प्रेम या छलावा।।
तुमसे प्रेम करना,
मेरे जीवन में आई तमाम नकारात्मकताओं के बाद भी
बची हुई ईश्वर की आरती-सी शुद्धता है
जिसकी तपिश न सही राख भी मेरे लिए घर ले जाना सोना है।
हृदय के किसी कोने में
मेरा अस्तित्व बनकर बस गया है तुम मुझमें।
ये ठीक वैसा ही है—
जैसे जीवन की भागदौड़ से थका व्यक्ति
अचानक अपने भीतर का जज़्बा फिर से पा ले।
ये वैसा ही है—
जब कोई तेज़ हवा सब कुछ उजाड़ कर चली जाए,
फिर भी मन में
पुनः बसाने, संवारने की चाह छोड़ जाए।
ये वैसा ही है
जहाँ पीड़ा, वैराग्य, विरह, वेदना
जैसे सब शब्द हार मान लेते हैं,
क्योंकि मेरे हृदय में
तुम्हारे नाम का प्रेम
हर बार जीत जाता है।
उस क्षण से
जब शायद पहली बार तुम्हारा ख्याल सहेजा होगा मैंने अपने किसी बाल्यकाल में,
या उस पल से
जब खिलाया होगा पत्तों का पहला निवाला तुम्हे खेल खेल में।
या उस समय से—
जब मिलन का कोई अनकहा संयोग रचा होगा हमने।
हाँ, उस पल से भी—
जब तुम्हारी कमियाँ, खामियाँ देखीं होगी मैंने,
और फिर भी उन्हें
दुनिया से छुपाकर
अपने भीतर ही सहेज लिया होगा।
और एक बार फिर,
पूरे सहृदय से तुम्हें अपनाया मैंने।
मैं हर बार
इसी तरह अपनाऊँगी तुम्हें—
सदैव अपनाती रहूँगी,
तुममें छुपे “हम” को।
क्योंकि तुम्हें अपनाना
कोई बदलाव नहीं—
ये मेरा चुनाव है,
मेरे भीतर छुपे “मैं” का चुनाव।
मै हर बार हार जाती हूं,
तुम्हारी इस निष्ठुरता से
तुम मेरे भीतर सदैव जीत जाते हो
हमारे भीतर छुपी कोमलता से।
ये कहना यक़ीनन अतिश्योक्ति होगी
की मुझे तुम से प्रेम है शिव
ये मानवीय उपकरणों से वशीभूत नहीं होता
जरूर कुछ दैवीय है शिव।
इसलिए मुझे तुमसे प्रेम नहीं है
कदापि नहीं
यह तो केवल छलावा है
मेरा,मुझसे किया गया सबसे बड़ा छल।
Softrebel
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