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ये हरी कांच की हरी-हरी चूड़ियां
मन को भाय ये हरी हरी चूड़ियां
आया सावन, बड़ा मनभावन
रिमझिम बूंदे बरस रही हैं
डाली-डाली झूम रही है
काले-काले बदरा छाए रे
मन होकर मगन, झूमे गगन
गीत कोई प्रेम का गाए रे
हरी-हरी चूड़ियां देख
गौरी का मन ललचाए रे
हरी साड़ी, हरी चूड़ियां
हरी बिंदी, हरी चुनरिया
धरती हरी, काली बदरिया
झूम-झूम देखो ये
सारी बगिया शोर मचाए रे
सर-सर पत्ते झूम रहे
कू-कू पपीहा गूंज रहे
मन भी बहका-बहका जाए रे
चूड़ी हरी मन को भाने लगी
याद पिता की आने लगी
रिमझिम रिमझिम ये बारिश
मुझे यूं चिढ़ाने लगी
झर-झर झरता
ये सावन सखी झरता जाए रे
चूड़ी हरी मन को भाए रे
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डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली