संसद का क्या काम है?
लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर
संसद का मज़ाक़ बन रहा है,
सदन में चर्चा-परिचर्चा, विमर्श के बजाय
विरोध की आड़ में सड़क पर सिर्फ नाटक हो रहा है,
धमकी देकर सरकार पर दबाव बनाने के फेर में
जनता के टैक्स का पैसा उड़ाया जा रहा है।
अपनी बात कहने के लिए नियमों का अतिक्रमण कर
खुद को बड़ा दिखाने का यत्न हो रहा है,
समझ नहीं आता जब सत्र चल रहा है
तब सड़कों पर यह नाच क्यों किया जा रहा है?
या सच से मुँह चुराने का खेल चल रहा है।
सदन के बजाय सड़क पर
कौन से संवैधानिक धर्म का पालन किया जा रहा है।
बिना कुछ किए वेतन भत्ते का विरोध करने की तो
कोई जहमत तक नहीं उठा रहा है,
क्या इसी तरह संविधान और संवैधानिकता संग
सदन की गौरवशाली परंपरा का
सगर्व निर्वहन किया जा रहा है?
संसद के सत्रों का सिर्फ औपचारिक संचालन हो रहा है
क्योंकि अब इन सबके लिए नियमों, मर्यादाओं का
कोई मतलब ही नहीं रह गया है,
सिर्फ विरोध, बहिर्गमन, धरना, प्रदर्शन ही
अब अधिकांश विपक्ष का एक मात्र हथियार बन गया है,
क्योंकि बिना तैयारी के इनके पास
कहने को तो कुछ होता नहीं,
तब इसके अलावा इनके पास
और विकल्प भी क्या बच रहा है?
सदन में भी छोटे बच्चों की तरह शोर-शराबा
सीट छोड़कर अध्यक्ष के आसन तक
या आसपास तक आ जाना, तख्तियां लहराना
कागज के गोले फेंकने के अलावा करना ही क्या है?
अपने एल ओ पी का तो कहना ही क्या है?
धीरता-गंभीरता से तो उनका छत्तीस का नाता है
लोकतंत्र का मन्दिर उनके लिए पिकनिक स्थल जैसा है
उनके तर्कों-तथ्यों को समझना सबसे मुश्किल है,
चर्चा परिचर्चा से भागना, सदन में पर्याप्त समय देना
उन्हें बिल्कुल नहीं भाता है।
उनके चाल-ढाल, अंदाज, बोल-चाल
पदानुरुप व्यवहार, आचरण में
गंभीरता का एक भी कीड़ा नजर नहीं आता है।
तमाम वरिष्ठ जन भी जाने किस रौ में बह रहे हैं,
जैसे संसदीय मर्यादा, ज्ञान, अनुभव
बैंक लाकर में जमा कर भूल गए हैं।
कहने को तो सदन चलाना सरकार की जिम्मेदारी है
तो आखिर विपक्ष का क्या काम है?
सदन में सरकार को घेर नहीं पा रहे हैं,
क्या इसीलिए शोर-शराबा, सदन से बहिर्गमन कर
धरना, प्रदर्शन कर रहे हैं,
और सड़कों पर जनता के हित में काम करने का
सिर्फ भौंड़ा नाटक कर समय काट रहे हैं,
अपना वेतन भत्ता नहीं भूल रहे हैं,
अपने मतदाताओं को रुला रहे हैं।
ऐसे में बड़ा सवाल है कि
हमें आपको संसद/विधानसभाओं का
अब काम ही क्या रह गया है?
जनता के टैक्स का पैसों इस तरह बर्बाद करने से
भला देश और जनता को कितना लाभ मिल रहा हैं,
हमारे लोकतंत्र के मंदिर का
कितना मान-सम्मान बढ़ रहा है।
सुधीर श्रीवास्तव