तुम्हें ढूंढता हूँ, सजल विधा
जब तुम गांव की बांट पर नंगे पांव चलती हो ,
तब मैं माटी की नर्म स्पर्श में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम पांव से ओश बिंदु को सहलाती हो ,
तब मैं शुद्ध बूंदो के चमक में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम मक्के की फसलों को सहलाती हो ,
तब मैं पत्तों की सरसराहट में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम पीले सरसों के खेतों में युंही दौड़ती हो ,
तब मैं श्वासों की तेज धड़कन में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम खुशी से पल्लू हवा में लहराती हो ,
तब मैं हवा के शांत झोंको में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम पके जुवार के हुँडा भूनकर खाती हो
तब मैं दरांँती से कटे ठूठ में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम चूल्हे पर बाजरे की रोटी पकाती हो ,
तब मैं खाने के पुराने स्वाद में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम कुएं से पानी रस्सी से निकालती हो ,
तब मैं प्यासा मुसाफ़िर बनकर तुम्हे ढूंढता हूँ |
जब तुम मटके को कमर से ठुमकाती हो ,
तब मैं अल्हड़ प्रेमी सा केवल तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम 'छिछोरा छोरा' कहकर डांटती हो ,
तब मैं स्नेह की गहरी झील में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम प्रतिक्षा की राह में घड़ीभर ठहरती हो ,
तब मैं मिलन की लंबी दूरी में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम जंगली पुष्प बालों में सहज लगाती हो ,
तब मैं खुश्बू की तीव्र खींचाव में तुम्हें ढूंढता हूँ |
जब तुम साल-पलाश के पत्तों से कुटिया बनाती हो ,
तब मैं प्रकृति की असीम सादगी में तुम्हें ढूंढता हूँ |
©®- शेखर खराड़ी
तिथि- ७-९-२०२६