पाकिस्तान में किसका शासन है? मौलवियों का , इमरान खान का या सेना का?
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आजादी के समय सेना के जनरलों को ब्रिटिश-अमेरिकन एलिट का समर्थन प्राप्त था, अत: पाकिस्तानी जनरलों एवं जमींदारो ने आपस में गठजोड़ बनाकर सत्ता सूत्र अपने हाथ में ले लिए थे. अमेरिकी हथियार निर्माताओं से गठजोड़ होने के कारण वहां सेना ताकतवर होती चली गयी और राजनेता कभी पनप नहीं पाए. 1947 के बाद से पाकिस्तान का सारा इतिहास राजनैतिक इतिहास राजनेताओ एवं सेना के बीच घर्षण का इतिहास है.
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अभी हाल ही में पाकिस्तान के किसी रिटायर्ड जनरल ने कहा था कि, 1947 से आज तक सेना में जनरल की नियुक्ति हमेशा अमेरिका की अनुमति से ही होती रही है.
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2010 से पाकिस्तान की सेना में चीन का दखल बढ़ने लगा, और अब पाकिस्तान की सेना के जनरल हथियारों के लिए दोनों देशो (चीन+अमेरिका) पर निर्भर है. समय गुजरने के साथ पाकिस्तान की सेना का झुकाव चीन की तरफ बढ़ता जा रहा है. जैसे जैसे भारत-चीन के बीच विवाद बढेगा वैसे वैसे पाकिस्तान के सैन्य अधिकारियों को फैसला करना पड़ेगा कि उन्हें किस तरफ जाना है – चीन की तरफ या अमेरिका की तरफ. और ज्यादातर सम्भावना है कि वे चीन की तरफ चले जायेंगे.
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(1) पाकिस्तान की सेना का प्रभाव क्षेत्र
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पाकिस्तान के सामरिक मामलो में निर्णायक फैसला सेना ही करती है. यदि राजनेता सेना को नियंत्रित करने की कोशिश करता है तो सेना और नेता में घर्षण बढ़ जाता है, और हमेशा सेना की ही चलती है. 1947 में जब पाकिस्तान की सेना ने (कबिलाइयो के नाम पर) कश्मीर पर हमला किया था तो खुद जिन्ना को इसके बारे में जानकारी नहीं थी !!
Jinnah: A Life
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1965 में भी हमले की योजना जनरल अयूब ने बनायी थी और कारगिल घुसपैठ का फैसला भी मुशर्रफ ने किया था. नवाज शरीफ को मालूम तक नहीं था कि पाकिस्तान की फौजे कारगिल पर चढ़ाई कर रही है.
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पाकिस्तान का पेड मीडिया सेना के नियंत्रण में है, और अमेरिकी धनिकों का सेना के माध्यम से इस पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण है. अब इस पर चीन का नियंत्रण भी बढ़ रहा है.
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पाकिस्तान के आम नागरिको में सेना की कद्र है. और कद्र इसीलिए है क्योंकि पेड मीडिया के माध्यम से उनके दिमाग में यह बात डाली गयी है कि भारत का एक मात्र उद्देश्य पाकिस्तान को तबाह करना है, और सिर्फ सेना के कारण ही पाकिस्तान अब तक बचा हुआ है !! लेकिन पाकिस्तान के राजनैतिक रूप से सूचित कार्यकर्ताओ का वर्ग इस बात से परिचित है कि पाकिस्तान की सेना ने शासन के सूत्र अपने हाथ में रखने के लिए भारत के डर का हव्वा खड़ा किया हुआ है, और सेना की इस नीति ने पाकिस्तान को बर्बाद कर दिया है.
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(2) पाकिस्तान में मौलवियों का प्रभाव :
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इस्लाम में गेदरिंग की प्रक्रिया होने के कारण वहां पर समुदाय के आपसी संवाद का एक व्यवस्थित ढांचा (Network) बना हुआ है, और गेदरिंग की प्रक्रिया के कारण वहां पर मौलवी धार्मिक-सामाजिक-राजनैतिक स्तर पर काफी शक्तिशाली है. इस तरह वहां पर आंतरिक मामलो में नागरिको की राय को मोटे तौर पर 2 फेक्टर प्रभावित करते है :
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पेड मीडिया
गेदरिंग
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गेदरिंग का विकेन्द्रित नेटवर्क होने के कारण वहां पर जिन मुद्दों पर पेड मीडिया एवं मौलवियों में मतभेद होता है, वहां पर पेड मीडिया नागरिको को प्रभावित नहीं कर पाता.
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इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि, नागरिको के पास सम्प्रेषण का एक अतरिक्त नेटवर्क होने के कारण पाकिस्तान में पेड मीडिया कम ताकतवर है. और यह एक बड़ी वजह है कि पाकिस्तान का लगभग प्रत्येक नागरिक एंटी-अमेरिका है, और इस सच्चाई से वाकिफ है कि उन्हें अमेरिका की सेना से खतरा है.
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नकारात्मक पक्ष यह है कि, वहां के मौलवी इतने अतार्किक एवं धर्मांध है कि पाकिस्तान के नागरिको को अतिरिक्त दुश्मनों की जरूरत नहीं है. मौलवियों की अतार्किकता एवं कट्टरता ने नागरिको को खड्डे में डाला हुआ है.
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तो इस तरह पाकिस्तान में सामरिक एवं अंतराष्ट्रीय मामलों में सेना का शासन है, और आंतरिक-सामाजिक-धार्मिक-सामुदायिक फैसलो को मौलवी एवं धार्मिक गुरु प्रभावित करते है.
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[ इस्लामिक देशो में गेदरिंग की प्रक्रिया होने के कारण पेड मीडिया नागरिको को गिरफ्त में नहीं ले पाता और इस वजह से अमेरिका को जब भी इस्लामिक देशो के प्राकृतिक संसाधनों का अधिग्रहण करना हो तो उन्हें सेना की जरूरत होती है !! ईराक, ईरान, अफगानिस्तान से लेकर लीबिया और सीरिया तक इसके उदाहरण है.]
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(3) पाकिस्तान में राजनेताओ एवं सरकार का प्रभाव :
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पाकिस्तान में राजनेता हमेशा कमजोर स्थिति में रहे है. इसकी निम्न वजहें है :
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निरंतर चुनाव न होने की वजह से नेता के उभरने एवं जनाधार (Network) बनाने के अवसर सिकुड़ जाते है.
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राजनेताओ को लगातार मौलवियों के नेटवर्क से निपटना होता है. और मौलवियों के पास नागरिको से संवाद स्थापित करने के लिए गेदरिंग के रूप में ज्यादा प्रभावी और व्यवस्थागत नेटवर्क है.
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पेड मीडिया पर राजनेताओं का नियंत्रण नहीं है.
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पाकिस्तान की सेना के जनरल सीधे अमेरिकी धनिकों को रिपोर्ट करते है, अत: राजनेता सैन्य अधिकारियों को टेक ओवर नहीं कर पाते
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इस स्थिति में वहां पर सत्ता में वही नेता टिक पाता है जिसे या तो सेना का समर्थन प्राप्त हो या फिर वह सीधे अमेरिकी धनिकों की गुड बुक में हो. और यदि नेता अपनी सीमा से बाहर जाता है तो सेना टेक ओवर कर लेती है. इमरान खान भी सेना के नियंत्रण में है, और महत्त्वपूर्ण फैसले लेने के लिए स्वतंत्र नहीं है. इस समय की सरकार एवं सेना के बीच कोई टकराव नहीं है.
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यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि, वहां की सरकार / राजनेता एवं सेना मिलकर भी अवाम को पूर्ण रूप से नियंत्रित नहीं करते. क्योंकि वहां पर मौलवियों की सत्ता काफी मजबूत है. पाकिस्तान में लॉकडाउन इसीलिए असफल रहा.
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अमेरिकी धनिक भारत की तरह पाकिस्तान में भी लॉकडाउन चाहते थे, और उन्होंने सेना, सरकार और मीडिया की सहायता से लॉकडाउन डालने के प्रयास किये. किन्तु मौलवियों के नेटवर्क ने लॉकडाउन की बेंड बजा दी. इसके उलट भारत में पेड मीडिया नागरिको को लॉकडाउन के पक्ष में कन्विंस करने में सफल रहा, और यह भी समझाने में कामयाब रहा कि, लॉकडाउन डालकर कई जानें बचा ली गयी है !!! ( यह पेड मीडिया की ताकत है.)
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भारत :
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भारत में पेड मीडिया शुरू से काफी ताकतवर रहा है. अत: अमेरिकी-ब्रिटिश धनिक पेड मीडिया की सहायता से नागरिको की राय को नियंत्रित करते है और यह सुनिश्चित करते है कि कौन नेता सत्ता में आएगा. 73 साल में से इंदिरा जी एवं शास्त्री जी के कार्यकाल को निकाल दें तो शेष 55 वर्षो तक सभी नेता पेड मीडिया की सहायता से ही सत्ता में आये है, और पेड मीडिया की सहायता से ही टिके रहे है.
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1990 से पहले तक भारत में पेड मीडिया का नियंत्रण अप्रत्यक्ष था, और 2001 में ऍफ़डीआई आने के बाद यह प्रत्यक्ष हो गया है. आज भारत में पेड मीडिया सबसे ताकतवर है, और वे ही भारत के राजनेताओं एवं नागरिको की राय को पूर्ण रूप से नियंत्रित करते है. इस तरह भारत में सत्ता पूरी तरह केंद्रीकृत है, और इसके सूत्र पेड मीडिया के प्रायोजको के पास है.
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