Garbha Sanskar - 17 in Hindi Women Focused by Praveen Kumrawat books and stories PDF | गर्भ संस्कार - भाग 17 - एक्टिविटीज–16

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गर्भ संस्कार - भाग 17 - एक्टिविटीज–16

प्रार्थना:
प्रह्लाद, नारद, पाराशर, पुंडरीक, व्यास, अंबरीश, शूक, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रूक्मांगद, अर्जुन, वशिष्ठ और विभीषण आदि इन परम पवित्र वैष्णवो का मै स्मरण करता हूं।
वाल्मीकि, सनक, सनंदन, तरु, व्यास, वशिष्ठ, भृगु, जाबाली, जमदग्नि, कच्छ, जनक, गर्ग, अंगिरा, गौतम, मांधाता, रितुपर्ण पृथु, सगर, धन्यवाद देने योग्य दिलीप और नल, पुण्यात्मा युधिष्ठिर, ययाति और नहुष ये सब हमारा मंगल करें।

मंत्र का अर्थ: देवता एक-दूसरे से द्वेष नहीं करते, बल्कि एक दूसरे के साथ मिलकर आनंद और यश की प्राप्ति करते हैं। इस श्लोक से हमें यह सिखने को मिलता है कि एकता और भाईचारे से हम जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं और एक दूसरे की मदद से यश और समृद्धि प्राप्त कर सकते हैं।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे! तुम्हारा आत्मविश्वास तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है। जब तुम खुद पर विश्वास करते हो, तो दुनिया भी तुम्हारे कदमों में होती है। आत्मविश्वास से तुम किसी भी चुनौती का सामना कर सकते हो। जब तुम आत्मविश्वास के साथ अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हो, तो हर रुकावट और कठिनाई छोटी लगने लगती है। मैं चाहती हूं कि तुम हमेशा अपने आत्मविश्वास को बढ़ाओ, क्योंकि यही तुम्हारी असली शक्ति होगी।”

पहेली:
न कभी आता है, 
न कभी यह जाता है, 
इसके भरोसे जो रहे, 
हमेशा पछताता है।

कहानी: पत्नी का समर्पण
एक गांव में रामू नाम का एक किसान अपनी पत्नी सरिता के साथ रहता था। रामू बहुत मेहनती था, लेकिन उसकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी। खेती से बहुत कम आमदनी होती थी, जिससे घर का खर्च चलाना मुश्किल था। सरिता, जो एक समर्पित और समझदार पत्नी थी, हर स्थिति में रामू का साथ देती थी।

एक साल, बारिश समय पर नहीं हुई और रामू की फसल पूरी तरह से खराब हो गई। वह बहुत परेशान हो गया। उसने सरिता से कहा, “अब हमारा क्या होगा? घर चलाने के लिए पैसे भी नहीं बचे हैं। मैं तुम्हें और बच्चों को भूखा नहीं देख सकता।”

सरिता ने रामू को सांत्वना दी और कहा, “चिंता मत करो। हम मिलकर इस समस्या का हल निकालेंगे। हमें ईश्वर पर विश्वास रखना चाहिए और मेहनत करनी चाहिए।”

सरिता ने गांव की महिलाओं के लिए सिलाई और बुनाई का काम शुरू किया। उसने अपने हुनर से थोड़ा-थोड़ा पैसा कमाना शुरू किया। वहीं, रामू ने गांव के बाजार में मजदूरी का काम करना शुरू किया। दोनों ने मिलकर कठिन समय का सामना किया।

कुछ महीनों बाद, जब हालात थोड़े सुधरे, तो रामू ने अपनी पत्नी से कहा, “तुमने मेरे मुश्किल समय में मेरा साथ दिया। तुम्हारे बिना मैं यह सब नहीं कर पाता। तुम्हारा समर्पण और मेहनत ही हमारी सबसे बड़ी ताकत है।”

सरिता ने मुस्कुराते हुए कहा, “पति-पत्नी का रिश्ता साथ निभाने का होता है। मुश्किल समय में अगर हम एक-दूसरे का साथ दें, तो कोई भी परेशानी हमें तोड़ नहीं सकती।”

आखिरकार, अगला साल उनके लिए खुशियों भरा था। बारिश समय पर हुई, और रामू की फसल शानदार हुई। उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को फिर से मजबूत कर लिया। गांव के लोग सरिता और रामू की प्रशंसा करने लगे। 

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास, सहयोग और समर्पण पर आधारित होना चाहिए। कठिन समय में एक-दूसरे का साथ देकर हर मुश्किल को आसान बनाया जा सकता है।

पहेली का उत्तर : कल
========================= 132

प्रार्थना:
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता
या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।
या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥1॥

भावार्थ– जो विद्या की देवी भगवती सरस्वती कुन्द के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की है और जो श्वेत वस्त्र धारण करती है, जिनके हाथ में वीणा-दण्ड शोभायमान है, जिन्होंने श्वेत कमलों पर आसन ग्रहण किया है तथा ब्रह्मा विष्णु एवं शंकर आदि देवताओं द्वारा जो सदा पूजित हैं, वही संपूर्ण जड़ता और अज्ञान को दूर कर देने वाली सरस्वती हमारी रक्षा करें ॥1॥

ॐ सहनाववतु सहनौ भुनक्तु। सहवीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ 
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

भावार्थ– ईश्वर हम दोनों (गुरू एवं शिष्य) की रक्षा करें! हम दोनों का पोषण करें! हम दोनों पूर्ण शक्ति के साथ कार्यरत रहें! हम तेजस्वी विद्या को प्राप्त करें! हम कभी आपस में द्वेष न करें ! सर्वत्र शांति रहे!

ॐ असतो मा सद्गमय।।
तमसो मा ज्योतिर्गमय।।
मृत्योर्मामृतं गमय।।
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।।

भावार्थ– हे ईश्वर! हमको असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता के भाव की ओर ले चलो।

मंत्र का अर्थः यह ज्ञान मैंने तुम्हें गूढ़ और अत्यंत रहस्यमय तरीके से बताया है। अब इस ज्ञान को सोच-समझकर ग्रहण करो और जैसे चाहो वैसे कार्य करो। इस श्लोक में भगवान श्री कृष्ण हमें यह प्रेरणा देते हैं कि ज्ञान को ग्रहण करके जीवन में अपनी राह चुनें और उसे पूरे मन से पालन करें।

गर्भ संवाद:
“मेरे बच्चे, हर नया दिन एक नई शुरुआत है। जब तुम सुबह उठते हो, तो यह तुम्हारे लिए नए अवसर और नई संभावनाओं के द्वार खोलता है। हर दिन को नए उत्साह और उम्मीद के साथ जीओ, क्योंकि हर दिन तुम्हारे जीवन को एक नई दिशा दे सकता है। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन को एक नया अवसर समझो और उसका पूरा लाभ उठाओ। जीवन में सफलता वही पाता है जो हर दिन को महत्व देता है।”

पहेली:
गोल-गोल चेहरा, 
पेट से रिश्ता गहरा।

कहानी: छोटे कदम, बड़ी मंजिल
सिया नाम की एक लड़की छोटे से गांव में रहती थी। सिया का सपना था कि वह एक दिन मैराथन दौड़ में भाग ले और जीत हासिल करे। लेकिन उसका सपना कठिन था क्योंकि गांव में ऐसी सुविधाएं नहीं थीं, जहां वह अभ्यास कर सके।

सिया के माता-पिता ने उसके सपने का समर्थन किया, लेकिन गांव के लोग उसकी महत्वाकांक्षा को व्यर्थ समझते थे। वे कहते, “सिया, दौड़ने से क्या हासिल होगा? यह सिर्फ समय की बर्बादी है। अपने घर और खेत का काम संभालो।”

लेकिन सिया ने हार मानने से इंकार कर दिया। उसने हर दिन सुबह जल्दी उठकर दौड़ने का अभ्यास शुरू किया। वह खेतों और गांव की कच्ची सड़कों पर दौड़ती थी। कभी-कभी उसके पैर छिल जाते, लेकिन उसने अपने सपने को छोड़ने की नहीं सोची।

एक दिन, गांव के पास के शहर में एक छोटी दौड़ का आयोजन हुआ। सिया ने इसमें भाग लेने का फैसला किया। हालांकि, दौड़ में उसे अंतिम स्थान मिला, लेकिन उसने हार नहीं मानी। उसने अपने आप से कहा, “यह केवल एक शुरुआत है। हर जीत छोटे-छोटे कदमों से शुरू होती है।”

इसके बाद, सिया ने अपने अभ्यास को और तेज कर दिया। उसने अपनी तकनीक में सुधार किया और हर दिन खुद को बेहतर बनाने का प्रयास किया। अगले साल, उसने उसी शहर में फिर से दौड़ में भाग लिया और इस बार तीसरा स्थान हासिल किया।

सिया की सफलता ने गांव के लोगों को उसकी ओर आकर्षित किया। वे अब उसकी मेहनत को पहचानने लगे थे। सिया ने यह साबित कर दिया कि छोटे-छोटे कदम भी बड़ी मंजिल तक पहुंचा सकते हैं।

आखिरकार, कुछ सालों बाद, सिया ने राष्ट्रीय स्तर की मैराथन में भाग लिया और जीत हासिल की। उसने अपने गांव का नाम रोशन किया और सभी को यह सिखाया कि सपनों को पूरा करने के लिए छोटे-छोटे कदमों को भी महत्व देना चाहिए।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हर बड़ी मंजिल तक पहुंचने के लिए छोटे कदम उठाने होते हैं। धैर्य और निरंतर प्रयास से हर सपना पूरा किया जा सकता है।

पहेली का उत्तर : रोटी
======================== 133

प्रार्थना:
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना, 
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना। 
हमारे ध्यान में आओ, प्रभु आँखों में बस जाओ, 
अँधेरे दिल में आकर के परम ज्योति जगा देना।
बहा दो प्रेम की गंगा, दिलों में प्रेम का सागर, 
हमे आपस में मिलजुल के प्रभु रहना सीखा देना। 
हमारा कर्म हो सेवा, हमारा धर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा, वो सेवक चर बना देना। 
वतन के वास्ते जीना, वतन के वास्ते मरना, 
वतन पे जा फ़िदा करना, प्रभु हमको सीखा देना।
दया कर दान विद्या का हमे परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में शुद्धता देना। 

मंत्र:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । 
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

अर्थः सभी धर्मों को त्यागकर मेरे एकमात्र शरण में आओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूंगा, चिंता मत करो।

गर्भ संवाद: 
— मेरे प्यारे शिशु, मेरे राज दुलार, मैं तुम्हारी माँ हूँ.......माँ !

— मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, तुम मेरे गर्भ में पूर्ण रूप से सुरक्षित हो, तुम हर क्षण पूर्ण रूप से विकसित हो रहे हो।

— तुम मेरे हर भाव को समझ सकते हो क्योंकि तुम पूर्ण आत्मा हो।

— तुम परमात्मा की तरफ से मेरे लिए एक सुन्दरतम तोहफा हो, तुम शुभ संस्कारी आत्मा हो, तुम्हारे रूप में मुझे परमात्मा की दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, परमात्मा ने तुम्हें सभी विलक्षण गुणों से परिपूर्ण करके ही भेजा है, परमात्मा की दिव्य संतान के रूप में तुम दिव्य कार्य करने के लिए ही आए हो। मेरे बच्चे! तुम
ईश्वर का परम प्रकाश रूप हो, परमात्मा की अनंत शक्ति तुम्हारे अंदर विद्यमान है, ईश्वर का तेज तुम्हारे माथे पर चमक रहा है, परमात्मा के प्रेम की चमक तुम्हारी आँखों में दिखाई देती है, तुम ईश्वर के प्रेम का साक्षात भण्डार हो, तुम परमात्मा के एक महान उद्देश्य को लेकर इस संसार में आ रहे हो, परमात्मा ने तुम्हें इंसान रूप में इंसानियत के सभी गुणों से भरपूर किया है।

— तुम हर इंसान को परमात्मा का रूप समझते हो, और सभी के साथ प्रेम का व्यवहार करते हो, तुम जानते हो अपने जीवन के महानतम लक्ष्य को, तुम्हें इस संसार की सेवा करनी है, सभी से प्रेम करना है, सभी की सहायता करनी है, और परमात्मा ने जो विशेष लक्ष्य तुम्हें दिया है, वह तुम्हें अच्छे से याद रहेगा।

— परमात्मा की भक्ति में तुम्हारा मन बहुत लगता है, तुम प्रभु के गुणों का गायन करके बहुत खुश होते हो, तुम्हारे रोम-रोम में प्रभु का प्रेम बसा हुआ है। स्त्रियों के प्रति तुम विशेष रूप से आदर का भाव अनुभव करते हो, सभी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से देखते हो।

— तुम्हारा उद्देश्य संसार में सबको खुशियाँ बाँटना है, सब तरह से आजाद रहते हुए तुम सबको कल्याण का मार्ग दिखाने आ रहे हो, परमात्मा से प्राप्त जीवन से तुम पूर्ण रूप से संतुष्ट हो, तुम सदैव परमात्मा के साये में सुरक्षित हो।

— मानव जीवन के संघर्षो को जीतना तम्हें खूब अच्छी तरह से आता है, जीवन के प्रत्येक कार्य को करने का तुम्हारा तरीका बहुत प्यारा है, जीवन की हर परेशानी का हल ढूँढने में तुम सक्षम हो, तुम हमेशा अपने जीवन के परम लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ते रहोगे।

— मेरी तरह तुम्हारे पिता भी तुम्हें देखने के लिए आतुर हैं, मेरा और तुम्हारे पिता का आशीष सदैव तुम्हारे साथ है।

— यह पृथ्वी हमेशा से प्रेम करने वाले अच्छे लोगों से भरी हुई है, यह सृष्टि परमात्मा की अनंत सुंदरता से भरी हुई है, यहाँ के सभी सुख तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं, गर्भावस्था का यह सफर तुम्हें परमात्मा के सभी दैविक संस्कारों से परिपूर्ण कर देगा।

—घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है।

पहेली:
मुझे सुनाती सबकी नानी, 
प्रथम कटे तो होती हानि, 
बच्चे भूलते खाना, पानी, 
एक था राजा एक थी रानी। 

कहानी: मैं अपनी किस्मत का निर्माता हूँ 
एक शहर में रोहित नाम का एक युवा रहता था। वह हमेशा अपनी किस्मत को कोसता था और कहता था, “मेरी जिंदगी इतनी कठिन क्यों है? मेरी किस्मत ही खराब है।”

रोहित के पास एक साधारण नौकरी थी और वह हमेशा दूसरों की सफलता को देखकर ईर्ष्या करता। उसे लगता कि दूसरों को उनकी किस्मत की वजह से सफलता मिलती है।

एक दिन, रोहित के दादाजी ने उससे कहा “बेटा, किस्मत खुद नहीं बनती, बल्कि हम अपनी मेहनत और काम से इसे बनाते हैं। अगर तुम अपनी मेहनत पर ध्यान दोगे, तो तुम्हारी किस्मत भी बदल जाएगी।”

रोहित ने दादाजी की बात को गंभीरता से लिया। उसने अपनी आदतों को बदलने का फैसला किया। पहले वह अपनी नौकरी को साधारण समझकर काम में लापरवाही करता था, लेकिन अब उसने हर दिन पूरी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया।

उसने अपनी योग्यता को बढ़ाने के लिए नए कौशल सीखने शुरू किए। वह रात में देर तक पढ़ाई करता और खुद को बेहतर बनाने का प्रयास करता। धीरे-धीरे उसकी मेहनत रंग लाने लगी।

कुछ महीनों बाद, रोहित को एक बड़ी कंपनी से नौकरी का ऑफर मिला। वह अब एक अच्छे पद पर काम कर रहा था और अपनी किस्मत को खुद बदलते देख रहा था।

एक दिन, जब उसने अपने दादाजी से मुलाकात की, तो उसने कहा “दादाजी, आपने सही कहा था। किस्मत खुद नहीं बदलती, इसे मेहनत और लगन से बदलना पड़ता है। आज मैं जो भी हूं, वह आपकी सीख की वजह से हूं।”

दादाजी ने मुस्कुराते हुए कहा, “याद रखो, बेटा, हर इंसान अपनी किस्मत का निर्माता होता है। मेहनत और सही दृष्टिकोण से असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है।”

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि किस्मत का निर्माण हमारी मेहनत और सकारात्मक सोच से होता है। अगर हम अपनी क्षमताओं पर विश्वास करें और सही दिशा में काम करें, तो हम अपनी किस्मत को बदल सकते हैं।

पहेली का उत्तर : कहानी
==========================134

प्रार्थना:
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। 
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

भावार्थ: हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।

मंत्र:
शान्ताकारं भुजंगशयनं पद्मनाभं सुरेशं 
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । 
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं। 
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥

अर्थ: मैं ऐसे सर्वव्यापी भगवान विष्णु को प्रणाम करता हूं जिनका स्वरूप शांत है। जो शेषनाग पर विश्राम करते हैं, जिनकी नाभि पर कमल खिला है और जो सभी देवताओं के स्वामी हैं।
जो ब्रह्मांड को धारण करते हैं, जो आकाश की तरह अनंत और असीम हैं, जिनका रंग नीला है और जिनका शरीर अत्यंत सुंदर है।
जो धन की देवी लक्ष्मी के पति हैं और जिनकी आंखें कमल के समान हैं। जो ध्यान के जरिए योगियों के लिए उपलब्ध हैं।
ऐसे श्रीहरि विष्णु को नमस्कार है जो सांसारिक भय को दूर करते हैं और सभी लोगों के स्वामी हैं।

गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूँ …… माँ!

— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हें परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।

— प्रेम स्वरूप परमात्मा का अंश होने के कारण तुम्हारा हृदय भी प्रेम से भरपूर है, तुम्हारी हर अदा में परमात्मा का प्रेम झलकता है।

— तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण मानवमात्र के प्रति समभाव है।

— तुम्हारा हृदय सबके लिए दया और करुणा से भरपूर रहता है।

— क्षमाशीलता के गुण के कारण सभी तुम्हारा सम्मान करते हैं, जिससे तुम्हारा स्वभाव और विनम्र हो जाता है।

— नम्रता तुम्हारा विशेष गुण है।

— मेरे बच्चे। तुम्हारा प्रत्येक कार्य सेवा-भाव से परिपूर्ण होता है।

— सहनशीलता तुम्हारा स्वाभाविक गुण है।

— धैर्यपूर्वक प्रत्येक कार्य को करना तुम्हारी महानता है।

— तुम्हारा मन आंतरिक रूप से स्थिर और शांत है।

— मेरे बच्चे! तुम बल और साहस के स्वामी हो।

— तुम अनुशासन प्रिय हो।

— कृतज्ञता का गुण तुम्हारे व्यवहार की शोभा बढ़ाता है।

— तुम अपनो से बड़ों को सम्मान और छोटों को प्रेम देते हो।

— तुम भाव से बहुत भोले हो लेकिन जरूरत पड़ने पर अपनी कठोरता भी दिखाते हो।

— तुम अपनो से छोटों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो।

— तुम सत् और असत के पारखी हो।

— तुम्हारा व्यवहार चन्द्रमा के समान शीतल है।

— तुम सबसे इतना मीठा बोलते हो कि सभी तुम पर मोहित हो जाते हैं।

— तुम्हारा व्यक्तित्व परम प्रभावशाली है।

— तुम हमेशा सत्य बोलना ही पसंद करते हो।

— तुम हाजिर जवाबी हो।

— तुम्हारे मुख से निकला एक-एक शब्द मधुर और आकर्षक होता है।

— तुम मन, वचन और कर्म से पवित्र हो।

— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर मैं बहुत प्रसन्न हूँ। जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन हैं।

पहेली: 
एक ऐसा फूल बताये, 
जिसमे रंग न खुशबू पाये।

कहानी: ओणम का उल्लास
केरल के एक छोटे से गांव में, हर साल ओणम का त्योहार बड़े उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता था। यह त्योहार समृद्धि, एकता और राजा महाबली के स्वागत का प्रतीक था।

इस बार गांव के बच्चों ने फैसला किया कि वे ओणम के उत्सव को और भी खास बनाएंगे। उनमें से सबसे बड़ा बच्चा अर्जुन था, जो हर बार त्योहार की तैयारी का नेतृत्व करता था। अर्जुन ने अपने दोस्तों से कहा, “इस साल हमें ऐसा कुछ करना चाहिए, जिससे हर गांव वाले को यह त्योहार हमेशा याद रहे।”

अर्जुन और उसके दोस्तों ने पूरे गांव को सजाने का जिम्मा उठाया। उन्होंने फूलों की पंखुड़ियों से सुंदर पुकलम (फूलों की रंगोली) बनाई। महिलाओं ने पारंपरिक साड़ी पहनी और सभी ने मिलकर ओणम साद्या (भव्य दावत) तैयार की।

त्योहार के मुख्य दिन पर, राजा महाबली के स्वागत के प्रतीक के रूप में एक भव्य झांकी निकाली गई। झांकी में अर्जुन ने महाबली का किरदार निभाया और बच्चों ने पारंपरिक नृत्य प्रस्तुत किया। यह झांकी पूरे गांव में घूमी, और हर घर ने उत्साहपूर्वक इसका स्वागत किया।

लेकिन इस साल का ओणम केवल उत्सव तक सीमित नहीं रहा। अर्जुन ने अपने दोस्तों से कहा, “ओणम केवल एक त्योहार नहीं है, यह समृद्धि और दूसरों के साथ साझा करने का संदेश देता है। हमें उन लोगों की मदद करनी चाहिए, जिनके पास त्योहार मनाने के लिए साधन नहीं हैं।”

उन्होंने मिलकर गांव के गरीब परिवारों के लिए खाना और नए कपड़े जुटाए। उन परिवारों के चेहरों पर मुस्कान देखकर अर्जुन और उसके दोस्तों को सच्चा संतोष मिला।

गांव के बुजुर्गों ने बच्चों की इस पहल की बहुत सराहना की। उन्होंने कहा “ओणम का असली अर्थ तब समझ आता है, जब हम अपनी खुशी के पलों को दूसरों के साथ साझा करें। यह त्योहार केवल सजावट और दावत का नहीं, बल्कि एकता, प्रेम और समर्पण का प्रतीक है।”

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि त्योहारों का असली मतलब केवल उत्सव नहीं, बल्कि एकता और दूसरों के साथ खुशियां बांटना है। ओणम का त्योहार हमें साझा करने और सबके जीवन में खुशियां लाने की प्रेरणा देता है।

पहेली का उत्तर : अप्रैल फूल
========================= 135

प्रार्थना:
हम ईश्वर की महिमा का ध्यान करते हैं, जिन्होंने इस संसार को उत्पन्न किया है, जो पूजनीय हैं और ज्ञान के भंडार हैं, जो पापों तथा अज्ञानता को दूर करने वाले हैं वे हमें प्रकाश दिखाएँ और सत्य के मार्ग पर ले जाऐं।

श्लोक का अर्थः श्रीकृष्ण कहते है — जब जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का प्रकोप बढ़ता है, तब-तब मैं पृथ्वी पर जन्म लेता हूँ। भगवान श्री कृष्ण के इस श्लोक में यह प्रेरणा है कि अधर्म और अन्याय के खिलाफ हमेशा सत्य और धर्म की ओर चलना चाहिए। समय आने पर हमें अपने कार्यों में पूरी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु, मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ हूं…… माँ!

— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ भौतिक गुणों की याद दिला रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार हैं।

— परम तेजस्वी ईश्वर का अंश होने के कारण तुम्हारे मुख पर सूर्य के समान दिव्य तेज और ओज रहता है।

— तुम्हारे नैन-नक्श तीखे और बहुत सुन्दर है, तुम्हारा सुन्दर मुखड़ा सबको बहुत प्यारा लगता है।

— तुम्हारे चेहरे का रंग गोरा और सबका मन मोह लेने वाला है।

— तुम्हारी हर अदा सुन्दरतम ईश्वर की झलक लिए हुए है, तुम्हारा माथा चौड़ा है, तुम्हारी आँखें बड़ी है, तुम्हारी भौहें तीर के आकार की तरह बड़ी है, तुम्हारी पलकें काली और बड़ी हैं।

— तुम्हारे होंठ फूल की तरह कोमल और सुन्दर हैं, तुम्हारे चेहरे पर हर पल एक मधुर मुस्कान छाई रहती है।

— तुम्हारी बुद्धि कुशाग्र है, तुम्हारी वाणी मधुर और सम्मोहन करने वाली है।

— तुम बहुत अच्छे खिलाडी हो, तुम्हारा शरीर तंदुरुस्त और फुर्तीला है। (किसी विशेष खेल के प्रति शिशु के मन में प्रतिभा विकसित करनी हो तो यहाँ कह सकते हैं)

— तुम बहुत सुंदर दिखते हो, बड़े होने पर भी तुम्हारी सुंदरता और निखरती जाएगी।

— तुम्हारी हर अदा बहुत निराली और अनोखी है।

— घर के सभी सदस्यों का आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारे रूप में मुझे जैसे दिव्य संतान प्राप्त हो रही है, तुम्हे पाकर में बहुत प्रसन्न हूँ, जल्द ही इस सुन्दर संसार में तुम्हारा आगमन होगा। तुम्हारा स्वागत करने के लिए सभी बेचैन है।

पहेली:
आगे घेरा पीछे घेरा, 
बीच में है चैन-चकेरा, 
गाँव में भी जाती है, 
सबको मंजिल तक पहुँचाती है।

कहानी: बसंत पंचमी की वंदना
एक छोटे से गांव में बसंत पंचमी का त्योहार हर साल बड़े हर्षोल्लास से मनाया जाता था। इस त्योहार पर सरस्वती देवी की पूजा की जाती थी, और इसे विद्या, कला और संगीत का उत्सव माना जाता था।

गांव के हर बच्चे के लिए यह दिन खास था। सुबह-सुबह सभी बच्चे पीले कपड़े पहनते और माता सरस्वती की पूजा के लिए स्कूल जाते। इस साल पूजा की तैयारियां कुछ खास थीं, क्योंकि गांव के शिक्षक महेश जी ने बच्चों से कहा था, “इस बार पूजा केवल पूजा नहीं होगी। हम इसे शिक्षा का महत्व समझाने का अवसर बनाएंगे।”

पूजा के दिन, गांव के सभी लोग मंदिर में इकट्ठा हुए। बच्चों ने सरस्वती वंदना गाई और देवी की आराधना की। पूजा के बाद, महेश जी ने सभी से कहा, “सरस्वती पूजा केवल विद्या की देवी की आराधना नहीं है, बल्कि यह हमें शिक्षा के महत्व को समझने का अवसर देती है। शिक्षा हर इंसान का अधिकार है और हमें इसे हर बच्चे तक पहुंचाना चाहिए।”

महेश जी ने एक उदाहरण दिया। उन्होंने गांव के सबसे गरीब बच्चे मोहन की कहानी सुनाई, जिसने कठिन परिस्थितियों में भी पढ़ाई जारी रखी और पूरे जिले में टॉप किया। मोहन को सरस्वती पूजा के अवसर पर सम्मानित किया गया।

पूजा के बाद, बच्चों ने एक नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें दिखाया गया कि कैसे शिक्षा हर इंसान के जीवन को बदल सकती है। नाटक के अंत में सभी बच्चों ने एक वादा किया कि वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ उन बच्चों की भी मदद करेंगे, जिन्हें शिक्षा का मौका नहीं मिलता।

गांव के बुजुर्गों ने इस पहल की सराहना की और कहा, “बसंत पंचमी का यह उत्सव हमें सिखाता है कि विद्या ही सबसे बड़ा धन है। सरस्वती देवी की पूजा तभी सार्थक है, जब हम शिक्षा के माध्यम से अपने समाज को बेहतर बनाएं।”

उस दिन के बाद, गांव में शिक्षा को लेकर एक नई जागरूकता आई। हर परिवार ने अपने बच्चों को पढ़ाई में प्रोत्साहित करना शुरू किया, और गांव के बच्चों ने अपनी मेहनत से पूरे जिले में नाम कमाया।

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि बसंत पंचमी केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह शिक्षा और ज्ञान का महत्व समझाने का अवसर है। इस त्योहार का असली उद्देश्य यह है कि हम ज्ञान को अपने जीवन का हिस्सा बनाएं और दूसरों को भी शिक्षित करें।

पहेली का उत्तर : साईकिल
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प्रार्थना:
राजाओं में श्रेष्ठ श्रीराम सदा विजय को प्राप्त करते हैं। मैं लक्ष्मीपति भगवान् श्रीराम का भजन करता हूँ। सम्पूर्ण राक्षस सेना का नाश करने वाले श्रीराम को मैं नमस्कार करता हूँ। श्रीराम के समान अन्य कोई आश्रयदाता नहीं। मैं उन शरणागत वत्सल का दास हूँ। मैं हमेशा श्रीराम मैं ही लीन रहूँ। हे श्रीराम! आप मेरा (इस संसार सागर से) उद्धार करें।

मंत्र:
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। 
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्।

अर्थः सभी सुखी होवें, सभी रोगमुक्त रहें, सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।

गर्भ संवाद:
मेरे प्यारे शिशु मेरे बच्चे, मैं तुम्हारी माँ ‍ हूं…… माँ!

— आज मैं तुम्हे तुम्हारे कुछ महानतम गुणों की याद दिला रही रही हूँ जो तुम्हे परमात्मा का अनमोल उपहार है।

— मेरे बच्चे! तुम्हारे मस्तिष्क में अपार क्षमता है। तुम्हारी बुद्धि तीव्र है।

— तुम आइंस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक जैसी क्षमता लेकर आ रहे हो। तुममे कठिन से कठिन समस्या को सुलझाने की योग्यता है।

— तुम रामानुजन जैसी गणित के सवालों को हल करने की क्षमता रखते हो।

— विवेकानंद जैसी महान प्रतिभा है तुममें।

— तुम्हारी याददाश्त बहुत अच्छी है, जो बात तुम याद रखना चाहो तुम्हें सदा याद रहती है।

— तुम्हारी एकाग्रता कमाल की है। जिस काम पर तुम फोकस करते हो उसमें बेहतरीन परिणाम लेकर आते हो।

— कोई भी विषय, कोई भी टॉपिक तुम्हारे लिए कठिन नहीं, हर विषय को अपनी लगन से, परिश्रम से तुम सरल बना लेते हो।

— तुम्हारे भीतर अनंत संभावनाएं छुपी हुई है।

— तुम्हें म्यूजिक का बहुत शौक है, तुम सभी वाद्य यंत्र बजाना जानते हो। ढोलक, गिटार, तबला, हारमोनियम, तुम बहुत अच्छे से बजा सकते हो।

— तुम्हारा दिमाग बहुत तेज चलता है। मुश्किल से मुश्किल समस्या का भी तुम बड़ी आसानी से हल निकाल लेते हो।

— तुम्हारी वाणी में मिठास है। तुम एक बहुत अच्छे गायक हो। जब तुम गाते हो तो सभी मंत्रमुग्ध हो जाते है।

— तुम्हें पढ़ाई में सभी सब्जेक्ट अच्छे लगते है। जो भी पढ़ते हो बड़ी आसानी से याद हो जाता है।

पहेली:
मिट्टी का बनाया मकान, 
लोहे की छत्त लगाई,
सुबह शाम उस घर में, 
रोजाना आग लगाई।

कहानी: ममता की महिमा
एक बड़े शहर में सीमा नाम की एक मां अपने बेटे रोहन के साथ रहती थी। सीमा ने अपनी पूरी जिंदगी अपने बेटे के बेहतर भविष्य के लिए समर्पित कर दी थी। उसके पति का देहांत तब हुआ जब रोहन सिर्फ पांच साल का था। लेकिन सीमा ने हिम्मत नहीं हारी। उसने अपनी छोटी सी सिलाई की दुकान चलाकर रोहन को पढ़ाने और उसकी जरूरतों को पूरा करने की ठानी।

रोहन को पढ़ाई में काफी रुचि थी, लेकिन वह देखता था कि उसकी मां कितनी कठिनाई से उसका भविष्य बनाने की कोशिश कर रही है। एक दिन उसने अपनी मां से कहा, “मां, आप इतनी मेहनत क्यों करती हैं? आप इतनी मेहनत क्यों करती हैं? मुझे लगता है कि मैं आपके लिए बोझ हूं।”

सीमा ने रोहन का हाथ पकड़कर कहा, “बेटा, तुम मेरे लिए बोझ नहीं हो। तुम मेरी सबसे बड़ी ताकत हो। एक मां के लिए अपने बच्चे का सपना पूरा करना ही उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य होता है।”

रोहन ने अपनी मां की मेहनत को देखकर और अधिक मेहनत करने की ठान ली। वह अपने स्कूल में हर साल टॉप करता था और अपनी मां का सिर गर्व से ऊंचा करता था।

समय बीतता गया। रोहन ने कॉलेज की पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में नौकरी करने लगा। जब उसे पहली तनख्वाह मिली, तो उसने अपनी मां के लिए एक सुंदर साड़ी खरीदी और उनके पास जाकर कहा, “मां, यह आपकी ममता और मेहनत का फल है। आज मैं जो भी हूं, आपकी वजह से हूं।”

सीमा की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसने अपने बेटे को गले लगाते हुए कहा, “ममता का असली फल यही है कि मैं तुम्हें खुश और सफल देख रही हूं।”

शिक्षा:
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि मां की ममता और उसका त्याग बच्चों की जिंदगी को सुंदर और सफल बनाता है। मां का प्रेम और उसकी मेहनत किसी भी संघर्ष को पार कर सकती है।

पहेली का उत्तर : चूल्हा और तवा
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गीता सार:
क्यों व्यर्थ चिन्ता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न पैदा होती है, न मरती है । 
 
जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।

तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाये थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर आये, जो लिया यहीं से लिया, जो दिया यहीं से दिया। जो लिया इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया। खाली हाथ आए, खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यह प्रसन्नता ही तुम्हारे दुःखों का कारण है।

परिवर्तन ही संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ो के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो, विचार से हटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।

न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है, फिर तुम क्या हो? तुम अपने आपको भगवान् के अर्पित करो। यह सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है, वह भय, चिन्ता शोक से सर्वदा मुक्त है। 

जो कुछ तू करता है, उसे भगवान को अर्पण करता चल। इसी में तू सदा जीवन-मुक्त अनुभव करेगा।

मंत्र:
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता । 
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ॥

अर्थः हे देवी! आप सभी प्राणियों में शक्ति के रूप में विद्यमान हैं। आपको बार-बार नमन।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारे जीवन के हर निर्णय का प्रभाव तुम्हारे भविष्य पर पड़ता है। जब तुम हर निर्णय सोच-समझकर लेते हो, तो वह तुम्हें सफलता की ओर बढ़ाता है। अपने भविष्य के लिए सही निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि एक गलत निर्णय भी तुम्हे गलत दिशा में ले जा सकता है। मैं चाहती हूं कि तुम हर कदम पर समझदारी से निर्णय लो, क्योंकि यही तुम्हारे भविष्य को आकार देगा और तुम्हें सही दिशा में ले जाएगा।”

पहेली:
एक पेड़ की तीस हैं डाली, 
आधी सफेद और आधी काली।

कहानी: बलराम की ताकत
महाभारत के समय, बलराम को उनकी ताकत और दृढ़ संकल्प के लिए जाना जाता था। वह भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे और एक निडर योद्धा थे। उनके पास बल, पराक्रम और धर्म के प्रति गहरी आस्था थी। लेकिन उनकी ताकत केवल शारीरिक शक्ति तक सीमित नहीं थी। उनका जीवन हमें संयम, अनुशासन और धर्म की शिक्षा देता है।

एक समय की बात है, जब कौरव और पांडवों के बीच युद्ध की तैयारी चल रही थी। कौरवों ने बलराम से अनुरोध किया कि वह उनके पक्ष में लड़ें, क्योंकि दुर्योधन उनके शिष्य थे। दूसरी ओर, पांडवों ने भी बलराम से मदद मांगी, क्योंकि पांडव श्रीकृष्ण के बेहद करीबी थे।

बलराम को यह समझते देर नहीं लगी कि यह युद्ध धर्म और अधर्म के बीच है। लेकिन उन्होंने किसी भी पक्ष के साथ लड़ने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, “यह मेरा कर्तव्य है कि मैं न्याय और धर्म का पालन करूं। लेकिन मैं इस युद्ध में किसी का साथ नहीं दे सकता। मैं केवल एक तटस्थ दृष्टा बनकर धर्म का पालन करूंगा।”

बलराम ने युद्ध के दौरान हिमालय की यात्रा की और ध्यान और तपस्या में अपना समय बिताया। उन्होंने दिखाया कि केवल ताकत के बल पर नहीं, बल्कि सही निर्णय और धर्म का पालन करना ही सच्चा बल है।

युद्ध के बाद, बलराम ने युधिष्ठिर को धर्म और शासन के आदर्शों की शिक्षा दी। उन्होंने बताया कि सच्ची ताकत केवल शरीर में नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शक्ति में है।

शिक्षा:
बलरामजी की कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची ताकत केवल शारीरिक शक्ति नहीं है। संयम, अनुशासन और धर्म का पालन करना हमारी असली ताकत है। सही निर्णय लेना और सच्चाई के साथ खड़े रहना ही सच्चे वीर की पहचान है।

पहेली का उत्तर : महीना
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प्रार्थना:
हम उस त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते है जो अपनी शक्ति से इस संसार का पालन-पोषण करते है उनसे हम प्रार्थना करते है कि वे हमें इस जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्त कर दे और हमें मोक्ष प्रदान करें। जिस प्रकार से एक ककड़ी अपनी बेल से पक जाने के पश्चात् स्वतः की आज़ाद होकर जमीन पर गिर जाती है उसी प्रकार हमें भी इस बेल रुपी सांसारिक जीवन से जन्म मृत्यु के सभी बन्धनों से मुक्ति प्रदान कर मोक्ष प्रदान करें।

मंत्र:
आत्मज्ञानं शुद्धं ब्रह्मज्ञानं सर्वज्ञम्।
विद्या योगानां शान्ते च पूर्णे आत्मनं विन्देत्।

अर्थ: आत्मज्ञान और ब्रह्मज्ञान दोनों शुद्ध होते हैं, और यह सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ होता है। योग और शांति के माध्यम से, व्यक्ति आत्मा को पहचानता है और जीवन में पूर्णता की प्राप्ति करता है।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! असफलता कभी अंत नहीं होती, बल्कि यह एक नया अवसर होती है सीखने का। जब हम असफल होते हैं, तो हम सीखते हैं कि क्या गलत हुआ और इसे सुधारने का तरीका ढूंढ़ते हैं। हर असफलता से हम और बेहतर बनते हैं। मैं चाहती हूं कि तुम असफलताओं को एक अवसर समझो, क्योंकि यही तुम्हारी सफलता की दिशा में अगला कदम है।”

पहेली:
तीन अक्षर का मेरा नाम, 
आता हूँ खाने के काम, 
मध्य कटे तो बन जाऊँ चाल, 
मेरा नाम सदा तत्काल।

कहानी: विनम्रता की महिमा
एक छोटे से गांव में एक साधारण व्यक्ति रहता था, जिसका नाम कमल था। कमल को अपनी ईमानदारी और मेहनत के लिए जाना जाता था। लेकिन उसका एक बड़ा गुण था — उसकी विनम्रता। चाहे वह किसी बड़े व्यक्ति से मिलता या किसी गरीब से। उसका व्यवहार सभी के साथ एक समान था।

गांव के लोग अक्सर उसकी तारीफ करते और कहते, “कमल की तरह बनना बहुत मुश्किल है। उसकी विनम्रता ने उसे गांव का सबसे पसंदीदा इंसान बना दिया है।” लेकिन गांव में एक व्यक्ति था रघु। जो कमल की इस प्रसिद्धि से ईर्ष्या करता था। रघु हमेशा सोचता, “आखिर क्या खास है कमल में? वह भी तो एक आम आदमी है।” 

एक दिन, रघु ने कमल को नीचा दिखाने के लिए योजना बनाई। उसने एक सार्वजनिक सभा में कमल को बुलाया और उसे लोगों के सामने अपमानित करने की कोशिश की। उसने कहा, “कमल, तुम हमेशा विनम्र बने रहते हो, लेकिन यह तो दिखावा है। सच बताओ, क्या तुम्हें कभी गुस्सा नहीं आता?”

कमल मुस्कुराया और शांत स्वर में बोला, “रघु, गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन अगर हम अपने गुस्से को विनम्रता से नियंत्रित कर लें, तो यह हमारे जीवन को सुंदर बना सकता है। विनम्रता केवल दूसरों के प्रति सम्मान नहीं, बल्कि यह हमारी आत्मा की सच्ची शक्ति है।”

कमल के शब्दों ने सभा में मौजूद सभी लोगों का दिल जीत लिया। रघु ने महसूस किया कि उसने कमल को अपमानित करने की कोशिश करके खुद को नीचा दिखाया है। उसने कमल से माफी मांगी और कहा, “कमल, मैं तुम्हारी विनम्रता की शक्ति को समझ नहीं पाया। आज तुमने मुझे सिखा दिया कि विनम्रता ही इंसान की असली ताकत है।”

उस दिन के बाद, रघु और कमल अच्छे दोस्त बन गए। और गांव के लोगों ने एक बार फिर महसूस किया कि विनम्रता वास्तव में इंसान को महान बनाती है।

शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि विनम्रता हमारी सबसे बड़ी ताकत है। यह न केवल हमें दूसरों का सम्मान करना सिखाती है, बल्कि यह हमारे व्यक्तित्व को भी ऊंचा बनाती है। जब हम विनम्रता से काम लेते हैं, तो हम न केवल दूसरों के दिलों में जगह बनाते हैं, बल्कि अपने जीवन में भी शांति और संतोष पाते हैं। 

पहेली का उत्तर : चावल

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प्रार्थना:
हे न्यायाधीश प्रभु! आप अपनी कृपा से हमको काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, आलस्य, प्रमाद, ईर्ष्या, द्वेष, विषय-तृष्णा, निष्ठुरता आदि दुर्गुणों से मुक्तकर श्रेष्ठ कार्य में ही स्थिर करें। हम अतिदिन होकर आपसे यही मांगते हैं कि हम आप और आपकी आज्ञा से भिन्न पदार्थ में कभी प्रीति ना करें।

मंत्र:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

अर्थः सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।

गर्भ संवाद
“मेरे प्यारे बच्चे! सपने देखना आसान है, लेकिन उन्हें साकार करना मेहनत और समर्पण का काम है। जब तुम सच्ची मेहनत और ईमानदारी से अपने सपनों को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ाते हो, तो सफलता तुम्हारे करीब आती है। मैं चाहती हूं कि तुम अपने सपनों को सिर्फ एक ख्वाब के रूप में न देखो, बल्कि उसे साकार करने के लिए हर रोज़ मेहनत करो, क्योंकि यही तुम्हारी सफलता की कुंजी होगी।”

पहेली:
पहले थी मैं भोली-भाली, 
तब सहती थी मार, 
अब पहनी मैंने लाल चुनरियाँ, 
अब न सहूँगी मार।

कहानी: कठिनाइयों में धैर्य
रामु एक गरीब किसान था, जो अपने छोटे से खेत में मेहनत करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था। हर साल वह अपने खेत में फसल लगाता और उससे जो भी आय होती, उसी से अपने परिवार का जीवन चलाता। लेकिन एक साल, प्रकृति ने उसकी परीक्षा लेने की ठान ली। लगातार बारिश ने उसकी पूरी फसल बर्बाद कर दी। रामु का दिल टूट गया। वह सोचने लगा कि अब वह अपने परिवार को कैसे खिलाएगा।

रामु ने गाँव के बड़े-बुजुर्गों से मदद मांगी, लेकिन किसी के पास उसकी समस्या का समाधान नहीं था। निराश होकर वह एक दिन गाँव के प्रार्थना मंदिर गया और भगवान से प्रार्थना करने लगा। तभी वहाँ एक साधु आए और उन्होंने रामु को रोते हुए देखा। उन्होंने रामु से पूछा, “पुत्र, तुम क्यों रो रहे हो?”

रामु ने अपनी समस्या साधु को बताई। साधु ने उसकी बात सुनी और कहा, “पुत्र, जीवन में कठिनाइयाँ हर किसी के पास आती हैं। लेकिन जो व्यक्ति धैर्य और विश्वास के साथ उनका सामना करता है, वही असली विजेता बनता है। अगर तुम्हें सफलता चाहिए, तो तुम्हें कठिनाइयों में भी धैर्य रखना होगा।” साधु ने रामु को एक कहानी सुनाई: एक बार एक बांस का बीज जमीन में बोया गया। किसान ने उसे रोज़ पानी दिया और देखभाल की। लेकिन पूरे पांच साल तक उस बीज से कुछ नहीं निकला। 
किसान निराश हो गया। लेकिन छठे साल में वह बांस का पौधा अचानक तेजी से बढ़ने लगा। यह देखकर किसान हैरान रह गया। उसने समझा कि पहले पांच साल वह पौधा अपनी जड़ों को मजबूत करने में लगा था।”

साधु ने कहा, “तुम्हारी मेहनत भी उसी बांस के पौधे की तरह है। अगर आज तुम्हें परिणाम नहीं मिल रहा, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुम्हारी मेहनत बेकार जा रही है। तुम्हारी मेहनत तुम्हारी जड़ों को मजबूत कर रही है। धैर्य रखो और अपने काम में लगे रहो।”

रामु ने साधु की बात को समझा और अपने खेत में दुबारा मेहनत करना शुरू किया। उसने नई फसल लगाई और इस बार और भी ज्यादा मेहनत की। कुछ महीनों बाद, उसकी फसल इतनी अच्छी हुई कि उसने अपने परिवार का सारा कर्ज चुका दिया और एक बेहतर जीवन जीने लगा।

शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में धैर्य रखना बहुत जरूरी है। कठिनाइयाँ हमें मजबूत बनाती हैं और हमें सिखाती हैं कि सफलता पाने के लिए समय और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए, क्योंकि हर कठिनाई के बाद सफलता का सूरज जरूर उगता है।

पहेली का उत्तर : मिट्टी का घड़ा
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प्रार्थना:
हे बुद्धिदाता श्रीगणेश, मुझे सदा सद्बुद्धि प्रदान कीजिए। हे विघ्नहर्ता, अपने पाश से मेरे सर्व ओर सुरक्षा कवच निर्मित कीजिए और मेरे जीवन में आने वाले सर्व संकटों का निवारण कीजिए।

हे मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम, मेरा जीवन भी आप ही की भांति आदर्श बने, इस हेतु आप ही मुझ पर कृपा कीजिए।

हे बजरंग बली, आपकी कृपा से निर्भयता, अखंड सावधानता, दास्यभाव आदि आपके गुण मुझमें भी आने दीजिए।

हे महादेव, आपकी ही भांति मुझमें भी वैराग्यभाव निर्मित होने दीजिए।

हे जगदंबे माता, मां की ममता देकर आप मुझे संभालिए। आपकी कृपादृष्टि मुझ पर निरंतर बनी रहे और आप मेरी सदैव रक्षा कीजिए।

मंत्र:
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। 
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति।

अर्थः जो व्यक्ति इस जीवन चक्र के प्रवाह में अपना योगदान नहीं करता, वह बर्बाद हो जाता है। जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों के सुखों में लिप्त रहता है, वह अपने जीवन को व्यर्थ करता है। इस श्लोक से यह प्रेरणा मिलती है कि हमें अपने कर्मों में अपनी भूमिका निभानी चाहिए और स्वयं को श्रेष्ठ कार्यों में लगाना चाहिए।

गर्भ संवाद
“मेरे बच्चे! तुम्हारा भविष्य वही होता है, जो तुम आज अपनी सोच में बनाते हो। अगर तुम खुद को सफल और खुशहाल देखते हो, तो तुम्हारा भविष्य उस दिशा में जाएगा। सकारात्मक सोच से तुम न केवल अपने भविष्य को दिशा दे सकते हो, बल्कि अपनी पूरी यात्रा को भी आनंदमय बना सकते हो। मैं चाहती हूं कि तुम अपने भविष्य को पहले अपनी सोच में संजो लो, क्योंकि यही तुम्हारी सफलता का पहला कदम होगा।”

पहेली:
पेट में अंगुली सिर पर पत्थर, 
जल्दी से बताओ उसका उत्तर।

कहानी: माता कुंती की ममता
महाभारत के समय, कुंती एक ऐसी स्त्री थीं, जिनकी ममता और त्याग ने उन्हें आदर्श मां का स्थान दिलाया। वह पांच पांडवों की माता थीं और उनके जीवन में अनेक संघर्ष थे। लेकिन हर मुश्किल परिस्थिति में उन्होंने अपने बच्चों के लिए ममता और त्याग का परिचय दिया।

कुंती ने अपनी पहली संतान कर्ण, को समाज के डर और मर्यादा के कारण त्याग दिया था। हालांकि, उनके दिल में कर्ण के लिए हमेशा प्रेम और ममता थी। जब वह पांडवों की मां बनीं, तो उन्होंने अपने बच्चों को धर्म, सत्य और कर्तव्य का पाठ पढ़ाया। 

महाभारत के युद्ध के दौरान कुंती के लिए, यह बहुत कठिन समय था। एक ओर उनके पांच पुत्र थे और दूसरी ओर कर्ण, जिसे उन्होंने जन्म दिया था, लेकिन समाज के डर से त्याग दिया था। उन्हें यह पता था कि कर्ण कौरवों की ओर से लड़ने वाला है।

युद्ध से पहले, कुंती ने कर्ण से मिलकर अपने दिल की बात कही। उन्होंने उसे बताया कि वे उसकी माता है। यह सुनकर कर्ण भावुक हो गया। लेकिन उसने कहा “मां, मुझे आपसे कोई शिकायत नहीं है। आपने जो किया, वह उस समय की परिस्थिति के अनुसार सही था। लेकिन अब मैं दुर्योधन का ऋणी हूं और मैं अपने धर्म का पालन करूंगा।”

कुंती ने अपने सभी बच्चों के प्रति समान ममता दिखाई। उन्होंने कर्ण को आशीर्वाद दिया, भले ही उन्हें यह पता था कि वह उनके अपने बच्चों के खिलाफ लड़ने वाला है। उनकी ममता ने यह सिखाया कि सच्चा प्रेम केवल अपने बच्चों को खुश देखना नहीं है, बल्कि उनके कर्तव्य को समझना और उनका समर्थन करना है।

महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ और कुंती ने अपने सभी बच्चों को समान रूप से याद किया। उनके त्याग और ममता ने उन्हें भारतीय इतिहास की सबसे प्रेरणादायक माताओं में से एक बना दिया।

शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची ममता बिना शर्त के होती है। कुंती ने अपने बच्चों के लिए जो त्याग और प्रेम दिखाया, वह एक आदर्श मां की परिभाषा है। ममता का अर्थ है अपने बच्चों के कर्तव्यों को समझना और उनके निर्णयों का सम्मान करना।

पहेली का उत्तर : अँगुठी
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प्रार्थना:
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन।
प्रेम के सिन्धु, दीन के बन्धु, 
दुःख दारिद्र विनाशन। 

हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन 
हे नित्य अखंड अनंन्त अनादि, 
पूरण ब्रह्म सनातन।

हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन 
हे जग आश्रय जग-पति जग-वन्दन, 
अनुपम अलख निरंजन।

हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन
प्राण सखा त्रिभुवन प्रति-पालक, 
जीवन के अवलंबन।

हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन
हे जग त्राता विश्व विधाता, 
हे सुख शांति निकेतन 
हे सुख शांति निकेतन
हे सुख शांति निकेतन।

मंत्र:
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखम्
न मन्त्रो न तीर्थं न वेदा न यज्ञाः।
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता
चिदानन्द रूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥

अर्थात: मै न तो पुण्यों से बंधा हूं न ही पाप से बंधा हूँ और न ही मैं संसार के सुख और दुख में बंधा हूँ।
न ही मैं मंत्रों से बंधा हूँ न ही मैं पवित्र स्थानों से बंधा हूँ, न ही मैं पवित्र ग्रंथों से बंधा हूँ और न ही यज्ञ से बंधा हूँ।
न मै भोजन हूँ न मै भोजन से उत्पन्न आनंद हूँ और ना ही मैं भोज्य अर्थात ग्रहण करने वाला भी नहीं हूं। 
मैं चिद् स्वरूप आनंद हूँ मै शिव हूँ मै शिव हूँ।

गर्भ संवाद
"मेरे बच्चे! तुम्हारा भविष्य तभी साकार होगा, जब तुम हर दिन उसे बनाने के लिए एक कदम आगे बढ़ाओ। कोई भी बड़ी सफलता तुरंत नहीं मिलती, वह धीरे-धीरे मेहनत और प्रयासों से बनती है। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन अपने लक्ष्य की ओर एक कदम बढ़ाओ, ताकि तुम अपने सपनों को हकीकत बना सको। छोटा सा कदम भी तुम्हारे भविष्य में बड़ा बदलाव ला सकता है।"

पहेली:
जीभ नहीं, पर फिर भी बोले, 
बिना पाँव सारा जग डोले 
राजा, रंक सभी को भाता, 
जब आता तब खुशियाँ लाता।

कहानी: अर्जुन की साधना
महाभारत के सबसे महान धनुर्धर, अर्जुन अपनी साधना और समर्पण के लिए जाने जाते थे। उनकी दृढ़ता और ध्यान ने उन्हें अपने लक्ष्य तक पहुंचने में मदद की। यह कहानी उनके जीवन के उस समय की है, जब वह धनुर्विद्या में निपुण होने के लिए कठिन अभ्यास कर रहे थे।

एक दिन, अर्जुन अपने गुरु द्रोणाचार्य के पास पहुंचे और कहा, “गुरुजी, मैं सबसे महान धनुर्धर बनना चाहता हूं। मुझे वह शिक्षा दीजिए, जो मुझे इस लक्ष्य तक पहुंचा सके।”

गुरु द्रोण ने मुस्कुराते हुए कहा, “अर्जुन, महान बनने के लिए केवल शिक्षा नहीं, बल्कि साधना और समर्पण की भी आवश्यकता होती है। तुम्हें हर परिस्थिति में अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना होगा।”

द्रोणाचार्य ने अर्जुन को एक कठिन परीक्षा दी। उन्होंने कहा, “अर्जुन, उस पेड़ पर एक पक्षी बैठा है। तुम उसे देख रहे हो?” अर्जुन ने जवाब दिया, “हाँ, गुरुजी।”

द्रोणाचार्य ने पूछा, “तुम्हें और क्या दिखाई दे रहा है?” अर्जुन ने कहा, “मुझे पेड़ की शाखाएं, पत्तियां और पक्षी दिखाई दे रहे हैं।”

गुरुजी ने अर्जुन के बाकी शिष्यों को भी यह सवाल पूछा। सभी ने कुछ न कुछ कहा— किसी ने पेड़, तो किसी ने आसमान।

लेकिन जब द्रोणाचार्य ने अर्जुन से फिर पूछा, तो अर्जुन ने कहा, “गुरुजी, अब मुझे केवल पक्षी की आँख दिखाई दे रही है।”

गुरु द्रोण ने मुस्कुराते हुए कहा, “अर्जुन, यही तुम्हारी सबसे बड़ी ताकत है। जब तुम अपने लक्ष्य पर पूरी तरह से केंद्रित होते हो, तो तुम्हें और कुछ दिखाई नहीं देता। यही तुम्हें महान बनाएगा।”

अर्जुन ने अपने गुरु की शिक्षा को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया। उन्होंने अपने अभ्यास और समर्पण से वह स्थान हासिल किया, जो उन्हें अन्य सभी धनुर्धरों से अलग बनाता है।

शिक्षा:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता पाने के लिए अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करना और पूरी मेहनत से साधना करना जरूरी है। अर्जुन की तरह अगर हम अपने काम में समर्पित रहेंगे, तो हमें भी अपने जीवन में किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता।

पहेली का उत्तर : रुपया
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प्रार्थना:
मैं उमापति, देवगुरू, जो ब्रह्मांड के कारण हैं, को नमन करता हूँ। मैं उनको नमन करता हूँ जिनका आभूषण सर्प है, जो मृगधर हैं एवं जो सभी प्राणियों के स्वामी हैं। सूर्य, चंद्रमा और अग्नि जिनके तीन नेत्र हैं और जो विष्णु प्रिय हैं, मैं उन्हें नमन करता हूँ। मैं भगवान शंकर को नमन करता हूँ जो सभी भक्तों को शरण देने वाले हैं, वरदानों के दाता हैं एवं कल्याणकारी हैं।

मंत्र:
ॐ आदित्याय च सोमाय मंगळाय बुधाय च।
गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥

अर्थः सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु सभी ग्रहों की कृपा से हमारा जीवन शांतिपूर्ण हो।

गर्भ संवाद:
“मेरे प्यारे बच्चे! तुम्हें अपने भविष्य के बारे में सोचना चाहिए, लेकिन ध्यान रखना कि वर्तमान में जीना भी बहुत जरूरी है। अगर तुम अपने वर्तमान को सही तरीके से जीते हो, तो यही तुम्हारे भविष्य का आधार बनेगा। मैं चाहती हूं कि तुम हर दिन को पूरी तरह जीओ और उसे अपनी सफलता की नींव बनाओ, क्योंकि एक अच्छा वर्तमान ही तुम्हारा उज्जवल भविष्य बनाता है।”

पहेली:
छोटे से हैं मटकूदास, 
कपड़ा पहने सौ पचास।

कहानी: तात्या टोपे का बलिदान
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक तात्या टोपे ने न केवल भारतीय सैनिकों का नेतृत्व किया, बल्कि उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष में अपनी अद्वितीय वीरता और बलिदान का परिचय दिया। उनका नाम भारतीय इतिहास में हमेशा अमर रहेगा, क्योंकि उनका संघर्ष और बलिदान भारतीय स्वतंत्रता के प्रति उनके अथक समर्पण को दर्शाता है।

तात्या टोपे का जन्म 1814 में महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनका असली नाम रामचंद्र पांडे था, लेकिन उनका नाम तात्या टोपे के रूप में प्रसिद्ध हुआ। वह शुरू से ही बहादुर और निडर थे, और उनकी वीरता की कहानियां छोटी उम्र में ही फैलने लगीं थीं। वह भारतीय सेनापतियों में से एक थे जिन्होंने 1857 के भारतीय विद्रोह (सैनिकों की बगावत) में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

1857 की क्रांति भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर थी, जिसे हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला युद्ध भी कहते हैं। यह एक संगठित विद्रोह था, जिसमें भारतीय सैनिकों और आम नागरिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ एकजुट होकर संघर्ष किया। तात्या टोपे इस विद्रोह के महान सेनानायकों में से एक थे। उनका नाम स्वतंत्रता संग्राम के महान योद्धाओं में लिया जाता है।

तात्या टोपे का नेतृत्वः
तात्या टोपे ने 1857 की क्रांति के दौरान भारतीय सेनाओं की कमान संभाली। जब राजा नाना साहिब के नेतृत्व में पेशवा की सेना लखनऊ में अंग्रेजों से लड़ी, तो तात्या टोपे ने बड़ी वीरता और चतुराई से लड़ा। उनकी रणनीतियां और युद्ध के दौरान उनका साहस सभी को प्रेरित करता था। उनके नेतृत्व में भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ कई अहम जीत दर्ज की।

तात्या टोपे ने अपने युद्ध कौशल और चतुराई से अंग्रेजों को कई बार हराया। एक उदाहरण के तौर पर, उन्होंने अंग्रेजों को ताजमहल के पास एक छोटे से किले में घेर लिया और उन्हें नाकों चिढ़ा दिया। वह कभी भी अंग्रेजों से सीधे मुकाबला करने के बजाय उनकी कमजोरियों का फायदा उठाते थे और रणनीति के जरिए जीत हासिल करते थे। तात्या टोपे की सेना का आदर्श था— “यदि अंग्रेजों से लड़ने के लिए हमें हर तरीका अपनाना पड़े, तो हम उसे अपनाएंगे।”

तात्या टोपे की लड़ाई और संघर्ष:
जब विद्रोह फैलने लगा, तो तात्या टोपे ने झांसी की रानी रानी लक्ष्मीबाई से मिलकर उनके साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ा। रानी लक्ष्मीबाई के साथ तात्या टोपे की दोस्ती और साझेदारी को इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। वह दोनों मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करते थे। एक समय पर, रानी लक्ष्मीबाई ने तात्या टोपे से कहा था, “अगर हम दोनों एक साथ लड़ें, तो हम अंग्रेजों को कभी भी परास्त कर सकते हैं।” 

तात्या टोपे ने रानी लक्ष्मीबाई के साथ कई युद्धों में भाग लिया। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष करते हुए अपनी बहादुरी और रणनीतिक कौशल का प्रदर्शन किया। उनका संघर्ष केवल एक युद्ध नहीं था, बल्कि एक संघर्ष था जिसमें भारतीयों की स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए अपनी जान की आहुति दी गई।

तात्या टोपे का बलिदानः
1857 की क्रांति में तात्या टोपे की युद्ध रणनीतियां और नेतृत्व भारतीय सेना के लिए प्रेरणा स्रोत बन गए थे, लेकिन जब क्रांति को कड़ा झटका लगा और अंग्रेजों ने विद्रोह को दबा दिया, तो तात्या टोपे को गिरफ्तार कर लिया गया। उनके खिलाफ अंग्रेजों का जाल फैल चुका था और उनकी गिरफ्तारी को अंग्रेजों ने अपनी बड़ी सफलता के रूप में माना। 

तात्या टोपे को 1859 में गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें कड़ी यातनाओं से गुजरना पड़ा। फिर भी उनका साहस और धैर्य बरकरार रहा। तात्या टोपे के खिलाफ अंग्रेजों ने राजनीतिक तरीके से अपने आरोप तय किए और उन्हें फांसी की सजा सुनाई। यह समय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए बेहद दुखद था, लेकिन तात्या टोपे का साहस और उनका बलिदान भारतीय जनता के दिलों में हमेशा के लिए अमर हो गया।

तात्या टोपे को फांसी दिए जाने के समय उनका चेहरा शांति और दृढ़ता से भरा हुआ था।

उन्होंने फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले कहा, “हमारा संघर्ष जारी रहेगा और हमारा बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाएगा। एक दिन आएगा जब भारत स्वतंत्र होगा।”

तात्या टोपे का बलिदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उनका साहस, संघर्ष और बलिदान आज भी हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। उनकी यह महानता हमें यह सिखाती है कि स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कभी समाप्त नहीं होता और उसका मूल्य अत्यंत महत्वपूर्ण है।

शिक्षा:
तात्या टोपे की कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि किसी भी संघर्ष में नेतृत्व और साहस सबसे महत्वपूर्ण तत्व होते हैं। उन्होंने हमें यह सिखाया कि जब कोई उद्देश्य महान होता है, तब हमें अपने प्राणों की आहुति देने में भी संकोच नहीं करना चाहिए। तात्या टोपे का जीवन यह प्रमाणित करता है कि किसी भी शोषण के खिलाफ उठने के लिए हमें कभी भी डर नहीं लगना चाहिए, बल्कि हमें अपनी पूरी शक्ति और साहस के साथ अपनी आवाज उठानी चाहिए।

पहेली का उत्तर : प्याज
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