सौदेबाज
वफ़ा का नाम लिया, पर दग़ा ही करती रही, मोहब्बत की आड़ में सौदा ही करती रही।
हवस की भूख थी, चाहत का कोई सिलसिला न था, लबों से इश्क़ कहा, तन का ही ज़िक्र करती रही।
मौक़ापरस्त निकली, हरदम बदलती रही लडके, जो जेब को भरना था, हम को लुटती रही।
तेरी नज़र में बाल सवारना और पैसे की चमक, मोहब्बत को बेच डाला, लालच का सौदा करती रही।
तू बेवफ़ा न थी, बल्कि इक तमाशा थी, कभी ग़रुरत कहती, कभी वादा तोड़ती रही।
अब दुआ यही है, मिले तुझे वैसा ही जवाब, जिस तरह दिलों को तोड़ा, वैसे ही रोती रही।