मेरी भाभी नहीं, मेरी माँ
Episode 3: अब तुम इस घर की नहीं हो
अमित की मृत्यु को अभी कुछ ही दिन हुए थे।
घर में पहले जैसी रौनक नहीं रही थी।
जिस आँगन में कभी अमित की हँसी गूँजती थी, वहाँ अब खामोशी पसरी रहती थी।
सावित्री अपने कमरे में बैठी अमित की तस्वीर को देखती रहती।
उसका एक हाथ अक्सर अपने पेट पर होता।
वह धीरे से कहती—
“आप तो चले गए... लेकिन आपकी निशानी मेरे पास है।”
उसकी आँखों से आँसू निकल आते।
वह अपने बच्चे से मन ही मन बात करती—
“तुम्हारे पापा बहुत अच्छे इंसान थे। मैं तुम्हें उनके जैसा ही बनाऊँगी।”
लेकिन सावित्री को क्या पता था कि उसी घर में कुछ लोग उसके भविष्य का फैसला करने की तैयारी कर रहे थे।
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घर की बैठक
एक शाम घर के बड़े कमरे में परिवार के कुछ लोग बैठे थे।
सुमित भी वहाँ था।
एक बुजुर्ग ने कहा—
“अमित के जाने के बाद घर की स्थिति बदल गई है।”
सुमित चुप रहा।
दूसरे व्यक्ति ने कहा—
“खेती की जमीन का खर्च है, घर का खर्च है... ऊपर से सावित्री और उसके बच्चे की जिम्मेदारी।”
सुमित ने शांत आवाज में कहा—
“भाभी और बच्चे की जिम्मेदारी मैं उठाऊँगा।”
कमरे में कुछ देर सन्नाटा रहा।
फिर एक व्यक्ति ने कहा—
“तू कब तक उठाएगा?”
“जब तक जरूरत होगी।”
“लेकिन यह घर?”
सुमित ने उसकी तरफ देखा।
“यह घर मेरे भाई का था। भाभी उसकी पत्नी हैं। उनका इस घर पर अधिकार है।”
एक आदमी ने कठोर स्वर में कहा—
“अमित अब नहीं है।”
सुमित की आँखों में गुस्सा आ गया।
“अमित नहीं है, इसका मतलब यह नहीं कि उसके रिश्ते भी खत्म हो गए।”
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।
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सावित्री के सामने फैसला
अगली सुबह सावित्री को बैठक में बुलाया गया।
वह धीरे-धीरे वहाँ पहुँची।
“मुझे बुलाया?”
घर के एक बड़े सदस्य ने कहा—
“हाँ। हमें तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।”
सावित्री बैठ गई।
उन्होंने कहा—
“अमित अब इस दुनिया में नहीं है। तुम्हें अपनी जिंदगी के बारे में सोचना चाहिए।”
सावित्री ने पूछा—
“क्या मतलब?”
“तुम अपने मायके चली जाओ।”
सावित्री कुछ पल चुप रही।
“मायके?”
“हाँ।”
उसने अपने पेट पर हाथ रखा।
“लेकिन मेरा बच्चा...”
“बच्चा हो जाएगा तो उसकी जिम्मेदारी देखी जाएगी।”
सावित्री की आँखें भर आईं।
“लेकिन यह घर मेरे पति का था।”
जवाब आया—
“पति नहीं रहा तो अब यह घर तुम्हारा नहीं है।”
सावित्री को जैसे किसी ने भीतर से तोड़ दिया।
उसने काँपती आवाज में पूछा—
“तो इतने साल जो मैंने इस घर के लिए दिए... उनका क्या?”
कोई जवाब नहीं मिला।
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सुमित का प्रवेश
उसी समय बाहर से सुमित की आवाज आई—
“भाभी को कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”
सबने पीछे मुड़कर देखा।
सुमित दरवाजे पर खड़ा था।
वह धीरे-धीरे अंदर आया।
“मैंने सब सुन लिया है।”
एक व्यक्ति ने कहा—
“तू फिर बीच में आ गया?”
सुमित ने कहा—
“यह मेरी भाभी का सवाल है। मैं बीच में नहीं, उनके साथ खड़ा हूँ।”
सावित्री ने उसे रोकना चाहा।
“सुमित, रहने दो।”
लेकिन सुमित ने कहा—
“नहीं भाभी। आज अगर मैं चुप रहा तो जिंदगी भर खुद को माफ नहीं कर पाऊँगा।”
उसने परिवार की तरफ देखकर कहा—
“जब मेरे भाई की जरूरत थी, तब सब उनके साथ थे। आज वह नहीं हैं तो उनकी पत्नी को घर से निकालना चाहते हैं?”
एक व्यक्ति बोला—
“तू हमारा फैसला नहीं बदल सकता।”
सुमित ने कहा—
“मैं फैसला बदलने नहीं आया हूँ। मैं सिर्फ इतना कहने आया हूँ कि मेरी भाभी को कोई घर से नहीं निकालेगा।”
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एक कठिन सवाल
घर के बड़े ने पूछा—
“अगर इतना ही भरोसा है तो क्या तू उनकी पूरी जिम्मेदारी उठा सकता है?”
सुमित ने बिना सोचे जवाब दिया—
“हाँ।”
“उनके बच्चे की?”
“हाँ।”
“उनकी पढ़ाई की?”
सुमित एक पल के लिए रुका।
उसने सावित्री की तरफ देखा।
फिर बोला—
“हाँ।”
सावित्री ने हैरानी से उसे देखा।
“सुमित, मेरी पढ़ाई?”
सुमित ने कहा—
“भाभी, आपने डॉक्टर बनने का सपना देखा था न?”
सावित्री की आँखें नम हो गईं।
“वह सपना अब कहाँ...”
सुमित ने कहा—
“जहाँ था, वहीं है।”
फिर उसने दृढ़ आवाज में कहा—
“आप डॉक्टर बनेंगी।”
कमरे में बैठे सभी लोग हैरान थे।
सुमित ने आगे कहा—
“भैया ने आपसे वादा किया था। अब वह वादा मैं पूरा करूँगा।”
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“यह मेरी भाभी नहीं...”
घर का एक सदस्य गुस्से में बोला—
“तू पागल हो गया है क्या? एक विधवा की जिम्मेदारी लेकर अपनी जिंदगी खराब करेगा?”
सुमित की आँखों में आँसू आ गए।
उसने कहा—
“विधवा मत कहिए।”
फिर उसने सावित्री की तरफ देखा।
“ये मेरे भाई की पत्नी हैं। मेरी भाभी हैं।”
कुछ पल रुककर वह बोला—
“और मेरे लिए सिर्फ भाभी नहीं... माँ जैसी हैं।”
सावित्री की आँखों से आँसू बहने लगे।
सुमित ने कहा—
“इन्होंने मुझे हमेशा छोटे भाई की तरह प्यार दिया है। मेरे लिए खाना बनाया, मेरी चिंता की, मेरी गलतियों पर समझाया। आज जब इन्हें मेरी जरूरत है तो मैं पीछे कैसे हट जाऊँ?”
पूरा कमरा शांत हो गया।
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आखिरी आदेश
लेकिन परिवार के कुछ लोग अभी भी नहीं माने।
एक व्यक्ति ने कहा—
“अगर तू इतना ही बड़ा बनना चाहता है, तो दोनों इस घर से चले जाओ।”
सुमित ने कुछ पल घर की दीवारों को देखा।
यहीं उसका बचपन बीता था।
यहीं उसके भाई ने उसे पढ़ाया था।
यहीं उनकी माँ की यादें थीं।
लेकिन सामने सावित्री खड़ी थी।
उसने अपना फैसला कर लिया।
सुमित ने कहा—
“ठीक है।”
सावित्री घबरा गई।
“सुमित!”
“भाभी, डरिए मत।”
उसने सावित्री का सामान उठाया।
“अगर इस घर में आपके लिए जगह नहीं है, तो मैं भी इस घर में नहीं रहूँगा।”
सावित्री रोते हुए बोली—
“तुम अपना घर मत छोड़ो।”
सुमित ने कहा—
“घर दीवारों से नहीं बनता भाभी। घर उन लोगों से बनता है जिन्हें हम अपना मानते हैं।”
फिर उसने अमित की तस्वीर उठाई।
“मैं अपने भाई की तस्वीर लेकर जा रहा हूँ।”
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गाँव की सड़क
सावित्री धीरे-धीरे घर से बाहर निकली।
उसके हाथ में कुछ कपड़े थे।
सुमित के हाथ में अमित की तस्वीर।
गाँव के लोग उन्हें जाते हुए देख रहे थे।
किसी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहें।
सावित्री ने पीछे मुड़कर आखिरी बार उस घर को देखा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
“यहीं तो मेरे पति की यादें हैं...”
सुमित ने कहा—
“भाभी, यादें घर में नहीं रहतीं। दिल में रहती हैं।”
दोनों आगे बढ़ गए।
लेकिन उन्हें नहीं पता था कि अब उनके सामने गरीबी, समाज, पढ़ाई और आने वाले बच्चे की जिम्मेदारी से कहीं बड़ा संघर्ष खड़ा होने वाला है।
रास्ते में सुमित अचानक रुक गया।
उसने सावित्री से कहा—
“भाभी, एक बात का वादा कीजिए।”
“क्या?”
“आप अपना डॉक्टर बनने का सपना कभी नहीं छोड़ेंगी।”
सावित्री ने आँसू पोंछे।
“वादा।”
सुमित मुस्कुराया।
“तो फिर आज से हमारी नई जिंदगी शुरू।”
दूर आसमान में बादल घिरने लगे।
और उसी रात दोनों एक छोटे-से किराए के घर की तलाश में निकल पड़े।
लेकिन सुमित को अभी यह नहीं पता था कि उसकी जेब में सिर्फ कुछ ही पैसे थे... और अगले दिन घर का किराया देना था।
जारी रहेगा...
अगला एपिसोड:
Episode 4 — “एक छोटा घर और बड़ी जिम्मेदारी