अंतहीन अकेलापन
कविता
अंतहीन अकेलापन
परी सुखा और बंजर जमीन
और आसमान में करारे के धूप
दूर दूर तक कोई हरियाली नहीं
कोई समुद्र नहीं
ना बारिश आने की कोई उम्मीद है
ऐसा लग रहा है कि रेगिस्तान में
भुखे प्यास गिरते पड़ते मुसाफिर चल रहा है
बिना कोई आश के
बस उम्मीद लिए
कही बंजर जमीन खत्म हो जाए
और हरियाली दिखे
कहीं रेत के किनारा मिले
और समुद्र देखें
कहीं मौसम बदले कढ़ी धूप को बादल ढक ले
और बारिश हो जाए
और इस बेजान शरीर में जाना आऐ गे
कहीं तो अनाज का एक निवाला भी
एक टुकड़ा भी मरते हुए आत्मा को नसीब हो
इस अंतहीन अकेलेपन में बस चलते रहना उम्मीद किए हुए डरावना लगता है
और इस डरावनी सफर से गुजरना नामुमकिन है
फिर भी यह जिंदगी है
बस नामुमकिन सफर पर चलते रहना
मंजिल का कोई ना किनारा पाना
बस अकेले अपने दर्द गम तन्हाई की बोझ को ढोते रहना
सबसे बड़ी नाइंसाफी है
जिंदगी मिलने के बाद एक प्राणी के लिए
फिर भी कुदरत अपनी फितरत नहीं बदलते
ना हीं किसी पे रेहेम दिखाते हैं
और हम बस जीते रहते हैं
इस अंतहीन आस लिए
जिसका कोई मतलब ही नहीं