जीवन की किताब
--------------
जीवन एक किताब है
जिसमें होते हैं जीवन के
विविध रंग बिरंगे अध्याय,
जिसे हमको मन-बेमन से पढ़ना ही पड़ता है।
कभी हँसना, तो कभी रोना
खुशियों में नहाकर नाचते गाते हैं
तो वेदना को अपने आँसुओँ से सीँचना भी पड़ता है,
सब कुछ हमारे अनुरूप नहीं होता
कुछ सुंदर, तो कुछ कुरुप भी होता है।
कुछ प्रत्याशित तो कुछ अप्रत्याशित होता,
चाहें या न चाहें, हमें हर अध्याय पढ़ना पड़ता है,
इसे हम भले ही बेबसी कहें
पर जीवन की किताब हमें ही नहीं
हर किसी को पढ़ना पड़ता है,
परीक्षा देना पड़ता है।
कभी पास तो कभी फेल भी होना पड़ता है
बस जीवन की किताब का क्रय भर नहीं करना पड़ता है
तो किसी को देकर हाथ नहीं झाड़ सकते
न किसी को बेंच सकते हैं
और न ही कहीं फेंककर मुक्त हो सकते हैं।
यह जीवन की किताब है जनाब
इसे नदी नाले सागर में फाड़कर फेंक नहीं सकते
जलाकर अस्तित्व हीन भी नहीं कर सकते,
उसके एक भी शब्द को नजरंदाज नहीं कर सकते,
सिर्फ और सिर्फ पढ़ सकते हैं,
और जैसा चाहें, हँसकर या रोकर जी सकते हैं।
सुधीर श्रीवास्तब