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मोहब्बत का गुलाब कांटे भी लाया
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“ख़्वाबों के शहर में एक घर बसाया था,
दिल ने हर मोड़ पर बस तुम्हें ही पाया था।
एक आस जागी थी, एक नूर छाया था,
तेरी उल्फ़त का जब वो हसीं पल आया था।
गुलाब तो बहुत ख़ूबसूरत था मोहब्बत का,
पर कंबख़्त अपने साथ काँटे भी लाया था।
हम न डरे कभी रास्तों की बंदिशों से,
न ही शिकवे किए ज़माने की गर्दिशों से।
हर ख़ुशी, हर दर्द में भी मुस्कुराया था,
मोहब्बत के हर अहसास को अपनाया था।
सोचा न था कभी ऐसा भी दिन आएगा,
जो कल तक अपना था, वही अजनबी हो जाएगा।
जिसके लिए इस पूरे ज़माने को भुलाया था,
चाहा था जिसे बेइंतहा, उसने ही आखिर मे इस दिल को
रुलाया था।”
-MASHAALLHA
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