रात के सन्नाटे में जब अकेलापन शोर करता है,
दर्द का घूंट पीकर जब इंसान कुछ याद करता है,
आंखों की कोर से ढुलकते उस ख़ामोश आंसू से पूछो,
कि टूटा हुआ दिल भी जीने का हौसला कैसे रखता है।
मां की सीने से लिपटकर रोने की वो चाहत,
पिता के थक चुके हाथों की वो अधूरी राहत,
समय की धूप ने सुखा दिए चेहरे के सारे रंग,
पर मन के किसी कोने में बची रही वो मासूम आदत।
रास्ते अजनबी थे, मंजिलों का कोई ठिकाना न था,
दूसरों की महफ़िल में अपना कोई आशियाना न था।
ज़िंदगी ने जितने भी दिए ज़ख्म, हंसकर सह लिए,
क्योंकि टूटकर बिखर जाना कभी कोई बहाना न था।
जो छूट गए पीछे, वो साए याद आते हैं,
बीते हुए हसीं लम्हे आंखों को भिगो जाते हैं।
पर सुनो, ये अंधेरा हमेशा के लिए टिक नहीं सकता,
दुखों की काली रात के बाद ही उम्मीद के सूरज मुस्कुराते हैं।