कॉकरोच: एक प्रतिरोध🪳
तुमने महज़ लिया था एक नाम—'कॉकरोच'।
वे अतीत में भी थे, आज भी हैं, और हमेशा रहेंगे।
लेकिन तुमने कुछ इस कदर 'कॉकरोच' बोला,
कि हम उस घृणित परजीवी से अलग हो गए।
अलग हो गए हम उस व्यवस्था से भी—
जो व्यवस्था के गटर में पनपती है,
सच को सरेआम छलती है,
और घोटालों के अँधेरे में जीती है।
"जो परजीवी हैं, वे अपने महलों में छिपकर बैठ गए;
और जो अपने हक़ के लिए लड़े, तुमने उन्हें 'कॉकरोच' कह दिया।"
हाँ, हम कॉकरोच हैं!
क्योंकि हम हर चोट सहकर भी ज़िंदा रहते हैं।
व्यवस्था की नज़रों में जो महज़ एक कीड़ा है,
जब उसने व्यवस्था के भ्रष्टाचार को कुतरना शुरू किया,
तो तुम बोले—"ग़लती हो गई!"
बात अब महज़ ग़लती मानने की नहीं है,
अब तो ग़लती करने वाले को सबक सिखाना होगा।
जो बैठ गया है उस ऊँचे पद पर,
जिसके लायक़ वह कभी था ही नहीं,
उस दायित्व की ख़ातिर अब उसे कुर्सी से उतरना होगा।
अब 'कॉकरोच' उस अस्तित्व का नाम होगा,
जो व्यवस्था की इस गंदगी को साफ़ करेगा।
"अचरज देखिए, जो समाज के असली परजीवी हैं,
वे गंदगी साफ़ करने का वादा करके, ख़ुद गंदगी फैला रहे हैं!
झूठ सिर चढ़कर महलों से बयानबाज़ी कर रहा है,
और विडंबना यह कि सच, ख़ुद को साबित करने के लिए लड़ रहा है।"
हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे, हम लड़ेंगे!
~ कपिल तिवारी "यथार्थ"