मुझे पता है कि मेरी रुचि कहाँ है, और मुझे क्या करना है और जब अथक प्रयास करके भी वहाँ तक नहीं जा सका और कारण खोजे तो ऋणानुबंध समझ आये। इसपे काम करना आरम्भ किया तो गाँठें खुलने लगीं। रुचियों, इच्छाओं से अधिक महत्व प्रारब्ध रखते हैं; स्वीकार ही करना पड़ता है। कोई विकल्प नहीं है।