उपवन होने का गुमान हो गया है तुम्हें लेकिन सच तो ये है कि एक फूल भी नहीं हो तुम ।
कल्पवृक्ष होने का वहम पाले बैठे हो तो ठीक से पहचान लो कि बबूल भी नहीं हो तुम ।
स्वयं को शिखर कलश मानते हो पर धर्म की धरोहर का मूल भी नहीं हो तुम ।
मुझमें दोष निकालने वालो ख़ुद को भी परख लो तुम
क्योंकि मुझे आँक सको इतने भी मुकम्मल नहीं हो तुम।
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- उषा जरवाल