तूफानों को कहां हमारी खामोशी पसंद थी
उन्हें हमारे घरोंदे की वो कच्ची छत पसंद थी।
चलने वाले हैं जो दूर तक वो कहाँ रास्ते पूछते हैं
उन्हें बस हमारे गरीबखानें कीं कुंजियां पसन्द थीं।
तुम्हें छुपछुपकर मिलना हमारी खानदानी ही थी
दुश्मनों ने हमें बुज़दिल बताया और तुम खामोश थीं।
न सलतनत बसाने के ख्वाब थे न कोई महंगी दरकार थी
कब्र पर छोटी सी "प्रेमी" की तख्ती लगे इतनी सी बात थी।
महेंद्र शर्मा