"32 लोगों ने..."
बस एक खबर नहीं,
कई घरों की बेचैनी थी।
वो हर उस लड़की का डर थी
जो शाम से पहले घर लौटना चाहती है।
वो हर उस माँ की दुआ थी
जो बेटी के सुरक्षित लौटने का इंतज़ार करती है।
खबरें बीत जाती हैं,
लेकिन दर्द याद रहता है।
और बदलाव तब शुरू होता है
जब हम चुप रहना छोड़ देते हैं।
"औरत को आज़ादी देने की ज़रूरत नहीं,
उसे बस उस सोच से बचाने की ज़रूरत है
जो उसकी आज़ादी छीनती है।"
हर बेटी सुरक्षित रहे—
यही सबसे बड़ी जीत है।