मैं और मेरे अह्सास
फुर्सत के पल
फुर्सत के पल में यादें तड़पा जाती हैं l
आँखों से सावन भादो बरसा जाती हैं ll
काश के मिल जाए फुर्सत के पल भी l
फ़िर से मुलाक़ात को तरसा जाती हैं ll
वो खुली जुल्फें वो नशीली आँखे तोबा वही l
दिल पर जोरदार बिजली गरज़ा जाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह