Hindi Quote in Poem by Deepak Bundela Arymoulik

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आज़ादी या अंधापन?
कल तक मर्द की शान कहलाती थी
कई देहों की गिनती,
रिश्तों पर रखी गई धूल,
और वासना का खुला जुलूस।
आज वही भूख
दूसरे चेहरे पहनकर चल रही है,
घर के खाने से ऊबी ज़बानें
अब रिश्तों को बेस्वाद बताने लगी हैं।
फर्क बस इतना है—
पुरुष डरता था,
संतुलन साधता था,
दो नावों पर पैर रख
डूबने से बचने की जुगत करता था।
और आज—
कुछ स्त्रियाँ प्रेम नहीं,
सत्ता खोज रही हैं,
झूठे मुक़दमे को ढाल,
और क़ानून को हथियार बना रही हैं।
प्यार के नाम पर
ख़ून की साज़िश,
साथ के नाम पर
मौत की योजना—
यह कैसी मुक्ति है बहन?
क़ानून ने रास्ता दिया था
सम्मान से जीने का,
न कि किसी के घर का
दीपक बुझाने का।
अगर जाना ही था
तो खुली हवा थी,
क़ानून की छाया थी—
फिर ये जेल की सलाखें
क्यों चुनीं?
माता-पिता की लाज,
सीधे-सादे पति की साँसें,
और समाज की नींव—
सब कुछ गिरवी रख
बस एक रात की कीमत पर?
यह कविता आरोप नहीं,
आइना है—
उन सबके लिए
जो सुरक्षा को
स्वेच्छाचार समझ बैठे हैं।
सोचो,
क़ानून अगर कमज़ोर हुआ
तो सबसे पहले
औरत ही असुरक्षित होगी।
आज़ादी जिम्मेदारी माँगती है,
और न्याय विवेक।
जय हिंद 🇮🇳

☀️आर्यमौलिक

Hindi Poem by Deepak Bundela Arymoulik : 112013658
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