यादें ही काफ़ी हैं तेरी, मिलने की अब दरकार नहीं,
दिल ने ओढ़ ली तन्हाई, अब किसी से इज़हार नहीं।
ख़्वाबों में जो रोज़ आया करते थे तुम बेख़बर,
हक़ीक़त ने सिखा दिया, हर सपना सच्चा यार नहीं।
लफ़्ज़ों में समेट रखा है, मैंने तुझसे हर एक पल,
काग़ज़ ही गवाह है अब, कोई और हथियार नहीं।
तू पास नहीं तो क्या ग़म है, एहसास अभी ज़िंदा है,
यादों के इस शहर में, दूरी भी लाचार नहीं।
हमने छोड़ दी है चाहत, फिर भी शिकायत कैसी,
जो अपना न बन सका, वो दिल का अपराध नहीं।
यादें ही काफ़ी हैं तेरी, जीने का सबब बनकर,
अब किसी नए अफ़साने की दिल को दरकार नहीं।