तुलना: सबसे महँगा ज़हर
दुनिया में कुछ ज़हर ऐसे होते हैं जो शरीर को नष्ट कर देते हैं, और कुछ ऐसे जो इंसान के भीतर बसे आत्मविश्वास, संतोष और आत्मसम्मान को धीरे-धीरे खत्म कर देते हैं। तुलना उसी दूसरे प्रकार का ज़हर है।
यह ज़हर एक ही पल में नहीं मारता। यह धीरे-धीरे असर करता है। पहले यह इंसान से उसकी खुशी छीनता है, फिर उसका आत्मविश्वास, और अंत में उससे उसकी पहचान भी छीन लेता है। सबसे दुखद बात यह है कि अक्सर हमें पता भी नहीं चलता कि हम इसकी गिरफ्त में आ चुके हैं।
आज का समय तुलना का समय बन चुका है। सोशल मीडिया खोलते ही हमें किसी की सफलता, किसी की खूबसूरती, किसी की दौलत, किसी की उपलब्धियाँ और किसी की मुस्कान दिखाई देती है। धीरे-धीरे हम अपनी पूरी ज़िंदगी की तुलना दूसरों की कुछ चुनिंदा झलकियों से करने लगते हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हम उनकी पूरी कहानी नहीं देख रहे, केवल उसका वह हिस्सा देख रहे हैं जिसे वे दुनिया को दिखाना चाहते हैं।
तुलना कभी निष्पक्ष नहीं होती।
वह आपकी पहली सीढ़ी की तुलना किसी और की मंज़िल से करती है। वह किसी की सफलता के पीछे छिपी असफलताओं, संघर्षों और त्याग को नज़रअंदाज़ कर देती है। उसे केवल परिणाम दिखाई देता है, यात्रा नहीं।
यही कारण है कि तुलना का सबसे बड़ा नुकसान यह नहीं कि वह हमें दूसरों से प्रभावित करती है, बल्कि यह कि वह हमें स्वयं से असंतुष्ट बना देती है।
जिस दिन हम अपनी यात्रा को दूसरों की यात्रा से तौलना शुरू कर देते हैं, उसी दिन अपने छोटे-छोटे कदमों की कीमत भूल जाते हैं। हमारी उपलब्धियाँ छोटी लगने लगती हैं, हमारी खुशियाँ फीकी पड़ जाती हैं और हमारी नज़र हमेशा उस चीज़ पर टिक जाती है जो हमारे पास नहीं है।
प्रकृति हमें एक गहरा सबक सिखाती है। कोई सूर्योदय कभी चाँद से ईर्ष्या नहीं करता, कोई नदी पहाड़ बनने की कोशिश नहीं करती और कोई तारा समुद्र से अपनी चमक की तुलना नहीं करता। हर एक का अपना समय, अपना उद्देश्य और अपनी सुंदरता होती है। केवल मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो अपनी विशिष्टता भूलकर किसी और जैसा बनने की कोशिश में अपना जीवन बिता देता है।
प्रेरणा और तुलना में बहुत बड़ा अंतर है।
प्रेरणा कहती है—"यदि वह कर सकता है, तो मैं उससे सीख सकता हूँ।"
तुलना कहती है—"यदि वह इतना अच्छा है, तो मैं कभी पर्याप्त नहीं हो सकता।"
यही एक विचार इंसान को आगे भी बढ़ा सकता है और भीतर से तोड़ भी सकता है।
सच्चाई यह है कि हर व्यक्ति एक ऐसी लड़ाई लड़ रहा है जिसे दुनिया नहीं देख सकती। किसी की मुस्कान के पीछे दर्द छिपा है, किसी की सफलता के पीछे वर्षों का संघर्ष और किसी की शांति के पीछे अनगिनत त्याग। लेकिन हम अपनी वास्तविकता की तुलना दूसरों की दिखाई देने वाली सफलता से करते हैं और फिर स्वयं को कमतर मानने लगते हैं।
तुलना की सबसे बड़ी कीमत यही है कि यह हमें हमारी अपनी संभावनाओं से दूर कर देती है। यह हमें दूसरों के सपनों का पीछा करने पर मजबूर करती है, जबकि हमारे अपने सपने हमारी प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।
शायद जीवन का सबसे सुंदर क्षण वह होता है जब हम यह पूछना छोड़ देते हैं कि "मैं उसके जैसा क्यों नहीं हूँ?" और यह पूछना शुरू करते हैं कि "क्या मैं कल से बेहतर इंसान बना हूँ?"
क्योंकि जीवन कभी भी दूसरों से आगे निकलने की दौड़ नहीं था। जीवन तो स्वयं के भीतर छिपे सर्वश्रेष्ठ रूप तक पहुँचने की यात्रा है।
तुलना सबसे महँगा ज़हर इसलिए नहीं है कि वह आपसे आपकी उपलब्धियाँ छीन लेती है, बल्कि इसलिए कि वह आपको यह विश्वास दिला देती है कि जो आपके पास है, वह कभी पर्याप्त नहीं होगा