“कुछ लोग पूछते हैं—
‘अरे, तुम्हारी तो बहुत इज़्ज़त थी…
ये क्या हो गया तुम्हारे साथ…?’
फिर वही लोग,
मेरी कहानी पर हँसते हैं,
मेरे जख्मों पर सवाल नहीं…
मज़ाक करते हैं… 💔
मैं जवाब नहीं देती…
क्योंकि मुझे पता है,
उन्हें सच नहीं—
बस तमाशा चाहिए…
हाँ, मैं अकेली हूँ…
और वो सब एक झुंड हैं…
शायद इसलिए उन्हें लगता है कि मैं हार रही हूँ…
पर सच ये है—
भीड़ हमेशा शोर करती है,
और सच्चाई… खामोशी में भी जीत जाती है… ✨🖤
— मैं हार नहीं रही,
बस सही समय का इंतज़ार कर रही हूँ…
❤️ जो समझते हैं, उन्हें शब्दों की जरूरत नहीं…