कविता जीवन का मर्म
11/7/26
लिखा है क्या हाथों की लकीरों में
छुपा है क्या इन तकदीरों में
मिलता है वही, होता है जो नसीबों में
सिर्फ मेहनत करने से नहीं मिलती सफलता
खेल विधाता का कोई नहीं समझ सकता
होना था जिस दिन राम का राज तिलक
हुआ वनवास उसी दिन, लगा कैकेयी पर कलंक
होनी थीं हो गई टाल सका ना कोई
भविष्य की गर्त में राज छिपे हैं कई
चक्र है ये कर्मिक फल का
हिसाब है ये कई जन्म का
नहीं ज्ञात कौन सा कर्म
बदल देगा अगले जन्म का मर्म
रहता है इंसान इसी भ्रम
'मैं' करता ना समझता कर्म
कर्ता करे ना कर सके
बाल ना बांका होय
जिसकी किस्मत महाकाल लिखें
उसकी बिगाड़ सके ना कोई
कब किससे कैसे मिलना है
कर्मों का फल जरूर मिलना है
दीन सेवा ही परम धर्म है
अक्षर नाद ही परम ब्रह्म है
तप वाणी का जिसने किया
मोह छोड़ पर उपकार किया
सुधारा उसने अपना कर्म है
यही जीवन का मर्म है।
डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली
11/7/26