थारे बगैर...
छोरा...!
थारे बगैर..,
फिक्का पड्या डुंगरपुर, बांसवाड़ा
कदि आवें मने निरखने ,
सूरत, अमदाबाद रोड़ होकर
करस्यूं तने घणो प्यार ,
हिवड़े से रात-दिन ।
तू सरहद ने पार...,
रंगीलों राजस्थानी छोरो
हूं छैल छबीली गुजराती छोरी..,
म्हारा कांगणिया री खनक
तन्ने खूब बुलावें,
आजा म्हारे साजन..
अब दूरी न सुहावै ।।
©®- शेखर खराड़ी
तिथि- २०-१०-२०२६