परवाज़
मैंने ज़मीन से नहीं,
अपने डर से विदा ली थी
जब पहली बार
ख़्वाबों ने
परवाज़ माँगी।
पंख काग़ज़ के थे
आसमान तंज़ करता था,
हवा कहती थी—
अभी ठहर जाओ,
मगर दिल को
रुकना नहीं आता था।
हर गिरना
एक सबक़ बना,
हर चोट ने
ऊँचाई का पता दिया—
मैं समझ गया
उड़ना हुनर नहीं,
हिम्मत की आदत है।
आज भी
उड़ान पूरी नहीं,
पर यक़ीन पूरा है—
जो ख़ुद पर भरोसा कर ले
उसे परवाज़
इजाज़त नहीं,
रास्ता देती है।
आर्यमौलिक
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