एक अधूरी मुस्कान का मलाल
लगभग एक महीना पहले मेरी दुकान पर एक बच्चा आया था। उसकी उम्र कम थी, चेहरे पर मासूमियत थी और आँखों में एक सपना। वह एक बास्केटबॉल किट लेने आया था। वह उसे बहुत पसंद कर रहा था, शायद काफी समय से लेने की इच्छा भी रखता था।
लेकिन कुछ देर बाद उसके माता-पिता ने वह किट नहीं खरीदी। बच्चा चुप हो गया। उसके चेहरे की चमक अचानक फीकी पड़ गई। उसकी आँखों में जो उदासी थी, वह आज भी मेरे मन में कहीं ठहरी हुई है।
मैं सिर्फ एक सेल्समैन हूँ, दुकान का मालिक नहीं। उस दिन मेरे मन में बार-बार यही विचार आया कि काश मैं मालिक होता। शायद मैं उसे वह किट दे पाता, या कम से कम कुछ समय के लिए उसके चेहरे पर मुस्कान ला पाता।
मुझे दुख इस बात का नहीं कि एक सामान नहीं बिका। दुख इस बात का है कि एक बच्चे की छोटी-सी खुशी मेरी आँखों के सामने अधूरी रह गई और मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सका।
एक महीने बाद भी उस बच्चे का उदास चेहरा याद आता है। शायद इसलिए कि कभी-कभी इंसान को किसी अनजान व्यक्ति के लिए भी उतनी ही संवेदना महसूस होती है, जितनी अपने लोगों के लिए।
कुछ मुस्कानें बहुत छोटी होती हैं, लेकिन उनका अधूरा रह जाना दिल में लंबे समय तक एक मलाल छोड़ जाता है।