कहें सुधीर कविराय - कुण्डलिया छंद ५
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आदत आप सुधारिए, मानो मेरी बात।
क्यों तुमको अच्छा लगे, खाते रहना लात।।
खाते रहना लात, कसम खाए हो बैठे।
जानें कैसा दंभ, सदा ही रहते ऐंठे।।
कहें मित्र यमराज, छोड़ दो व्यर्थ अदावत।
बिना देर अब आज, जरूरी बदलो आदत।।५१
रचना यदि इतिहास है, करिए ऐसे काम।
तभी आपका नाम हो, संग नया आयाम।।
संग नया आयाम, काम जो भी हैं करते।
पाते वो ही लक्ष्य, नहीं मुश्किल से डरते।।
कहें मित्र यमराज, मानिए मेरा कहना।
धुन के पक्के आप, रचो अब ऐसी रचना।।५२
फैले पेपर माफिया, नाकामी सरकार।
नीट रुलाये युवा को, व्यर्थ सभी तकरार।।
व्यर्थ सभी तकरार, चीट हर बारी होती।
फिकर किसे है आज, बोझ उम्मीदें ढोती।।
कहें मित्र यमराज, भरे कोई नहिं थैले।
नहीं गिरे अब राल, माफिया लोभी फैले।।५३
समय साथ हो लेखनी, और अटल विश्वास।
तब बनता इतिहास है, कोई नहिं परिहास।।
कोई नहिं परिहास, शब्द जब ज्योति बनेंगे।
नित नूतन उत्साह, छत्र भी तिमिर तनेंगे।।
कहें मित्र यमराज, बोलिए कोई संशय।
धुन के पक्के लोग, करें सब कुछ ही असमय।।५४
वासव की इतनी कृपा, सूखे थे जो खेत।
बारिश की रसधार से, लगा पुण्य का हेत।
लगा पुण्य का हेत, खिले अब चेहरे सारे।
जो लगते थे कल तलक, बिना मारे बेचारे।।
कहें मित्र यमराज, बड़ी किरपा है माधव।
कम से कम हुए प्रसन्न, सभी के प्यारे वासव।।५५
ईश्वर का गुणगान भी, नहिं होता बिन स्वार्थ।
नहीं समझना कठिन है, जो इसका भावार्थ।।
जो इसका भावार्थ, कृपा भी वैसे मिलती।
करिए कितना जाप, घुमाओ माला गिनती।।
कहें मित्र यमराज, जानते सब हो प्रियवर।
देते धोखा आप, ओट लेकर के ईश्वर।।५६
चाहत सबकी ही सदा, हो उनका गुणगान।
भले नहीं गुण एक भी, दे उनको पहचान।।
दे उनको पहचान, यही तो कलयुग भाई।
कल की छोरी आज, मानती खुद को दाईं।।
कहें मित्र यमराज, मुझे है इतनी राहत।
मत करिए गुणगान, यही बस मेरी चाहत।।५७
घर-घर चर्चा हो रही , सत्य सनातन आम।
भेदभाव करना नहीं, प्रेम भाव सतकाम।।
प्रेम भाव सतकाम, समूचा विश्व देखता।
अपने से कब दूर, किसी को कहाँ फेंकता।।
कहें मित्र यमराज, हवा बहती है झर-झर।
दिखता है उत्साह, सनातन चर्चा घर-घर।।५८
अंबर छूना है अगर, करिए वैसा काम।
तभी आपका हर कहीं, गुंजित होगा नाम।।
गुंजित होगा नाम, खूब चर्चा भी होगी।
केवल उनको छोड़, बैठ जो खाना रोगी।।
कहें मित्र यमराज, भटकना क्यों है दर-दर।।
मिले नया आयाम, संग में चमके अंबर।।५९
अंबर पाना चाहते, करो अलग कुछ काम।
तभी जगत में मित्रवर, चमक सकेगा नाम।।
चमक सकेगा नाम, सूर्य सम किरणें बिखरें।
चलो कर्म की राह, सफलता कतरे-कतरे।
कहें मित्र यमराज, फेंकना होगा हर डर।
कहलाओ गुणवान, बने जब साथी अंबर।।६०
भीतर सबके पोल है, जग का सारा ढोल।
फिर इतना क्यों हम भला, पीट रहे बिन बोल।।
पीट रहे बिन बोल, गजब है ये बीमारी।
नहीं किसी के पास, पूर्व कोई तैयारी।।
कहें मित्र यमराज, बनें क्यों हम सब तीतर।
झाँकें पहले आप, सभी जन अपने भीतर।।६१
अपना-अपना हम सभी, पीट रहे हैं ढोल।
बिना किसी सुर ताल के, कौन समझता बोल।।
कौन समझता बोल, नाच है भौंड़ा होता।
जिसको आता समझ, माथ पकड़े निज रोता।।
कहें मित्र यमराज, देख सुंदर हम सपना।
और जोर से आज, गीत गायें सब अपना।।६२
अब तो जीवन से बड़ा, भारी हुआ दहेज।
हम सब अपनी बेटियाँ, पाते नहीं सहेज।।
पाते नहीं सहेज, दोष दूजे का कैसे।
हम भी तो है यार, जिसे दिखते हैं पैसे।।
कहें मित्र यमराज, ठाट से बैठो महतो।
लेना खूब दहेज, काम है केवल अब तो।।६३
गर्मी से हम जल रहे, इसका हमको ध्यान।
आज मनुज का देखिए, यह कैसा है ज्ञान।।
यह कैसा है ज्ञान, गजब अभिमान हमारा।
जल जमीन के संग, उजाड़ें जंगल सारा।।
कहें मित्र यमराज, नहीं बातों में नर्मी।
रोते भी हम-आप, जलाती हमको गर्मी।।६४
नाहक दोषी मानना, जिसने किया गुनाह।
मुख-मंडल कर देखिए, फैला जो उत्साह।।
फैला जो उत्साह, यही तो जग है कहता।
करता जो अपराध, कहाँ उत्साहित रहता।।
कहें मित्र यमराज, सत्य के तुम संवाहक।
धरते हो निज शीश, भार तुम झूठा नाहक।।६५
आया ऐसा दौर अब, कौन करे अब याद।
सबसे पहले भूलती, अपनी ही औलाद।।
अपनी ही औलाद, कहाँ अब रहे सचेते।
कौन सुने फरियाद, डाँटकर चुप कर देते।।
कहें मित्र यमराज, देखिए कलयुग माया।
नये दौर का आज, जमाना चलकर आया।।६६
नागर में जाकर बसे, भूल गये संस्कार।
संग शील अरु सभ्यता, इन्हें लगे बेकार।।
इनको लगे बेकार, मरी करुणाएँ सारी।
ऐसा हुआ समाज, बढ़ी जाती बीमारी।।
कहें मित्र यमराज, भरें गागर में सागर।
चलो गाँव को छोड़, बसें हम सब भी नागर।।६७
अनजाने की भूल का, नहीं दीजिए दंड।
भला आपको क्या मिले, मन को करके खंड।।
मन को करके खंड, लाभ क्या पा जाओगे।
फिर सुख से तब आप, बताओ रह पाओगे।।
कहें मित्र यमराज, बात मेरी भी माने।
छोड़ो कल की बात, भूल जाने अंजाने।।६८
कहता हमसे नौतपा, धैर्य न छोड़ो आप।
जीवन के संग्राम को, मानो मत अभिशाप।।
मानो मत अभिशाप, श्रेष्ठ मानव बन रहिए।
दानव जैसे काम, भूल से भी मत करिए।।
कहें मित्र यमराज, बात क्यों नहीं समझता।
एक बार फिर आज, प्रेम से आतप कहता।।६९
होते रहते हम दुखी, गर्मी से इंसान।
भले जलाये नौतपा, बने यही वरदान।
बने यही वरदान, सर्प बिच्छू जहरीले।
करते जो नुकसान, ताप उन सबको लीले।।
बढ़ती पैदावार, आप हम नाहक रोते।।
क्या कर लेते आज, नौतपा दुश्मन होते।।७०
ईश्वर का वरदान है, जब हाथों में हाथ।
हर मुश्किल आसान हो, अपनों का जब साथ।।
अपनों का जब साथ, आप हम सब हैं पाते।
थामे दूजा हाथ, मौज आनंद उठाते।।
कहें मित्र यमराज, मिलेगा सुखदा सागर।
सत्य यही दिन रात, ध्यान उन पर दें ईश्वर।।७१
सुधीर श्रीवास्तव