राष्ट्र प्रथम
राष्ट्र प्रथम सिर्फ शब्द नहीं
भाव है, संवेदना है, समर्पण है
सिद्धांत, संकल्प, दृढ़ता, अनुशासन है।
यह दो शब्द कहने के लिए तो सिर्फ दो शब्द भर हैं,
पर इन शब्दों की आत्मा का फलक बड़ा विशाल है।
जिसे महसूस करना पड़ता है,
नि:स्वार्थ भाव समझना और उसमें रमना पड़ता है,
प्राणों से भी ऊपर रखना पड़ता है,
खुद को इसका एक अंश मानना पड़ता है,
राष्ट्र को सबसे ऊपर रखना पड़ता है,
खुद राष्ट्र के साथ खड़ा होना पड़ता है,
राष्ट्र प्रथम का भाव अपने आपमें जीवंत रखना पड़ता है।
इसका अनवरत उद्घोष करना पड़ता है,
तब कहीं जाकर राष्ट्र प्रथम का श्री गणेश होता है
और तब ये दो शब्द राष्ट्र के साथ
हम सबको भी नव आयाम दे पाने में सक्षम होता है।
सुधीर श्रीवास्तव