चलो मान लिया… मैं पागल हूँ।
मानसिक रूप से परेशान हूँ, डिस्टर्ब हूँ… जो भी आप कहना चाहते हैं, कह लीजिए।
लेकिन एक बात मेरी समझ से बाहर है—
अगर आपको सच में लगता है कि मैं मानसिक रूप से परेशान हूँ, तो फिर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों करते हो?
किसी इंसान को बार-बार सबके सामने “पागल” कह देने से वह पागल नहीं हो जाता।
कई बार इंसान पागल नहीं होता…
बस अंदर से इतना टूट चुका होता है कि उसकी परेशानी उसके व्यवहार में दिखाई देने लगती है।
वह चुप हो सकता है, गुस्सा कर सकता है, रो सकता है, किसी से बात नहीं करना चाहता…
लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसे और अपमानित किया जाए।
अगर कोई इंसान सच में मानसिक रूप से परेशान है, तो उसे ताने नहीं चाहिए।
उसे लोगों की हँसी नहीं चाहिए।
उसे सबके सामने “पागल” कहकर नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है।
उसे चाहिए—समझ, सम्मान, थोड़ा सा अपनापन और प्यार।
और सबसे बड़ी विडंबना तो यह है कि यह सब वही लोग करते हैं जो खुद को पढ़ा-लिखा और समझदार कहते हैं।
तो मेरा सवाल बस इतना है—
क्या पढ़ाई सिर्फ किताबें पढ़ लेने का नाम है?
अगर किसी परेशान इंसान की तकलीफ समझ नहीं सकते,
अगर उसके सामने ही उसका मज़ाक बना सकते हैं,
अगर उसकी हालत देखकर उसे और चोट पहुँचा सकते हैं,
तो फिर उस पढ़ाई का फायदा क्या है?
किसी इंसान को इतना मत तोड़ो कि उसकी चुप्पी भी तुम्हें पागलपन लगे और उसका दर्द भी तुम्हें ड्रामा।
हो सकता है जिसे तुम “पागल” कह रहे हो,
वह बस बहुत कुछ सहकर थक चुका हो।
और याद रखना—
किसी इंसान की परेशानी उसकी पहचान नहीं होती।
आज लोग चाहे मुझे जिस नाम से बुलाएँ,
मेरी सच्चाई किसी के कह देने से बदल नहीं जाएगी।
मैं टूटी हूँ तो खुद को फिर से जोड़ूँगी।
मैं परेशान हूँ तो इस दौर से भी निकलूँगी।
क्योंकि मुझे किसी के दिए हुए नाम से नहीं,
अपनी सच्चाई से पहचाना जाना है। ❤️