शब की तन्हाइयों में एक जाम उठा लिया है,
सुब्ह तक के लिए ग़मों को भुला दिया है।
जो ज़हर बन के रूह में उतरता था कभी,
आज उसी नशे ने ज़ख्मों को सुला दिया है।
मज़हब क्या है, इबादत क्या, ये कौन जाने,
मैखाने के सजदे ने खुद से मिला दिया है।
ठोकरें खाईं तो समझ आया हकीकत-ए-दुनिया,
तजरबों ने इस दिल को एक और जाम पिला दिया है।
बस्तियां जलती रहीं, हम होश में थे ही नहीं,
इस बे-ख़ुदी ने वक़्त को बहुत धुंधला दिया है।