Hindi Quote in Blog by Vedanta Life Agyat Agyani

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VEDANTA 2.0 LIFE अस्तित्व-आधारित जीवन सिद्धांत
A spiritual-religious thinker exploring the intersection of science and spirituality—on a journey to understand the laws of life and the universe.

26_08_15
धर्म के नाम पर वासना का व्यापार
Writing
धर्म के नाम पर वासना का व्यापार
पैसे किसी से लेना नहीं है—यह बात सुनने में बहुत अच्छी लगती है। लेकिन भूखे भजन भी नहीं होते। शरीर की भी एक सीमा है। आदमी कितनी भूख सह सकता है, इसकी भी एक सीमा है। यदि निष्काम कर्म का अर्थ यह कर दिया जाए कि कुछ लेना ही नहीं है, तो आदमी को अंत में मरना पड़ेगा।
इसलिए बात पैसे लेने या न लेने की नहीं है। बात है क्यों ले रहे हो और क्यों दे रहे हो?
आज का मनुष्य दान-पुण्य भी विवेक से नहीं करता। एक कौड़ी भी किसी को बिना किसी भीतर की इच्छा के देना कठिन है। फिर उसी को धार्मिक कहा जाता है जो दान करता है, सेवा करता है, पुण्य करता है। लेकिन मैं पूछता हूँ—क्या केवल दान कर देना धर्म है?
धर्म तो सबसे सूक्ष्म पर्दे के पीछे छिपी वासना और कामना का खेल बन गया है।
आज जिसे धार्मिक कहा जाता है, उसमें से 99.99 प्रतिशत लोग गीता हाथ में लेकर भी किसी न किसी कामना का खेल खेल रहे हैं।
किसी को धन चाहिए, किसी को पुत्र चाहिए, किसी को बीमारी से मुक्ति चाहिए, किसी को सफलता चाहिए, किसी को प्रसिद्धि चाहिए, किसी को सत्ता चाहिए, किसी को स्वर्ग चाहिए, किसी को मोक्ष चाहिए और किसी को अनुयायी चाहिए।
वासना समाप्त नहीं हुई—बस उसका नाम बदल गया।
कृष्ण को देखो।
कृष्ण ने व्यक्तिगत वासना के लिए कुरुक्षेत्र नहीं रचा। सामने कितनी बड़ी शक्ति थी, कितने महारथी थे। कृष्ण स्वयं हथियार नहीं उठाते, अर्जुन को माध्यम बनाते हैं। यदि आसुरी शक्ति को रोका नहीं जाता तो उस समय की व्यवस्था और जीवन का बचना कठिन था। इसलिए कृष्ण को मैं केवल किसी पूजा के पात्र के रूप में नहीं देखता—कृष्ण एक काल का रूप भी हैं, एक व्यवस्था की आवश्यकता का रूप भी हैं।
अब सूर्य को देखो।
सूर्य प्रकाश देता है, लेकिन कभी नहीं कहता—
“मैं सूर्य हूँ, मुझे दक्षिणा दो।”
चंद्रमा प्रकाश देता है।
हवा जीवन देती है।
जल जीवन देता है।
पृथ्वी धारण करती है।
आकाश सबको स्थान देता है।
पंचतत्व में से कोई अपना नाम लेकर नहीं बैठा है।
न सूर्य अपना चेहरा दिखाकर कहता है कि मेरा मंदिर बनाओ।
न हवा कहती है कि मुझे डोनेशन दो।
न पानी कहता है कि मेरे नाम पर संस्था खोलो।
न पृथ्वी कहती है कि मेरे लिए पुण्य कमाओ।
फिर भी ये जीवन दे रहे हैं।
जिसने उनकी उपयोगिता समझी, जीवन समझा, वह सुबह सूर्य को एक लोटा जल चढ़ा देता है। धूप देता है। भोजन बनाकर प्रसाद समझता है। यह कृतज्ञता हो सकती है।
लेकिन जब उसी पूजा के पीछे यह सौदा आ जाए—
“मैंने यह चढ़ाया, अब मेरी बीमारी ठीक कर दो।”
“मैंने यह दान दिया, अब मेरा काम कर दो।”
“मैंने इतना पुण्य किया, अब मुझे स्वर्ग दो।”
तो फिर यह प्रेम नहीं रहा।
यह लेन-देन है।
धर्म के नाम पर कर्मकांड, पूजा, मंदिर, दान, पुण्य—सब कुछ यदि कामना के बदले में फल प्राप्त करने का माध्यम बन जाए, तो वह धर्म कहाँ रहा?
फिर वह केवल वासना का नया रूप है।
और आज धर्म के नाम पर कितनी संस्थाएँ खड़ी हैं—धार्मिक रक्षक, पुण्य देने वाले, शुद्धि कराने वाले, कृपा दिलाने वाले, आशीर्वाद देने वाले, सफलता दिलाने वाले, मोक्ष दिलाने वाले।
कृपा का व्यापार।
पुण्य का व्यापार।
शुद्धि का व्यापार।
सुख का व्यापार।
स्वर्ग का व्यापार।
मोक्ष का व्यापार।
फिर यह धर्म है या बाजार?
हवा, पानी, सूर्य और प्रकृति से बड़ा कोई धार्मिक व्यापारी नहीं है—क्योंकि वे बिना नाम, बिना चेहरा, बिना विज्ञापन लगातार देते हैं।
और मनुष्य?
एक व्यक्ति को पानी पिलाया और उसकी कीमत एक रुपये भी नहीं हुई, लेकिन अखबार में उसकी तस्वीर, सोशल मीडिया में वीडियो और प्रचार पर सौ रुपये खर्च कर दिए।
तो प्रश्न उठेगा ही—
सेवा बड़ी थी या सेवा से मिलने वाली प्रसिद्धि?
मैं यह नहीं कहता कि हर प्रचार पाखंड है। लेकिन जहाँ सेवा से सौ गुना बड़ा प्रचार हो जाए, वहाँ विवेक से प्रश्न करना आवश्यक है।
आज धर्म के नाम पर लोग सूर्य, चंद्र, ईश्वर, गुरु, ब्रह्मा, विष्णु, महेश—सबको अपने सामने पेश करते हैं।
लेकिन भीतर देखो तो उद्देश्य क्या है?
सत्ता।
साधन।
धन।
प्रसिद्धि।
फॉलोअर।
राजनीतिक प्रभाव।
और सबसे सूक्ष्म—वासना।
तुम अगर एक अगरबत्ती भी जलाते हो और भीतर इच्छा है कि इसके बदले मेरी इच्छा पूरी हो, तो अगरबत्ती की खुशबू के पीछे भी एक कामना है।
फिर पूछता हूँ—
धर्म में निष्काम कर्म कहाँ है?
दूसरी तरफ दुनिया में ऐसे लोग और संस्थाएँ हैं जो शिक्षा, भोजन, चिकित्सा, पर्यावरण, आपदा-सहायता, मानव सुरक्षा और अनेक सामाजिक कार्यों में बहुत बड़ा धन लगाते हैं। वहाँ हर सहायता को स्वर्ग, मोक्ष और पुण्य के व्यापार से जोड़ना आवश्यक नहीं होता।
सहायता इसलिए कि मनुष्य है।
भोजन इसलिए कि कोई भूखा है।
दवा इसलिए कि कोई बीमार है।
शिक्षा इसलिए कि कोई अज्ञानी है।
पर्यावरण इसलिए कि जीवन बचना चाहिए।
यही तो विवेक है।
धर्म यदि अस्तित्व के स्वभाव को समझता है, तो उसका कर्म भी अस्तित्व जैसा होना चाहिए—देना, चलना, बदलना, जीवन को आगे बढ़ाना; बदले में हर क्षण अपना हिसाब नहीं मांगना।
इसलिए मेरा आज धर्म से एक ही प्रश्न है—
आप कैसे धार्मिक हैं?
क्या अस्तित्व का स्वभाव आपके भीतर भी है?
क्या सूर्य जैसा कुछ देने का स्वभाव है?
क्या जल जैसा जीवन देने का स्वभाव है?
क्या हवा की तरह बिना भेदभाव के देने का स्वभाव है?
क्या पृथ्वी की तरह सहने और धारण करने का स्वभाव है?
या धर्म के नाम पर भीतर वही पुरानी वासना बैठी है—
धन चाहिए,
पुण्य चाहिए,
कृपा चाहिए,
आशीर्वाद चाहिए,
सफलता चाहिए,
सुख चाहिए,
मोक्ष चाहिए,
सत्ता चाहिए,
प्रसिद्धि चाहिए?
मैं आपको उत्तर देने के लिए नहीं कहता।
मुझे उत्तर मत दो।
अपने भीतर बैठी आत्मा से पूछो।
एक बार अपने आप से ईमानदारी से पूछो—
“मैं धर्म के नाम पर क्या कर रहा हूँ?”
यदि प्रश्न सच में भीतर चला गया, तो शायद आप स्वयं अपने आप से शर्मिंदा हो जाएँगे।
क्योंकि तब पता चलेगा कि धर्म के नाम पर कहीं हम धर्म नहीं,
अपनी ही वासना चला रहे हैं।
कहीं पुण्य के नाम पर व्यापार है।
कहीं सेवा के नाम पर प्रसिद्धि है।
कहीं धर्म के नाम पर राजनीति है।
कहीं आस्था के नाम पर सत्ता है।
कहीं ईश्वर के नाम पर धन है।
और कहीं मोक्ष के नाम पर सबसे सूक्ष्म इच्छा छिपी हुई है।
इसलिए धर्म का पहला मंदिर बाहर नहीं है।
अपने भीतर बैठी उस आत्मा के सामने खड़े हो जाओ।
उसे अपना नाम मत बताओ।
उसे अपना धर्म मत बताओ।
उसे अपनी जाति मत बताओ।
उसे अपनी पूजा मत बताओ।
बस उससे एक प्रश्न पूछो—
“क्या मेरे भीतर अस्तित्व का स्वभाव है?”
उत्तर मुझे मत देना।
उत्तर मुझे मिल जाएगा।

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