॥ बाहुबली महाबली ॥
रणभेरी बजी, धरा कांपी, अंबर में घोर निनाद हुआ,
दो वीरों का, दो भाइयों का, रण-मद में महाविवाद हुआ।
इक ओर चक्रवर्ती भरत, सेना का पारावार लिए,
दूजी ओर बाहुबली खड़े, निज भुजदंडों का सार लिए।
अरिहंत-पुत्र, समरांगण में, ज्यों महाकाल अवतारे थे,
सौ योजन चौड़ी छाती थी, या पर्वत के कगार थे?
जब उठी मुष्टिका अंबर को, थर-थर बुजदंड कपांयमान,
सुर-असुर, देव-गंधर्व सभी, रह गए देखकर हक्का-बक।
दृष्टि-युद्ध में तेजपुंज, ज्यों रवि ने रश्मि त्यागी हो,
जल-युद्ध में वेग प्रचंड, मानो सागर ने मर्यादा लांघी हो।
मल्ल-युद्ध में जब भिड़े वीर, सिंहों का जैसा नाद हुआ,
भरत का चक्र भी कुंठित था, यह अचरज भरा संवाद हुआ।
थी शक्ति अपार, विजय द्वार, बस एक प्रहार की दूरी थी,
अहंकार शीश पर चढ़ा हुआ, प्रतिशोध की ज्वाला पूरी थी।
पर तभी, तभी इक क्षण को, चेतना जगी, अंतर्मन जागा,
यह राज-पाट, यह मोह-जाल, क्षणभंगुर सब, मिथ्या भागा।
"धिक्कार! विजय यह कैसी है? अपनों के लोहित तर्पण पर?
क्या यही अंत है जीवन का? मिट जाना सिंहासन पर?"
उठी मुष्टिका जो वध को, वह लोच-मुंड को मुड़ गयी,
क्षणभर में चक्रवर्ती की सत्ता, धूलि में उड़ गयी।
महाबली ने त्यागा पल में, वह सब जो जग को प्यारा है,
साम्राज्य, कोष, वैभव सारा, तिनके सम वारा है।
खड़े हुए गोमट्टेश्वर, निश्चल, ज्यों अचल हिमालय हों,
भुजदंडों पर बेलें लिपटीं, सर्पों के ज्यों आलय हों।
एक वर्ष तक अडिग खड़े, नयन बंद, तप में लीन रहे,
शीत-घाम, दंश-विष, सब सहे, पर निज आत्म-लीन रहे।
जीता न कोई बाहुबली को, पर वे स्वयं से जीत गए,
अहंकार का मस्तक मर्दन कर, वे सिद्ध-लोक को रीत गए।
वह वीर नहीं जो रण जीते, वह वीर जो मन को जीत सके,
बाहुबली! तुम वो महाबली, जो हर युग की प्रीत बने।
त्याग और वैराग्य के स्वामी, नमन तुम्हें शत-शत बार,
तुम सा न कोई हुआ वीर, न होगा यह जग-संसार।
Adv. आशीष जैन
7055301422