राष्ट्र पहले—ये नारा नहीं, श्वास है,
मेरी हर धड़कन में इतिहास है।
जो देश के आगे झुके, वो मैं नहीं,
युवा हूँ—और यही मेरा विश्वास है।। 1
हम भीड़ नहीं, हम चेतना हैं,
हम मौन नहीं, हम प्रश्न हैं।
जो गलत है, उसे गलत कहें,
इतनी-सी ही हमारी रचना है।। 2
न मलाई की चाह, न कुर्सी का मोह,
न झूठी तालियों का खोखलापन।
हमें चाहिए बस न्याय का पथ,
और पसीने से उपजा स्वाभिमान।। 3
हम थके ज़रूर, पर टूटे नहीं,
अंधेरों से समझौता सीखा नहीं।
जहाँ तंत्र रुका, वहीं खड़े हुए,
क्योंकि युवा कभी झुका नहीं।। 4
मोबाइल की रोशनी में पले सही,
पर मिट्टी-सूरज की क़ीमत जानते हैं।
हम रील नहीं, हम रियल हैं,
जो जलकर दीपक बन जाते हैं।। 5
निराशा फैलाई जाती रही,
पर उम्मीद हमने बोई है।
भारत माँ को मज़बूत बनाना,
इस पीढ़ी की सामूहिक जिम्मेदारी हुई है।। 6
आज युवा बोले—देश सुने,
अब समय टालने का नहीं।
राष्ट्रदीप जल उठा है हाथों में,
भारत रुके—इतना छोटा नहीं।। 7
— जतिन त्यागी (राष्ट्रदीप)