अनुसार, “यदि व्यक्ति समय का सही उपयोग करता है, तो उसे कोई भी चुनौती नहीं हरा सकती।” चाणक्य ने हमेशा यह कहा कि जो लोग परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की क्षमता रखते हैं, वे जीवन में हर जगह सफलता प्राप्त करते हैं।

चाणक्य की नीति जीवन के हर पहलू में सफलता पाने के लिए मार्गदर्शन देती है। उनके अनुसार, व्यक्ति को हमेशा अपने कार्यों और नीतियों में ईमानदार, समझदार और विवेकी होना चाहिए। उन्होंने राजनीति, युद्ध, समाज, और व्यक्तिगत जीवन में सफलता के लिए सिद्धांतों को स्पष्ट रूप से रखा।

शिक्षा
चाणक्य की नीति से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सफलता किसी भी क्षेत्र में पाने के लिए केवल आंतरिक बल, ज्ञान और रणनीति की आवश्यकता होती है। उनके द्वारा दिए गए सिद्धांतों को अपनाकर हम अपनी कठिनाइयों का सामना कर सकते हैं और अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। चाणक्य का जीवन और उनकी नीतियाँ यह सिखाती हैं कि कभी भी परिस्थितियों से हार मानने के बजाय हमें अपनी मेहनत, ईमानदारी, और आत्मविश्वास पर भरोसा रखना चाहिए। “जो व्यक्ति अपने कर्तव्यों से नहीं भागता, वह जीवन में कभी असफल नहीं होता।” यही चाणक्य की नीति का सार है।

पहेली का उत्तर : तितली
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