*मेघों के बाद*
मैं से ‘मेरा’जाता,
हम से ‘हमारा’ भी बचा
अहं तो था धरती को भी,
सुगंध भरी रंगीनी का ।
झीने मेघों की ओट में,
सांझ का प्रौढ़ सूर्यास्त
फीका आसमाँ भी हो गया रंगीन ।
अहंकार था इस धरती को
इन मेघो ने मुख क्या मोड़ा ,
हो गई धरती रंगीन से रंगहीन ।
✍️ श्रवण कुमार