भिन्न धारा के पुष्प
भिन्न धारा के पुष्प सभी,
एक चमन की शान हैं।
मन से मन के सेतु बँधे,
संगठित भारत का अरमान हैं।
अंधियारे से हटकर देखो,
स्वर्णिम कल को साकार देखो।
नव सूर्य का उदय करें,
विश्वगुरु को अमर करें।
हर प्रांत के अनेक विशिष्ट गुण,
प्रतिभाशाली-सा युवा खड़ा है।
कर्मभूमि का शिरोमणि जो,
प्रकाश-पुंज-सा अड़ा हुआ है।
माटी की हो करुण पुकार,
या अंतरिक्ष की हुंकार।
हिमालय की दहाड़ है,
माँ भारती की पुकार है।
जाग युवा! अब शस्त्र उठा,
मनोभूमि को बाँध ज़रा।
क्योंकि—
भिन्न धारा के पुष्प सभी,
एक चमन की शान हैं।
मन से मन के सेतु बँधे,
संगठित भारत का अरमान हैं।
by: Sneha Gupta