किसी से प्रेम होते ही पुरुष समाहित हो जाना चाहता है उसमें, जैसे नदी नाले समा जाते हैं किसी समुद्र में..वहीं प्रेमिका पहले उसे समझती है, जैसे कारीगर समझता है किसी धातु के स्वभाव को..
प्रेमी और प्रेमिका के प्रेम में यही अंतर है कि प्रेमी अगले पल से ही सब कुछ लुटा देना चाहते हैं अपना, वहीं प्रेमिका जानती है कि उसका किसी पर भी सब कुछ लुटा देना इतना आसान नहीं है, इसीलिए उसे समय लगता है..परंतु एक बार जब प्रेमिका को ये विश्वाश हो जाता है कि उसने सही शख्स से प्रेम किया है उसके बाद प्रेमी कभी भी प्रेमिका द्वारा उसके लिए किए जाने वाले त्यागों की बराबरी नहीं कर पाता है...
और प्रेमिका कभी भी इस बात को नकार नहीं सकती है कि उसके प्रेमी ने उसपर अगले पल से ही अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया था..जबकि अभी वो उसके असली स्वभाव को ढंग से जानता भी नहीं था..
समय बीतता जाता है, एक दिन सब कुछ ख़त्म होने को आता है, प्रेमी गिनाने लगता है अपने सारे एहसान, हर छोटी छोटी चीज जो उसने अपनी मर्जी से की थी प्रेमिका के लिए..वहीं प्रेमिका चुपचाप सब कुछ सुनती है, और उसकी बातों का जवाब दिए बिना ही, अलविदा कहे बिना ही कहीं गुम हो जाती है..
प्रेमी की बातों का जवाब दिए बगैर जाना प्रेमी को इस घमंड में रखता है कि प्रेमिका के पास कोई जवाब नहीं था उसकी बातों का..
वहीं प्रेमिका बस इसीलिए चुप थी क्योंकि वो जानती थी कि जो साथ रहकर उसके त्यागों को या उसके समर्पण को नहीं समझ पाया, उसे ये सब गिना कर तो कतई नहीं समझाये जा सकते हैं..
फिर एक दिन सब कुछ ठीक नहीं होता है, एक दिन सब कुछ ख़त्म हो जाता है..!!