या तो शून्य हो जाओ, या फिर अनंत बन जाओ। जो व्यक्ति स्वयं को शून्य समझकर चलता है, वह सीखने, बदलने और दूसरों को सम्मान देने के लिए हमेशा तैयार रहता है। वहीं अनंत बनने का अर्थ है अपने विचारों, प्रेम, दया, ज्ञान और अच्छे कर्मों को इतना व्यापक बना देना कि उनकी कोई सीमा न रहे। जीवन में धन, पद और प्रतिष्ठा सीमित हो सकते हैं, लेकिन इंसानियत, करुणा, सम्मान और अच्छे कर्मों की कोई सीमा नहीं होनी चाहिए । शून्य की तरह अहंकार से खाली और अनंत की तरह अपने अच्छे विचारों में विशाल बनो।यही शून्य से अनंत बनने की वास्तविक यात्रा है।