'अंतिम विदाई'
कविता
'अंतिम विदाई' शब्द सुनते ही
रूह काँप जाती है सोचकर।
कोई किसी को कितना ही
प्यारा क्यों ना हो, लेकिन
शरीर के मरते ही भाव
बदल जाते हैं सबके।
नाम गुम हो जाता है,
जल्दी रहती है सबको
क्रिया-कर्म निपटाने की।
'बॉडी' को हाथ लगाने
से भी डरते हैं लोग।
जीते जी तो समय दिया नहीं,
मरने के बाद भी जल्दबाजी
करते हैं सभी अपने भी।
वो जमाना भी याद आता है
जब जुट जाता था खास-ओ-आम,
सारा मोहल्ला अंतिम विदाई में।
आज अपने भी नहीं आते,
वीडियो कॉल से दर्शन करते
दो आँसू बहाते और भूल जाते।
समय सबका आना है,
एक दिन सबको जाना है,
फिर भी घमंड लोगों को।
यह मोह माया सब
यहीं रह जाना है।
--- डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली