चाटुकार पा लेता वैभव, झूठी महिमा गा-गाकर,
सफल दिखाई देता जग में, निज गरिमा को ठुकराकर।
किंतु स्वाभिमानी मानव तो, निज सिद्धांतों पर अड़ता है,
बिना लोभ के कठिन डगर पर, सीना ताने बढ़ता है।
झुकता नहीं प्रलोभन आगे, मन की गरिमा रखता है,
कष्ट सहकर भी वह जग में, सच्चा आदर चखता है।
चाटुकार की क्षणिक सफलता, अंत समय मिट जाती है,
स्वाभिमानी की पावन गाथा, युग-युग तक मुस्काती है।