प्रकृति को समानता रखनी होती तो सबके चेहरे एक जैसे बना देती, सबका रंग एक सा कर देती, सब एक जैसी ऊँचाई के रहते, सबकी भूख प्यास एक जैसी होती। प्रकृति विकास के सिद्धांत पर चलती है, गुणवत्ता जिसमें है वो ऊपर रहता है बाकी उससे नीचे। समानता सँभव नहीं है, असमानता ही शाश्वत सत्य है।