बिना सिंध के हिन्द कहाँ है, रावी बिन पंजाब नहीं,
गंगा कैसे सुखी रहेगी, जब तक संग चिनाब नहीं।
लाहौर बिना तो संविधान की, हर बात अधूरी है,
बिना करांची कैसे कह दें—यह आज़ादी पूरी है।। 1
यह नक़्शों की ज़िद नहीं है, यह मिट्टी की पहचान है,
हर रेखा के नीचे दबा, एक अनकहा अरमान है।
जो बाँटा गया था सियासत में, वह आत्मा में आज भी एक है,
इतिहास बँट सकता है शायद, पर संस्कार नहीं बिखरते कभी नेक है।। 2
सरहदें सत्ता की चाल हैं, दिलों की नहीं दीवार,
जो तोड़ न सकीं संस्कृति को, वो क्या रोकें अधिकार।
काबुल से काशी तक कभी, एक ही चेतना बहती थी,
वेदों की ऋचा, सूफ़ी का कलाम—एक सत्य ही कहती थी।। 3
मैं युद्ध का नारा नहीं हूँ, न खून की भाषा जानता हूँ,
मैं घावों पर मरहम रखकर, इतिहास को समझाता हूँ।
जहाँ सच बोलना देशद्रोह नहीं, साहस की पहचान बने,
जहाँ भारत होना विचार हो, जो मानवता का मान बने।। 4
पेशावर की हवाओं में भी, वही मिट्टी की खुशबू है,
जो वृंदावन की गलियों में, आज भी जीवित जादू है।
नाम बदले, झंडे बदले, बदलीं सिर्फ़ मजबूरियाँ,
वरना आत्मा आज भी कहती है—हम एक ही पुरखों की धड़कनियाँ।। 5
अखंड भारत कोई सपना नहीं, यह सोई हुई चेतना है,
यह तलवार नहीं, यह सत्य है, जो हर युग में प्रेरणा है।
जिस दिन भय से मुक्त खड़ा होगा, जाग्रत हर नागरिक,
उस दिन गिर जाएँगी सीमाएँ, संस्कृति होगी अंतिम लिखित।। 6
मेरा भारत वह नहीं जो जीते, मेरा भारत वह है जो जोड़े,
जो बदले की आग नहीं, बल्कि विवेक के दीप को रोशन छोड़े।
जिस दिन हम डर से नहीं, धर्म से नहीं—सच से जुड़ेंगे,
उसी दिन मेरा अखंड भारत होगा—पूर्ण, निर्भय, चिरंजीवी, अटल रहेंगे।। 7
— जतिन त्यागी 'राष्ट्रदीप'