हां मैं हमारे अमर्यादित स्त्री
कविता
हां मैं समाज में बड़ी अमर्यादित स्त्री हूं
उन मर्यादित स्त्रियों की तरह मैं बिल्कुल भी नहीं हूं
क्योंकि मैं दिखावा नहीं करती
मैं बिल्कुल वैसी हूं
जैसी मैं हूं
मैं झूठ नहीं बोलता
मैं जी हजूरी नहीं करती
मैं नहीं करती और स्त्रियों की तरह बड़ों बुड़ो की सम्मान
बस इसलिए कि वह बड़े और बूढ़े हैं
मैं नहीं करती घर की वह सभी काम
जो बरसों से स्त्री के नाम मर्यादित होने के तौर पर
स्त्री पर एक बोझ सी लादी गई है
उन सभी की
अपने बड़ों की छोटो की ख्याल रखने की
जिम्मेदारियां उठाने की
तीन समय उनके लिए रोटियां पकाने की
24 घंटे उनके लिए ही जीने की
मैं नहीं कर सकती
क्योंकि मुझ में धैर्य नहीं है
मैं नहीं करती
मैं बेवाक सी स्त्री
वही करती हूं जो मेरा मन भाता है
मैं किसी के हिसाब से अपने समय नहीं देती
मेरा समय स्वयं बस मेरा है
उसे मैं अपनी जरूरत
और अपने हिसाब से ही खर्च करती हूं
हां मैं समाज में बहुत ही अमर्यादीत स्त्री हुं
क्योंकि मुझे मुखौटे पहनने का शौक नहीं
मैं वही शक्ल लेकर चलती हूं
जो मेरा है
मैं दूसरों की तरह नियंत्रण चेहरा नहीं बदलती
दिखाबा के लिए
मैं हद से ज्यादा अच्छी नहीं होती
कोई मेरी बात पर यकीन करें
बस सिर्फ इसलिए मैं मीठी बातें नहीं बोलती
मुझे फर्क नहीं पड़ता कोई साथ रहे या ना
बस किसी के साथ पाने के लिए
खुद को नहीं बदलती
मैं कभी जरूरत से ज्यादा अच्छी नहीं होती
मैं जैसी हूं
उसे समाज में अमर्यादीत कहते हैं
पर मेरा एक सवाल है अखिल मर्यादित होना क्या है
क्या खुद को मार कर
दूसरे के लिए सुख का कामना करना मर्यादित है
क्या खुद की ना सम्मान कर के
बड़ों की बातों की सम्मान रखना मर्यादित है
बस इसलिए कि वह बड़े हैं अपने हैं
चाहे उसके लिए खुद की सांस गिरवी क्यों न रखने पड़े
क्या मर्यादित उसे कहते हैं
जो मुंह पर अच्छे बनते हैं
और पीठ पीछे बुराई करते हैं
क्या मर्यादित होना इसे कहते हैं
जो किसी को ना नहीं कहते
चाहे उसके लिए खुद को दर्द क्यों ना हो
क्या मर्यादित उसे कहते हैं
समाज के हिसाब से जिंदगी गुजर दे
चाहे खुद को पता चल ही ना कि
वह कौन है
और क्यों जी रही है
अगर मर्यादित होना उसे कहते हैं
जो दूसरों के लिए
अपनी जिंदगी को बर्बाद कर दे
अपने होने ना होने की खबर जाने बिना
तो मै अमर्यादित स्त्री ही सही
और मुझे कोई शौक नहीं है
समाज के हिसाब से चलने की
और उनके नज़रों में मर्यादित पूर्व शांति स्त्री बनने की
मुझ में तूफान है अंगार है एक धधकती हुई ज्वाला है
जो शांत नहीं जो पूझा नही
वह ठहेर ठहेर कर ऊठती रहती है धधकते रहती है
वह खुद को ढूंढने के लिए
किसी भी हद तक गुजारना हरदम तैयार रहती है
हां मैं अमर्यादित स्त्री
क्योंकि मुझे खुद को थोड़ा और जानना है
और खुद ढुंढ कर पा कर
खुद को पूरी तरह खुद का ही कहना है
हां मैं हुं आमर्यादित स्त्री